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झील की हालत दयनीय होने के कारण पक्षियो की संख्या हुई कम
ब्यूरो/अमर उजाला/झज्जर
Updated Fri, 25 Dec 2015 12:04 AM IST
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भिंडावास वन्य प्राणी विहार व झील इन दिनों अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। सर्दी के मौसम में विदेशों से आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या में साल दर साल कमी आती जा रही है साथ ही पर्यटकों के आने का सिलसिला भी कम हो गया है। इसके बावजूद प्रशासन का इस ओर कोई ध्यान नहीं है साथ ही सरकारी पैसे का दुरुपयोग भी हो रहा है। यही नहीं यहां पर तैनात स्टाफ भी परेशानियों का सामना कर रहा है।
गूगल में अपनी जगह बना चुकी भिंडावास झील व वन्य प्राणी विहार की हालत साल दर साल दयनीय होती जा रही है। 1986 में बनी 12 किलोमीटर क्षेत्र में फैले वन्य प्राणी विहार का मार्ग कच्चा पड़ा है जबकि 1017 एकड़ में फैली झील में जलकुंभी उग आई है। हर साल यहां पर सर्दियों के मौसम में साइबेरियन पक्षी प्रवास के लिए आते हैं और दो से तीन महीने यहां ठहरते हैं। लेकिन देखभाल ना होने के कारण यहां पर हर साल प्रवासी पक्षियों के आने का सिलसिला कम होता जा रहा है। 190 से भी ज्यादा तरह के प्रवासी पक्षी सर्दी के मौसम में यहां आते हैं। लेकिन इनकी संख्या लगातार कम हो रही है।
एक तिहाई हिस्से में उगी है जलकुंभी
झील के एक तिहाई हिस्से से भी ज्यादा में जलकुंभी उग आई है लेकिन इसकी सफाई की ओर प्रशासन का कोई ध्यान नहीं है। पूर्व में दिसंबर तक विदेशी पक्षी यहां पहुंचते रहे हैं लेकिन इस बार दिसंबर बीतने को है लेकिन अब तक एकाध तरह के विदेशी पक्षी ही यहां पहुंचे है। झील व वन्य प्राणी विहार के इस 12 किलोमीटर के क्षेत्र में छह गांव कनवाह, नवादा, चाढवाना, रेढूवास, बिलोचपुरा और शाहजहांपुर लगते हैं और यहां के ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन झील व वन्य प्राणी विहार के प्रति उदासीन है। यहां ना तो कभी साफ सफाई की जाती है और ना ही देखरेख के लिए कोई अधिकारी कभी आता है। अगर यहां अधिकारी इस ओर कोई ध्यान दे तो झील व वन्य प्राणी विहार का सुधार हो सकता है साथ ही पर्यटकों की संख्या में इजाफा होने से ग्रामीणों को आर्थिक लाभ भी होगा।
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पर्यटकों के लिए यहां पर म्यूजियम भी बनाया गया है लेकिन उसकी भी हालत खराब है। यहां पर तैनात इंसपेक्टर का कहना है कि स्टाफ की यहां भारी कमी है। झील व वन्य प्राणी विहार के देखभाल की जिम्मेवारी केवल एक गार्ड के कंधे पर ही है। जबकि यहां पर कम से कम 8 गार्डों की जरूरत है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भी जरूरत है। साथ ही स्टाफ को एक गन, टॉर्च, वायरलेस व गाड़ी की जरूरत भी पड़ती है लेकिन इसमें से काई भी चीज उनके पास नहीं है जिस कारण सुरक्षा के लिहाज से भी यह सुरक्षित नहीं है। ना ही यहां कोई कैंटिन है और ना ही पार्किंग की व्यवस्था।
हर साल करोड़ों की मिलती है ग्रांट
यहां करोडों रुपये की ग्रांट हर साल केंद्र व राज्य सरकारों के द्वारा भेजी जाती है। लेकिन वह ग्रांट कौन हजम कर रहा है इसका भी कोई पता नहीं है। ग्रांट केवल कागजों में ही लगाई जा रही है। पिछले साल भी केंद्र सरकार की ओर से 60 लाख रुपये व राज्य सरकार की ओर से 30 लाख रुपये झील, वन्य प्राणी विहार व म्यूजियम की देखरेख के लिए आए थे। लेकिन यहां के हालात का जायजा लेने के बाद यह एहसास भी नहीं होता कि यहां एक रुपया भी लगा होगा। म्यूजियम में कोई कर्मचारी तैनात नहीं है जो यहां पर आने वाले पर्यटकों को इसकी पूरी जानकारी दे सके। यहां पर आने वाले पर्यटकों के लिए रखी गई पुस्तिका में पर्यटकों द्वारा सुविधाएं ना होने बात साफ तौर पर लिखी गई है।
डीसी अनीता यादव से जब इस बारे में बात की तो उन्होंने जानकारी जुटाने के लिए 3-4 दिन का समय मांगा। उन्होंने कहा कि जिला उनके लिए नया है। वे झील के बारे में पूरी जानकारी जुटाएंगी। कहीं कोई गड़बड़ी है तो जांच के बाद उचित कार्रवाई होगी।
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गूगल में अपनी जगह बना चुकी भिंडावास झील व वन्य प्राणी विहार की हालत साल दर साल दयनीय होती जा रही है। 1986 में बनी 12 किलोमीटर क्षेत्र में फैले वन्य प्राणी विहार का मार्ग कच्चा पड़ा है जबकि 1017 एकड़ में फैली झील में जलकुंभी उग आई है। हर साल यहां पर सर्दियों के मौसम में साइबेरियन पक्षी प्रवास के लिए आते हैं और दो से तीन महीने यहां ठहरते हैं। लेकिन देखभाल ना होने के कारण यहां पर हर साल प्रवासी पक्षियों के आने का सिलसिला कम होता जा रहा है। 190 से भी ज्यादा तरह के प्रवासी पक्षी सर्दी के मौसम में यहां आते हैं। लेकिन इनकी संख्या लगातार कम हो रही है।
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एक तिहाई हिस्से में उगी है जलकुंभी
झील के एक तिहाई हिस्से से भी ज्यादा में जलकुंभी उग आई है लेकिन इसकी सफाई की ओर प्रशासन का कोई ध्यान नहीं है। पूर्व में दिसंबर तक विदेशी पक्षी यहां पहुंचते रहे हैं लेकिन इस बार दिसंबर बीतने को है लेकिन अब तक एकाध तरह के विदेशी पक्षी ही यहां पहुंचे है। झील व वन्य प्राणी विहार के इस 12 किलोमीटर के क्षेत्र में छह गांव कनवाह, नवादा, चाढवाना, रेढूवास, बिलोचपुरा और शाहजहांपुर लगते हैं और यहां के ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन झील व वन्य प्राणी विहार के प्रति उदासीन है। यहां ना तो कभी साफ सफाई की जाती है और ना ही देखरेख के लिए कोई अधिकारी कभी आता है। अगर यहां अधिकारी इस ओर कोई ध्यान दे तो झील व वन्य प्राणी विहार का सुधार हो सकता है साथ ही पर्यटकों की संख्या में इजाफा होने से ग्रामीणों को आर्थिक लाभ भी होगा।
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पर्यटकों के लिए यहां पर म्यूजियम भी बनाया गया है लेकिन उसकी भी हालत खराब है। यहां पर तैनात इंसपेक्टर का कहना है कि स्टाफ की यहां भारी कमी है। झील व वन्य प्राणी विहार के देखभाल की जिम्मेवारी केवल एक गार्ड के कंधे पर ही है। जबकि यहां पर कम से कम 8 गार्डों की जरूरत है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भी जरूरत है। साथ ही स्टाफ को एक गन, टॉर्च, वायरलेस व गाड़ी की जरूरत भी पड़ती है लेकिन इसमें से काई भी चीज उनके पास नहीं है जिस कारण सुरक्षा के लिहाज से भी यह सुरक्षित नहीं है। ना ही यहां कोई कैंटिन है और ना ही पार्किंग की व्यवस्था।
हर साल करोड़ों की मिलती है ग्रांट
यहां करोडों रुपये की ग्रांट हर साल केंद्र व राज्य सरकारों के द्वारा भेजी जाती है। लेकिन वह ग्रांट कौन हजम कर रहा है इसका भी कोई पता नहीं है। ग्रांट केवल कागजों में ही लगाई जा रही है। पिछले साल भी केंद्र सरकार की ओर से 60 लाख रुपये व राज्य सरकार की ओर से 30 लाख रुपये झील, वन्य प्राणी विहार व म्यूजियम की देखरेख के लिए आए थे। लेकिन यहां के हालात का जायजा लेने के बाद यह एहसास भी नहीं होता कि यहां एक रुपया भी लगा होगा। म्यूजियम में कोई कर्मचारी तैनात नहीं है जो यहां पर आने वाले पर्यटकों को इसकी पूरी जानकारी दे सके। यहां पर आने वाले पर्यटकों के लिए रखी गई पुस्तिका में पर्यटकों द्वारा सुविधाएं ना होने बात साफ तौर पर लिखी गई है।
डीसी अनीता यादव से जब इस बारे में बात की तो उन्होंने जानकारी जुटाने के लिए 3-4 दिन का समय मांगा। उन्होंने कहा कि जिला उनके लिए नया है। वे झील के बारे में पूरी जानकारी जुटाएंगी। कहीं कोई गड़बड़ी है तो जांच के बाद उचित कार्रवाई होगी।