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मीनारें वही, मर्यादा नई: मस्जिद के रूप में दर्ज इमारत आज गुरुद्वारा, फिर भी जिंदा है पूर्वजों की विरासत

Thu, 19 Feb 2026 11:54 AM IST
नवीन दलाल रवि संबरवाल, जींद
रवि संबरवाल, जींद Published by: नवीन दलाल Updated Thu, 19 Feb 2026 11:54 AM IST
सार

गुरुद्वारा सिंह सभा बिघाना के खजांची नवीन सिंह के अनुसार लंगर हॉल निर्माण के लिए 4 लाख 90 हजार रुपये का अनुदान स्वीकृत हुआ था लेकिन भूमि मस्जिद के रूप में दर्ज होने के कारण यह वक्फ बोर्ड के अंतर्गत आती है। तकनीकी कारणों से अनुदान वापस लौट गया।

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Minarets are the same, but the decorum is new: The building registered as a mosque is now a gurdwara
बिघाना गांव में बना गुरुद्वारा साहिब - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जिस इबादतगाह में कभी अजान की आवाज गूंजती थी, आज वहीं सत श्री अकाल का स्वर सुनाई देता है। करनाल की सीमा से सटे जींद जिले के अंतिम छोर पर बसे बिघाना गांव में इतिहास ने इमारत का रूप बदला लेकिन आस्था को जिंदा रखा।

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आजादी से पहले बिघाना मुस्लिम बहुल गांव था। वर्ष 1947 में देश के बंटवारे के समय यहां के मुस्लिम परिवार पाकिस्तान चले गए। उनकी जगह पाकिस्तान के मुल्तान जिले समेत विभिन्न क्षेत्रों से करीब 100 पंजाबी परिवार यहां आकर बस गए। अपने पीछे सब कुछ छोड़ आए इन परिवारों ने अपने साथ सिर्फ विश्वास और गुरु ग्रंथ साहिब को संभाल कर रखा। बंटवारे ने सरहदें खींच दीं लेकिन बिघाना की यह इबादतगाह आज भी सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश देती है। यहां आस्था बदली नहीं, बस उसका स्वर बदल गया।

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गुरुद्वारे में सुशोभित गुरु ग्रंथ साहिब - फोटो : अमर उजाला
1950 में मस्जिद में स्थापित हुआ गुरु ग्रंथ साहिब
गुरुद्वारे के ग्रंथी 71 वर्षीय प्रेम सिंह बताते हैं कि उनके पिता बालूराम बंटवारे के दौरान मुल्तान से भारत आए। कुछ समय चमकौर, अंबाला, पानीपत और शाहाबाद में रहने के बाद वर्ष 1950 में परिवार बिघाना आकर बस गया। वे कहते हैं कि उनका अधिकांश सामान पाकिस्तान में ही छूट गया था लेकिन गुरु ग्रंथ साहिब को साथ लेकर आए। गांव में बनी मस्जिद में ही उसे स्थापित कर दिया गया। तभी से यह मस्जिद गुरुद्वारे में परिवर्तित हो गई। अब यह स्थान गुरुद्वारा साहिब पहली पातशाही श्री गुरु नानक देव जी बिघाना के नाम से जाना जाता है।
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गुरुद्वारा साहिब - फोटो : अमर उजाला
100 से घटकर 20-30 रह गए परिवार
बंटवारे के समय आए करीब 100 परिवारों की संख्या 1975 तक घटकर 70 रह गई। वर्तमान में गांव में 20 से 30 सिख परिवार बचे हैं। गुरुद्वारे के पास प्रेम सिंह का ही परिवार निवास करता है जबकि अन्य परिवार गांव की सीमाओं पर बसे हुए हैं। गांव में सिख समुदाय के दो नम्बरदार और दो महिला पंचायत सदस्य भी हैं।

नियमित पाठ और विशेष आयोजन
गुरु नानक देव जयंती, गुरु अर्जन देव जी और गुरु गोविंद सिंह जी के प्रकाश पर्व पर यहां विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। गुरु का लंगर बरताया जाता है और अखंड पाठ रखा जाता है। सुबह-शाम नियमित रूप से पाठ किया जाता है।
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गुरुद्वारा साहिब के ग्रंथी प्रेम सिंह और खजानची नवीन सिंह - फोटो : अमर उजाला
पिछले वर्ष गिरी थी बिजली
गुरुद्वारा सिंह सभा बिघाना के प्रधान शमशेर सिंह बताते हैं कि पिछले वर्ष गुरुद्वारे के एक हिस्से पर बिजली गिर गई थी जिससे भवन का हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। यह हमारे पूर्वजों की विरासत है, जिसे संरक्षण की जरूरत है।

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धर्म सिंह, भूतपूर्व सरपंच और शमशेर सिंह, गुरुद्वारा सभा के प्रधान - फोटो : अमर उजाला
4.90 लाख रुपये का अनुदान लौटा
गुरुद्वारा सिंह सभा बिघाना के खजांची नवीन सिंह के अनुसार लंगर हॉल निर्माण के लिए 4 लाख 90 हजार रुपये का अनुदान स्वीकृत हुआ था लेकिन भूमि मस्जिद के रूप में दर्ज होने के कारण यह वक्फ बोर्ड के अंतर्गत आती है। तकनीकी कारणों से अनुदान वापस लौट गया। सभा का कहना है कि सरकार और प्रशासन को इस ऐतिहासिक धरोहर की देखरेख सुनिश्चित करनी चाहिए। भगवान एक ही है, बस नाम अलग-अलग हैं। अल्लाह और वाहेगुरु में कोई फर्क नहीं।

गांव का पूरा सहयोग
भूतपूर्व सरपंच 66 वर्षीय धर्म सिंह बताते हैं कि बंटवारे के बाद जब पंजाबी परिवार यहां आए तो उन्होंने मस्जिद को गुरुद्वारा बना लिया। इस निर्णय में पूरे गांव ने सहयोग दिया। 

मस्जिद के नाम पर यह जमीन रजिस्टर्ड होने के चलते बजट वापस लौट गया। यह जमीन ग्राम पंचायत के नाम पर करके विकास कार्य किए जाएंगे- मनप्रीत, सरपंच, बिघाना
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