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Jind News: स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बिरसा मुंडा की मनाई जयंती
Mon, 17 Nov 2025 12:43 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
संवाद न्यूज एजेंसी, जींद
Updated Mon, 17 Nov 2025 12:43 AM IST
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16जेएनडी30-सीआरसएयू में स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बिरसा मुंडा जयंती पर हुए कार्यक्रम में सं
जींद। सीआरएसयू में हिंदी विभाग की तरफ से जनजातीय गौरव दिवस का आयोजन किया गया। इस दौरान स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती मनाई गई।
मुख्य अतिथि के रूप में कुलपति प्रो. राम पाल सैनी ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा भारतीय जनजातीय अस्मिता के प्रतीक हैं, जिन्होंने जल-जंगल-जमीन और सांस्कृतिक स्वाधिकारों की रक्षा के लिए असाधारण साहस के साथ संघर्ष किया। बिरसा मुंडा का उलगुलान आंदोलन केवल औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध नहीं था, बल्कि यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक न्याय का भी अद्भुत अध्याय है।
आधुनिक पीढ़ी को उनके जीवन से राष्ट्रप्रेम समानता और न्याय जैसे मूल्यों को आत्मसात करना चाहिए। उन्होंने छात्रों से आह्वान किया कि वे भारतीय सांस्कृतिक बहुलता और आदिवासी परंपराओं को समझने और संरक्षित रखने में सक्रिय भूमिका निभाएं। मुख्य वक्ता प्रो. अशोक कुमार ने कहा कि बिरसा मुंडा का संघर्ष एक राजनीतिक प्रतिकार भर नहीं, बल्कि जनजातीय सांस्कृतिक अस्मिता को पुनर्जीवित करने वाला महान आंदोलन था।
उलगुलान ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ें हिलाकर रख दी थी। उन्होंने आदिवासी समाज में चेतना की नई लहर जगाई। वक्ता डॉ. कामराज सिंधु ने कहा कि बिरसा मुंडा का व्यक्तित्व आदिवासी समाज की सामूहिक चेतना, संघर्ष और संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। उनका बलिदान न केवल जनजातीय स्वतंत्रता चेतना का प्रतीक है, बल्कि भारतीय इतिहास की उन गाथाओं में से है जो सदियों तक प्रेरणा देती रहेंगी।
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उन्होंने बताया कि अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध बिरसा मुंडा ने ऐतिहासिक उलगुलान महान विद्रोह का नेतृत्व किया। भूमि-अधिकार, सांस्कृतिक स्वायत्तता और जल-जंगल-जमीन की रक्षा हेतु यह आंदोलन जनजातीय इतिहास की धुरी बन गया।
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मुख्य अतिथि के रूप में कुलपति प्रो. राम पाल सैनी ने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा भारतीय जनजातीय अस्मिता के प्रतीक हैं, जिन्होंने जल-जंगल-जमीन और सांस्कृतिक स्वाधिकारों की रक्षा के लिए असाधारण साहस के साथ संघर्ष किया। बिरसा मुंडा का उलगुलान आंदोलन केवल औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध नहीं था, बल्कि यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक न्याय का भी अद्भुत अध्याय है।
आधुनिक पीढ़ी को उनके जीवन से राष्ट्रप्रेम समानता और न्याय जैसे मूल्यों को आत्मसात करना चाहिए। उन्होंने छात्रों से आह्वान किया कि वे भारतीय सांस्कृतिक बहुलता और आदिवासी परंपराओं को समझने और संरक्षित रखने में सक्रिय भूमिका निभाएं। मुख्य वक्ता प्रो. अशोक कुमार ने कहा कि बिरसा मुंडा का संघर्ष एक राजनीतिक प्रतिकार भर नहीं, बल्कि जनजातीय सांस्कृतिक अस्मिता को पुनर्जीवित करने वाला महान आंदोलन था।
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उलगुलान ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जड़ें हिलाकर रख दी थी। उन्होंने आदिवासी समाज में चेतना की नई लहर जगाई। वक्ता डॉ. कामराज सिंधु ने कहा कि बिरसा मुंडा का व्यक्तित्व आदिवासी समाज की सामूहिक चेतना, संघर्ष और संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। उनका बलिदान न केवल जनजातीय स्वतंत्रता चेतना का प्रतीक है, बल्कि भारतीय इतिहास की उन गाथाओं में से है जो सदियों तक प्रेरणा देती रहेंगी।
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उन्होंने बताया कि अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध बिरसा मुंडा ने ऐतिहासिक उलगुलान महान विद्रोह का नेतृत्व किया। भूमि-अधिकार, सांस्कृतिक स्वायत्तता और जल-जंगल-जमीन की रक्षा हेतु यह आंदोलन जनजातीय इतिहास की धुरी बन गया।