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घर में शांति चाहते हैं तो मन की शांति जरूरी : अभिषेक मुनि
Sun, 04 Jan 2026 11:16 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
Updated Sun, 04 Jan 2026 11:16 PM IST
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04जेएनडी28-अरुण चंद्र महाराज के विहार में शामिल महिलाएं। स्रोत श्रद्धालु
जींद। गुरु मया मदन सुदर्शन संघ प्रमुख अरुण चंद्र महाराज के शिष्य अभिषेक मुनि ने प्रवचन में कहा कि घर में शांति चाहते हो तो सबसे पहले अपने मन में शांति जरूरी है। मन में शांति होगी तो घर में शांति होगी। घर में शांति होगी तो लक्ष्मी का आगमन होगा।
उन्होंने कहा कि जिस घर में शांति नहीं होती वहां लक्ष्मी का वास नहीं होता है। शहरों में लोगों ने धन तो कमा लिया लेकिन मन की शांति नहीं मिल रही है। गांवों में लोगों ने धन नहीं कमाया लेकिन मन की शांति को पाया है। गांव के लोगों के अंदर जो सेवा भाव होता है वैसी सेवा भाव कही मुश्किल से मिल पाती है।
उन्होंने कहा कि परिवार में सुख, शांति के लिए सबसे पहले आपको अपने मन पर कंट्रोल करना होगा। जब तक मन पर कंट्रोल नहीं होगा तो शांति मन को नहीं मिल सकती। माता-पिता का सम्मान जीवन में करना चाहिए। माता-पिता का सम्मान न करेंगे कितनी ही पूजा-अर्चना कर लो उसका कोई फायदा नहीं है।
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माता-पिता की सेवा करके तीर्थ के बराबर पुण्य प्राप्त किया जा सकता है। माता-पिता में सभी तीर्थ होते हैं। हम जैसा करते है हमारे साथ वैसा ही होता है। इसलिए संस्कारी पुत्र बन कर माता-पिता की सेवा करों ताकि आपके बच्चे भी संस्कारवान बन कर बुढ़ापे में आपकी सेवा करें।
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उन्होंने कहा कि जिस घर में शांति नहीं होती वहां लक्ष्मी का वास नहीं होता है। शहरों में लोगों ने धन तो कमा लिया लेकिन मन की शांति नहीं मिल रही है। गांवों में लोगों ने धन नहीं कमाया लेकिन मन की शांति को पाया है। गांव के लोगों के अंदर जो सेवा भाव होता है वैसी सेवा भाव कही मुश्किल से मिल पाती है।
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उन्होंने कहा कि परिवार में सुख, शांति के लिए सबसे पहले आपको अपने मन पर कंट्रोल करना होगा। जब तक मन पर कंट्रोल नहीं होगा तो शांति मन को नहीं मिल सकती। माता-पिता का सम्मान जीवन में करना चाहिए। माता-पिता का सम्मान न करेंगे कितनी ही पूजा-अर्चना कर लो उसका कोई फायदा नहीं है।
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माता-पिता की सेवा करके तीर्थ के बराबर पुण्य प्राप्त किया जा सकता है। माता-पिता में सभी तीर्थ होते हैं। हम जैसा करते है हमारे साथ वैसा ही होता है। इसलिए संस्कारी पुत्र बन कर माता-पिता की सेवा करों ताकि आपके बच्चे भी संस्कारवान बन कर बुढ़ापे में आपकी सेवा करें।