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Jhajjar-Bahadurgarh News: बिना पर्यावरण मंजूरी के चल रही रेगमार फैक्टरी पर होगी कार्रवाई, जांच के आदेश

Mon, 24 Aug 2026 01:21 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, झज्जर/बहादुरगढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, झज्जर/बहादुरगढ़ Updated Mon, 24 Aug 2026 01:21 AM IST
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Action to be taken against sandpaper factory operating without environmental clearance; probe ordered.
फोटो-56: याकूबपुर स्थित रिलायंस एसईजेड में बनी फैक्टरी। स्रोत सोशल मीडिया
संवाद न्यूज एजेंसी
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बहादुरगढ़। याकूबपुर स्थित रिलायंस मेट सिटी के विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) में करीब आठ एकड़ में रेगमार बनाने वाली कोरियन बेस डियरफोस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड कंपनी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति के बिना ही चल रही है।
करीब 300 करोड़ से ज्यादा के निवेश वाली दक्षिण कोरिया की कंपनी की यह इकाई पिछले करीब दो साल से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की आवश्यक एनओसी और पर्यावरणीय मंजूरी के बिना संचालित की जा रही है। बहादुरगढ़ निवासी कुलदीप से मिली शिकायत के बाद हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एचएसपीसीबी) ने इस मामले की जांच के आदेश दिए हैं। एसडीओ इस मामले की जांच करेंगे। साथ ही फैक्टरी पर नियमानुसार कानूनी कार्रवाई करने की बात बोर्ड की क्षेत्रीय अधिकारी ने कही है।
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दरअसल, बहादुरगढ़ के याकूबपुर स्थित रिलायंस एसईजेड में साउथ कोरिया बेस की डीयरफोस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड में अब्रासिव बेल्ट, अब्रासिव सीट, अब्रासिव वेल्क्रो डिस्क, मेंबरीन, मोप व्हील आदि रेगमार टाइप के उत्पाद बनाती है।
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एचएसपीसीबी को दी शिकायत में कुलदीप ने आरोप लगाया कि फैक्टरी जिस गतिविधि में संचालित हो रही है, वह प्रदूषण की दृष्टि से अधिक गंभीर श्रेणी में आती है। ऐसे में फैक्टरी को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से आवश्यक अनुमति लेनी बहुत जरूरी है, जिनमें सीटीई (स्थापना हेतु सहमति) और सीटीओ (संचालन हेतु सहमति) शामिल है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि वर्ष 2023 में इसी स्थान पर दूसरे नाम से संचालित इकाई के भवन को ग्रैप नियमों के उल्लंघन के चलते सील किया गया था। उस समय पांच लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। यह जुर्माना मुख्य रूप से निर्माण नियमों से संबंधित था और मामला अदालत में भी विचाराधीन है।
कुलदीप का यह भी आरोप है कि इसके बावजूद उसी स्थान पर नाम बदलकर फैक्टरी दोबारा संचालित कर दी गई। दावा है कि इकाई में 300 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या केवल नाम बदलने से पहले की कार्रवाई और पर्यावरणीय नियमों की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?
शिकायतकर्ता ने बोर्ड के अधिकारियों की भी कथित मिलीभगत का आरोप लगाते हुए पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच और फैक्टरी की पर्यावरणीय स्वीकृतियों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एनओसी तथा वास्तविक उत्पादन गतिविधियों की जांच की मांग की।

शिकायकर्ता ने बोर्ड से फैक्टरी का व्यापक निरीक्षण कराने, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की स्थापना व संचालन सहमति, पर्यावरणीय मंजूरी और खतरनाक अपशिष्ट प्राधिकरण की जांच करने तथा उल्लंघन मिलने पर कानूनी कार्रवाई और पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाने की मांग की है।
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