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बच्चों को बनाया लायक, अब वृद्धाश्रम में कट रहा जीवन
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जनसेवा संस्थान में मौजूद बुजुर्ग। संवाद
- फोटो : Jind
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जींद। व्यक्ति ताउम्र इसी कशमकश में लगा रहता है कि वह अपने बच्चों की जिंदगी कैसे अच्छी बनाए। बावजूद इसके बुढ़ापे में जब उन्हें बच्चों की जरूरत होती है तो कुछ लोगों को यह सुख नसीब नहीं हो पाता। जींद के भिवानी रोड स्थित वृद्धाश्रम में कुछ ऐसे ही लोग रह रहे हैं। उन्होंने बातचीत में अपना दर्द बयान किया।
जिले के एक गांव निवासी 70 वर्षीय जयभगवान पिछले करीब चार साल से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। सूरजभान ने गांव में पहले किराना की दुकान चलाई और फिर सोनीपत में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी की। उनके दो बेटे थे। एक बेटे की मौत हो गई और करीब 11 साल पहले पत्नी की भी मौत होने पर घर में सहारा नहीं मिला। इसके चलते चार साल पहले उन्होंने वृद्धाश्रम को ही अपना घर बना लिया। सूरजभान बताते हैं कि यदि पत्नी होती तो भी उन्हें यहां नहीं रहना होता। हालांकि उन्हें वृद्धाश्रम में किसी प्रकार की कमी नहीं है, लेकिन घर तो घर ही होता है। सूरजभान के अनुसार बेटा कभी-कभी हाल लेता है। कुछ दिन पहले भी फोन आया था कि वह उन्हें लेकर घर जाएगा।
वहीं गुरुग्राम निवासी 65 वर्षीय चंद्रप्रकाश की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। दो बेटे हैं। एक दक्षिण अफ्रीका में रहता है तो दूसरा कानपुर में नौकरी करता है। वह अपने भाई के साथ गुरुग्राम आए थे, लेकिन बच्चों ने कोई सुध नहीं ली। इसके बाद पांच साल से जींद में जनसेवा संस्था द्वारा संचालित वृद्धाश्रम में रह रहे हैं।
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बच्चों को दें संस्कार
जनसेवा संस्थान के प्रबंधक प्रहलादराय गुप्ता ने कहा कि व्यक्ति बच्चों को आरामदायक जिंदगी व तमाम सुविधाएं देने में लगा रहता है, लेकिन संस्कार पीछे छूट जाते हैं। हालांकि जींद में ऐसे लोगों की मदद करने वाले काफी लोग हैं, लेकिन व्यक्ति के लिए घर-घर ही होता है। ऐसे में बच्चों को अच्छे संस्कार दें, ताकि वे माता-पिता की अहमियत समझ सकें। माता-पिता की सेवा भगवान की सेवा से भी बढ़कर होती है।
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जिले के एक गांव निवासी 70 वर्षीय जयभगवान पिछले करीब चार साल से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। सूरजभान ने गांव में पहले किराना की दुकान चलाई और फिर सोनीपत में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी की। उनके दो बेटे थे। एक बेटे की मौत हो गई और करीब 11 साल पहले पत्नी की भी मौत होने पर घर में सहारा नहीं मिला। इसके चलते चार साल पहले उन्होंने वृद्धाश्रम को ही अपना घर बना लिया। सूरजभान बताते हैं कि यदि पत्नी होती तो भी उन्हें यहां नहीं रहना होता। हालांकि उन्हें वृद्धाश्रम में किसी प्रकार की कमी नहीं है, लेकिन घर तो घर ही होता है। सूरजभान के अनुसार बेटा कभी-कभी हाल लेता है। कुछ दिन पहले भी फोन आया था कि वह उन्हें लेकर घर जाएगा।
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वहीं गुरुग्राम निवासी 65 वर्षीय चंद्रप्रकाश की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। दो बेटे हैं। एक दक्षिण अफ्रीका में रहता है तो दूसरा कानपुर में नौकरी करता है। वह अपने भाई के साथ गुरुग्राम आए थे, लेकिन बच्चों ने कोई सुध नहीं ली। इसके बाद पांच साल से जींद में जनसेवा संस्था द्वारा संचालित वृद्धाश्रम में रह रहे हैं।
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बच्चों को दें संस्कार
जनसेवा संस्थान के प्रबंधक प्रहलादराय गुप्ता ने कहा कि व्यक्ति बच्चों को आरामदायक जिंदगी व तमाम सुविधाएं देने में लगा रहता है, लेकिन संस्कार पीछे छूट जाते हैं। हालांकि जींद में ऐसे लोगों की मदद करने वाले काफी लोग हैं, लेकिन व्यक्ति के लिए घर-घर ही होता है। ऐसे में बच्चों को अच्छे संस्कार दें, ताकि वे माता-पिता की अहमियत समझ सकें। माता-पिता की सेवा भगवान की सेवा से भी बढ़कर होती है।