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सदगुरु शरणागति के बिना कोई भी जीवन महान नहीं बन सकता : शांडिल्य
Thu, 10 Jul 2025 11:52 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
Updated Thu, 10 Jul 2025 11:52 PM IST
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10जेएनडी18-गुरु पूर्णिमा पर आयोजित हवन में भाग लेते हुए श्रद्धालु। संवाद
उचाना। गुरु पूर्णिमा पर शहर की लाला प्रभु दयाल चौधरी धर्मशाला में हवन किया। राधा कृष्ण मंदिर पुजारी पंडित सत्यनारायण शांडिल्य ने कहा कि यह सत्य है कि भगवान बनने की पात्रता प्रत्येक पत्थर में होती है। वहीं ये बात भी उतनी ही सत्य है कि बिना कुशल शिल्पकार के कोई भी पत्थर भगवान नहीं बन सकता है। जो काट-छांट कर एक पत्थर को देव मूर्ति में रूपांतरित कर सके उसी शिल्पकार को गुरु कहा जाता है। उन्होंने कहा कि सदगुरू की शरणागति ही जीव को अपराध से आराधना की यात्रा कराती हुई उसको कौवे से हंस बनाती है।
सद्गुरु शरणागति के बिना कोई भी जीवन महान नहीं बन सकता है। भगवान राम और श्रीकृष्ण से लेकर जितने भी हमारे आदर्श पुरुष हुए हैं, सभी ने गुरु कृपा के बल पर ही जीवन का श्रेष्ठत्व प्राप्त किया है। शांडिल्य ने कहा कि अच्छी बातें कहीं से भी मिले, उसे जीवन में अवश्य धारण करना चाहिए। अच्छे गुण शत्रु में भी दिखते हैं तो उनको सराहने का साहस भी अवश्य होना चाहिए।
प्रशंसा सुनना जितना आसान होता है, प्रशंसा को पचा पाना उतना ही कठिन हो जाता है। स्वयं की ज्यादा प्रशंसा सुनने से व्यक्ति के भीतर अहम जन्म लेता है तो अधिक सम्मान की प्राप्ति भी जीवन उत्थान के मार्ग में सदैव बाधक होती है।
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दूसरों की प्रशंसा करना स्वयं के अहम का नाश करते हुए आपको सहज ही दूसरों के प्रेम और सम्मान का अधिकारी बना देती है। राजा बलि की प्रशंसा करके ही भगवान वामन ने तीन लोक सहज में प्राप्त कर लिए थे। दूसरों के अच्छे गुणों की प्रशंसा करना और उन अच्छे गुणों को अपने जीवन में धारण करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहना ही जीवन उन्नति का मार्ग है।
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सद्गुरु शरणागति के बिना कोई भी जीवन महान नहीं बन सकता है। भगवान राम और श्रीकृष्ण से लेकर जितने भी हमारे आदर्श पुरुष हुए हैं, सभी ने गुरु कृपा के बल पर ही जीवन का श्रेष्ठत्व प्राप्त किया है। शांडिल्य ने कहा कि अच्छी बातें कहीं से भी मिले, उसे जीवन में अवश्य धारण करना चाहिए। अच्छे गुण शत्रु में भी दिखते हैं तो उनको सराहने का साहस भी अवश्य होना चाहिए।
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प्रशंसा सुनना जितना आसान होता है, प्रशंसा को पचा पाना उतना ही कठिन हो जाता है। स्वयं की ज्यादा प्रशंसा सुनने से व्यक्ति के भीतर अहम जन्म लेता है तो अधिक सम्मान की प्राप्ति भी जीवन उत्थान के मार्ग में सदैव बाधक होती है।
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दूसरों की प्रशंसा करना स्वयं के अहम का नाश करते हुए आपको सहज ही दूसरों के प्रेम और सम्मान का अधिकारी बना देती है। राजा बलि की प्रशंसा करके ही भगवान वामन ने तीन लोक सहज में प्राप्त कर लिए थे। दूसरों के अच्छे गुणों की प्रशंसा करना और उन अच्छे गुणों को अपने जीवन में धारण करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहना ही जीवन उन्नति का मार्ग है।