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आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हड़ताल पर, कैसे मिलेगी प्ले स्कूलों जैसी शिक्षा
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बधाना गांव में स्थित आंगनबाड़ी केंद्र पर लगा ताला। संवाद
- फोटो : Jind
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जींद। सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में नौनिहालों को खेल-खेल में बेहतर शिक्षा देने के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों को प्ले स्कूल में बदल रही है। लेकिन मांगों को लेकर आंगनबाड़ी वर्कर्स व हेल्पर्स हड़ताल पर हैं। जिलेभर में 1400 आंगनबाड़ी केंद्रों पर लगभग 2800 कर्मचारी तैनात हैं। एक आंगनबाड़ी केंद्र पर एक वर्कर व हेल्पर की ड्यूटी होती है। हड़ताल के चलते ज्यादातर आंगनबाड़ी केंद्रों के बाहर ताले लगे मिलते हैं। ऐसे में महिला एवं बाल विकास विभाग का छोटे बच्चों को खेल-खेल में बेहतर शिक्षा देने का दावा धरातल पर फेल होते नजर आ रहा है।
एक तरफ जहां आंगनबाड़ी वर्कर्स व हेल्पर्स हड़ताल पर हैं, वहीं दूसरी ओर प्ले स्कूल मेें बदले जा रहे इन आंगनबाड़ी केंद्रों पर मूलभूत सुविधा भी नहीं हैं। प्ले स्कूलों में छोटे बच्चों के लिए जारी की गई गाइडलाइन के अनुसार स्कूल पूरी तरह से साफ-सुधरे होने चाहिए। स्कूल में बच्चों के खेलने के लिए अलग से प्ले ग्राउंड होना चाहिए। स्कूल में सीसीटीवी कैमरे लगे होने चाहिए। लड़के व लड़कियों के लिए अलग से शौचालयों की व्यवस्था होनी चाहिए। प्राथमिक चिकित्सा उपचार की व्यवस्था होनी चाहिए। यह तमाम व्यवस्थाएं आंगनबाड़ी केंद्रों पर नहीं हैं। ऐसे में नौनिहालों के नाम पर आंगनबाड़ी केंद्रों को प्ले स्कूल में बदला जरूर जा रहा है, लेकिन विभाग वहां बच्चों के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं कर पा रहा है। हालांकि महिला एवं बाल विकास विभाग का दावा है कि इन प्ले स्कूलों में बच्चों के खेलने के लिए खिलौने मंगवाने, स्कूल परिसर साफ-सुथरा होने व उचित खेल का मैदान होने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर वास्तविकता कुछ और ही है। वहीं शहर में स्थित लगभग 80 आंगनबाड़ी केंद्रों में ज्यादातर में दो ही कमरे होते हैं। इसमें से एक में छोटे बच्चों के लिए खाने-पीने का राशन रखा जाता है, वहीं दूसरे कमरे में ही बच्चों को बैठाया जाता है।
महिला एवं बाल विकास विभाग की अतिरिक्त डीपीओ सुमित्रा लाठर ने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्रों को छोटे बच्चों के लिए प्ले स्कूल में बदला जा रहा है। विभाग का प्रयास है कि छोटे बच्चों को बेहतर सुविधा दी जाए, जिससे वह खेल-खेल में पढ़ाई कर पाएं। बच्चों के खेलने के लिए खिलौने व अन्य सामान मंगवाया जा रहा है। इन प्ले स्कूलों में बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास है। उम्मीद है आने वाले दिनों में निजी प्ले स्कूलों की अपेक्षा सरकारी प्ले स्कूलों में बच्चों की संख्या ज्यादा होगी।
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एक तरफ जहां आंगनबाड़ी वर्कर्स व हेल्पर्स हड़ताल पर हैं, वहीं दूसरी ओर प्ले स्कूल मेें बदले जा रहे इन आंगनबाड़ी केंद्रों पर मूलभूत सुविधा भी नहीं हैं। प्ले स्कूलों में छोटे बच्चों के लिए जारी की गई गाइडलाइन के अनुसार स्कूल पूरी तरह से साफ-सुधरे होने चाहिए। स्कूल में बच्चों के खेलने के लिए अलग से प्ले ग्राउंड होना चाहिए। स्कूल में सीसीटीवी कैमरे लगे होने चाहिए। लड़के व लड़कियों के लिए अलग से शौचालयों की व्यवस्था होनी चाहिए। प्राथमिक चिकित्सा उपचार की व्यवस्था होनी चाहिए। यह तमाम व्यवस्थाएं आंगनबाड़ी केंद्रों पर नहीं हैं। ऐसे में नौनिहालों के नाम पर आंगनबाड़ी केंद्रों को प्ले स्कूल में बदला जरूर जा रहा है, लेकिन विभाग वहां बच्चों के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं कर पा रहा है। हालांकि महिला एवं बाल विकास विभाग का दावा है कि इन प्ले स्कूलों में बच्चों के खेलने के लिए खिलौने मंगवाने, स्कूल परिसर साफ-सुथरा होने व उचित खेल का मैदान होने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर वास्तविकता कुछ और ही है। वहीं शहर में स्थित लगभग 80 आंगनबाड़ी केंद्रों में ज्यादातर में दो ही कमरे होते हैं। इसमें से एक में छोटे बच्चों के लिए खाने-पीने का राशन रखा जाता है, वहीं दूसरे कमरे में ही बच्चों को बैठाया जाता है।
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महिला एवं बाल विकास विभाग की अतिरिक्त डीपीओ सुमित्रा लाठर ने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्रों को छोटे बच्चों के लिए प्ले स्कूल में बदला जा रहा है। विभाग का प्रयास है कि छोटे बच्चों को बेहतर सुविधा दी जाए, जिससे वह खेल-खेल में पढ़ाई कर पाएं। बच्चों के खेलने के लिए खिलौने व अन्य सामान मंगवाया जा रहा है। इन प्ले स्कूलों में बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास है। उम्मीद है आने वाले दिनों में निजी प्ले स्कूलों की अपेक्षा सरकारी प्ले स्कूलों में बच्चों की संख्या ज्यादा होगी।
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