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संबंधों के दीप में आत्मीयता का तेल डालने की जरूरत : मुनि अरुण
Fri, 24 Feb 2023 01:24 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
Updated Fri, 24 Feb 2023 01:24 AM IST
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सफीदों। वर्तमान दौर में संबंधों के दीप में आत्मीयता का तेल डालने की जरूरत है। उक्त उद्गार संघशास्ता गुरुदेव सुदर्शन लाल महाराज के सुशिष्य एवं युवा प्रेरक अरुण मुनि महाराज ने नगर की जैन स्थानक में धर्म सभा को संबोधित करते हुए प्रकट किए।
उन्होंने कहा कि पारिवारिक जीवन की गाड़ी सदस्यों के त्याग, प्रेम, स्नेह, उदारता, सेवा, सहिष्णुता और परस्पर आदर भाव पर चलती है। परिवार को सहअस्तित्व, सामूहिक जीवन, सेवा और सहिष्णुता की पाठशाला माना गया है, किन्तु जब परस्पर के सम्बन्ध स्वार्थपूर्ण, संकीर्णता, असहिष्णुता से भर जाते हैं तो वह परिवार नरक की साक्षात अभिव्यक्ति के रूप में परिणत हो जाते हैं। परिवार में जब अपने-अपने स्वार्थ को पूरा करने की वृति बढ़ती है तो गृहस्थ जीवन की दुर्दशा होती है। आज परिवारों के हालात ये है कि घर में अगर सदस्य 5 हैं तो उनके चूल्हे भी अलग-अलग से 5 ही हैं। परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व भुलाकर अपना-अपना चूल्हा-चौका अलग रखने में कोई बुद्धिमानी नहीं है। यह कटु सत्य है कि आपसी फूट, झगड़ों व अलग-अलग चूल्हे-चौकों से कोई भी परिवार तरक्की की सिढ़ी नहीं चढ़ सकता। इसलिस रिश्तों व परिवारों को तोड़ने की नहीं बल्कि जोड़ने की आवश्यकता है।
मुनि ने फरमाया कि सम्यक दर्शन, ज्ञान, चरित्र ही मोक्ष का मार्ग है। सम्यक दर्शन अर्थात धर्म को जानना, सम्यक ज्ञान अर्थात धर्म को मानना और सम्यक चरित्र अर्थात जाने माने हुए धर्म मार्ग की ओर बढऩा। इस तीनों के समावेश के बाद व्यक्ति को निश्चित ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। गुरू व धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा रखनी चाहिए। जिस प्रकार शरीर को पानी की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार आत्मा को परमात्मा की आवश्यकता होती है। अंतिम समय में मनुष्य के साथ कुछ भी नहीं जाता केवल कुछ साथ जाता है तो पुण्य व पाप कर्म जाते हैं, इसलिए व्यक्ति को धर्म के कार्य करना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि पारिवारिक जीवन की गाड़ी सदस्यों के त्याग, प्रेम, स्नेह, उदारता, सेवा, सहिष्णुता और परस्पर आदर भाव पर चलती है। परिवार को सहअस्तित्व, सामूहिक जीवन, सेवा और सहिष्णुता की पाठशाला माना गया है, किन्तु जब परस्पर के सम्बन्ध स्वार्थपूर्ण, संकीर्णता, असहिष्णुता से भर जाते हैं तो वह परिवार नरक की साक्षात अभिव्यक्ति के रूप में परिणत हो जाते हैं। परिवार में जब अपने-अपने स्वार्थ को पूरा करने की वृति बढ़ती है तो गृहस्थ जीवन की दुर्दशा होती है। आज परिवारों के हालात ये है कि घर में अगर सदस्य 5 हैं तो उनके चूल्हे भी अलग-अलग से 5 ही हैं। परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व भुलाकर अपना-अपना चूल्हा-चौका अलग रखने में कोई बुद्धिमानी नहीं है। यह कटु सत्य है कि आपसी फूट, झगड़ों व अलग-अलग चूल्हे-चौकों से कोई भी परिवार तरक्की की सिढ़ी नहीं चढ़ सकता। इसलिस रिश्तों व परिवारों को तोड़ने की नहीं बल्कि जोड़ने की आवश्यकता है।
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मुनि ने फरमाया कि सम्यक दर्शन, ज्ञान, चरित्र ही मोक्ष का मार्ग है। सम्यक दर्शन अर्थात धर्म को जानना, सम्यक ज्ञान अर्थात धर्म को मानना और सम्यक चरित्र अर्थात जाने माने हुए धर्म मार्ग की ओर बढऩा। इस तीनों के समावेश के बाद व्यक्ति को निश्चित ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। गुरू व धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा रखनी चाहिए। जिस प्रकार शरीर को पानी की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार आत्मा को परमात्मा की आवश्यकता होती है। अंतिम समय में मनुष्य के साथ कुछ भी नहीं जाता केवल कुछ साथ जाता है तो पुण्य व पाप कर्म जाते हैं, इसलिए व्यक्ति को धर्म के कार्य करना चाहिए।
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