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Haryana Election: वर्चस्व की लड़ाई... हारे तो सियासी जीवन पर ब्रेक; यहां इस बार दिखेगी बृजेंद्र दुष्यंत की जंग

Mon, 02 Sep 2024 03:55 PM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, जींद
अमर उजाला नेटवर्क, जींद Published by: शाहरुख खान Updated Mon, 02 Sep 2024 03:55 PM IST
सार

बांगर की धरती पर इस बार बृजेंद्र और दुष्यंत की जंग दिखेगी। दोनों चुनाव लड़ने का एलान कर चुके हैं। कांग्रेस ने टिकट घोषणा नहीं की है। भाजपा को नए चेहरे पर आस है। 

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Haryana Election Brijendra and Dushyant will compete on land of Bangar both have announced to contest election
Haryana Election - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बांगर की धरती के नाम से जाने जाते उचाना कलां में इस बार प्रत्याशियों के लिए कांटों भरी राह है। यहां से हारे तो सियासी जीवन पर ब्रेक लग सकता है। दो सियासी परिवारों के लिए यहां वर्चस्व की लड़ाई है। एक तरफ साढ़े चार साल तक गठबंधन सरकार में उपमुख्यमंत्री रहने वाले दुष्यंत चौटाला हैं और दूसरी तरफ भाजपा के ही टिकट पर सांसद बनने वाले बृजेंद्र सिंह। 
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बृजेंद्र अभी कांग्रेस में हैं और उनको टिकट मिलना तय है। उनके पिता पूर्व मंत्री बीरेंद्र सिंह भी एलान कर चुके हैं कि बृजेंद्र उचाना कलां से ही चुनाव लड़ेंगे। अब तक 10 बार हुए चुनावों में छह बार उनके परिवार का ही कब्जा रहा है। पिछली बार बीरेंद्र की पत्नी प्रेमलता ही दुष्यंत चौटाला के खिलाफ मैदान में उतरी थीं, लेकिन 46 हजार वोटों के अंतर से हार गई थीं।
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दूसरी तरफ दुष्यंत भी चुनाव लड़ने का एलान कर चुके हैं। उन्हें खिलाफ लोगों में नाराजगी है, क्योंकि 2019 में दुष्यंत को लोगाें ने भाजपा के खिलाफ वोट दिया था, लेकिन बाद में दुष्यंत सरकार में शामिल हो गए और उपमुख्यमंत्री बन गए। किसान आंदोलन में भी लोगों को उनका साथ नहीं मिला। 
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तीन माह पहले हुए लोस चुनाव में उतरीं उनकी माता नैना चौटाला को इस क्षेत्र से दो हजार वोट भी नहीं मिल पाए थे। इस नाराजगी के बीच दुष्यंत को पिछले पांच साल में करवाए गए विकास कार्यों पर भरोसा है। विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद वे हर सप्ताह दो दिन उचाना कलां विधानसभा क्षेत्र में लगाते हैं।

बृजेंद्र के लिए भी यह चुनाव आसान नहीं है। उनके सांसद रहते समय लोगों ने उनकी गुमशुदगी के पोस्टर तक लगा दिए थे। लोगों का कहना था कि बृजेंद्र सिंह लोगों से नहीं मिलते हैं। यह बात खुद बृजेंद्र सिंह ने भी एक बैठक में स्वीकार की थी।

उन्होंने कहा था कि अब वह लोगों के बीच में ही रहेंगे। उसके बाद बृजेंद्र सिंह भी लगातार गांवों के दौरे कर रहे हैं। वहीं, भाजपा को यहां किसी नए चेहरे की तलाश है। ऐसे में किसी एक के भी हारने पर उसके सियासी जीवन पर ब्रेक लगना तय है।

कांग्रेस और जजपा का गणित
दुष्यंत लगातार लोगों की नाराजगी दूर करने में लगे हुए हैं। वह लोगों को अपने कार्यकाल के दौरान किए गए कार्यों का हवाला देकर पकड़ फिर से मजबूत करने में जुटे हैं। बृजेंद्र सिंह के परिवार ने यहां पर छह बार जीत दर्ज की है, ऐसे में बीरेंद्र सिंह परिवार की भी अच्छी पकड़ है। यहां सवा दो लाख मतदाताओं में से सवा लाख वोट जाट समाज के हैं। जाटों ने जिस ओर वोट किया, उसकी चुनावी नैया पार लग सकती है।


 

मुद्दों से ज्यादा चौधर लाने के नारे हावी
2019 के विस चुनाव में भी यहां चौधर लाने का मुद्दा हावी रहा था। दुष्यंत ने चौधर लाने का वादा किया था। वह मुख्यमंत्री तो नहीं बने, लेकिन सरकार में उपमुख्यमंत्री जरूर बने। गांव बरसोला के कैप्टन वेद प्रकाश कहते हैं कि यहां कभी मुद्दों को लेकर चुनाव नहीं होता।
 

यहां पर हमेशा चौधर का नारा दिया जाता है। कांग्रेस में यह नारा पिछले 25 साल से दिया जाता है। चौटाला परिवार ने भी यही नारा दिया है। हालांकि युवाओं काे रोजगार दिलाने, खटकड़ गांव के पास औद्योगिक क्षेत्र स्थापित करने जैसे दावे किए जा रहे हैं।

अब तक बन चुके ये विधायक
1977 में बीरेंद्र सिंह
1982 में बीरेंद्र सिंह
1987 में देशराज
1991 में बीरेंद्र सिंह
1996 में बीरेंद्र सिंह
2000 में भाग सिंह छात्तर
2005 बीरेंद्र सिंह
2009 ओमप्रकाश चौटाला
2014 में प्रेमलता
2019 में दुष्यंत चौटाला।

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