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दशलक्षण पर्व : चौथे दिन को उत्तम शौच के रूप में मनाया गया
Mon, 01 Sep 2025 02:09 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, झज्जर/बहादुरगढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, झज्जर/बहादुरगढ़
Updated Mon, 01 Sep 2025 02:09 AM IST
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-फोटो 51 : श्री पद्म प्रभु दिगंबर जैन मंदिर में आराधना करते हुए जैन समाज से जुड़े लोग। स्रोत समा
- फोटो : संवाद
बहादुरगढ़। आत्म कल्याण और आत्म आराधना के पर्यूषण के पावन पर्व पर जैन मंदिरों में सुबह से ही श्रीजी के पूजन अभिषेक सहित अनेक धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। श्री पद्म प्रभु दिगंबर जैन मंदिर समेत शहर के चारों मंदिरों में रविवार को उत्तम शौच धर्म मनाया गया। यह मन, वचन, कर्म की आंतरिक शुद्धता को समर्पित है। इस दिन श्रद्धालु मन में लोभ और मोह से मुक्ति पाने और आंतरिक पवित्रता बनाए रखने का संकल्प लेते हैं, जो मोक्ष के मार्ग की ओर ले जाती है। उत्तम शौच धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति के मन की अपवित्रता और मलिनता दूर होती है।
अनाजमंडी पांडूशिला समिति प्रधान सुनील जैन ने उत्तम शौच धर्म जो जैन धर्म के दशलक्षणों में से एक है और इसका अर्थ आंतरिक पवित्रता है न कि केवल बाहरी स्वच्छता। इस दिन लोग अपने मन में लोभ और आसक्ति को रोकने के लिए चिंतन करते हैं।
उन्होंने कहा कि मनुष्य में लोभ ही समस्त पापों की जड़ है जिसके वशीभूत होकर मानव पाप-अपराध करते हैं। लोभ सबसे बड़ा शत्रु है। लोभ के कारण ही भाई, भाई का शत्रु और पुत्र, पिता का शत्रु बना है।
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दीपक जैन नेे कहा समाज में व्याप्त हिंसा, अनाचार, भ्रष्टाचार, चोरी, अपहरण हत्या, अपराध सब लोभ के कारण ही होता है। इसमें लोभ की प्रवृत्ति रहेगी, उसमें शुचिता-पवित्रता संभव ही नहीं। इन मलिन विकारों पर विजय प्राप्त करने के लिए निर्मलता, समता भाव का होना अति आवश्यक है।
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अनाजमंडी पांडूशिला समिति प्रधान सुनील जैन ने उत्तम शौच धर्म जो जैन धर्म के दशलक्षणों में से एक है और इसका अर्थ आंतरिक पवित्रता है न कि केवल बाहरी स्वच्छता। इस दिन लोग अपने मन में लोभ और आसक्ति को रोकने के लिए चिंतन करते हैं।
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उन्होंने कहा कि मनुष्य में लोभ ही समस्त पापों की जड़ है जिसके वशीभूत होकर मानव पाप-अपराध करते हैं। लोभ सबसे बड़ा शत्रु है। लोभ के कारण ही भाई, भाई का शत्रु और पुत्र, पिता का शत्रु बना है।
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दीपक जैन नेे कहा समाज में व्याप्त हिंसा, अनाचार, भ्रष्टाचार, चोरी, अपहरण हत्या, अपराध सब लोभ के कारण ही होता है। इसमें लोभ की प्रवृत्ति रहेगी, उसमें शुचिता-पवित्रता संभव ही नहीं। इन मलिन विकारों पर विजय प्राप्त करने के लिए निर्मलता, समता भाव का होना अति आवश्यक है।