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24 गांवों में चकबंदी न होने से राजस्व विभाग और ग्रामीणों की बढ़ी उलझनें

Tue, 13 Nov 2018 01:00 AM IST
Updated Tue, 13 Nov 2018 01:00 AM IST
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24 गांवों में चकबंदी न होने से राजस्व विभाग और ग्रामीणों की बढ़ी उलझनें
अमर उजाला ब्यूरो
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चरखी दादरी। जिले के जिन गांवों में चकबंदी नहीं हुई है उन गांवों में राजस्व विभाग व ग्रामीणों को परेशानी बनी हुई है। राजस्व विभाग को जमीन की पैमाइश करने में दिक्कतें आती हैं वहीं ग्रामीणों को गांव में फिरनी व रास्तों की सुविधा नहीं मिल पा रही है। आजादी के बाद आज भी जिले के 24 गांव ऐसे हैं जिनमें चकबंदी नहीं हुई है।
जिले में 172 गांव हैं। इन गांवों में लाल डोरा की सीमा के अलावा कृषि योग्य कुल रकबा एक लाख 20 हजार हैक्टेयर क्षेत्र है। राजस्व विभाग का चकबंदी के तहत नियम है कि प्रत्येक एकड़ का क्षेत्रफल 36 गुणा 40 क्रम में होना चाहिए। एक एकड़ 4840 वर्ग गज यानी आठ कनाल का माना जाता है। इस प्रकार प्रत्येक गांव में इसी अनुपात में प्रति एकड़ जमीन निर्धारण का नियम बना रखा है। चकबंदी के दौरान इसी नियम को लागू किया जाता है।
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चकबंदी के तहत उस गांव में सरकारी फिरनी व रास्तों का प्रावधान किया जाता है। इससे ग्रामीणों को आवागमन में परेशानी नहीं होती। रास्ते की चौड़ाई का भी न्यूनतम 18 फीट का प्रावधान होता है। जिन गांवों में चकबंदी नहीं हुई है वहां इस समय रास्ते टेढ़े-मेढ़े व काफी तंग बने हुए हैं रास्तों का कोई निर्धारित साइज भी नहीं है जिससे वाहनों का गुजरना भी मुश्किल हो जाता है। इन रास्तों का पूर्ण निकास भी नहीं होता। कुछ दूरी में ही यह रास्ते बंद होते हैं। किसानों को खेतों में आने जाने के लिए रास्ते नहीं होते। उन्हें खेतों में से ही आना-जाना पड़ता है। ऐसे में खेतों में खड़ी फसल के दौरान ट्रैक्टर आदि ले जानेे में ज्यादा दिक्कतें आती हैं।
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ऐसे गांवों में पैमाइश की होती है दिक्कत
इन गांवों में किसी सरकारी प्रोजेक्ट के लिए जब राजस्व विभाग को जमीन की पैमाइश करनी होती है तो बड़ी दिक्कतें आती हैं। इन गांवों का बरसो पुराना रिकॉर्ड होने व अधिकतर उर्दू भाषा में होने की वजह से पटवारियों को भी दिक्कत बनी हुई है। जमीन की पैमाइश के लिए पटवारियों व गिरदावर को पैमाइश शुरूआत करने के लिए मेन प्वाइंट ही नहीं मिलता जहां से पैमाइश शुरू की जा सके। वर्षों पुराने रिकॉर्ड को समझना भी मुश्किल बना हुआ है। इसके साथ ग्रामीणों को जमीन बेचने व खरीदने करने में भी काफी उलझनेें आती हैं।
इन गांवों में बन रही विकट समस्या
फिलहाल गांव रामबास, कांहड़ा, उमरवास, लाडावास, नीमड़ बडेसरा, पिचौपा खुर्द, खोरड़ा, चंदेनी, गोकुल, झोझू खुर्द, माई कलां, माई खुर्द, तिवाला, गुडाना, ढाणी फौगाट, बीड़ समसपुर, कुब्जानगर, अटेला खुर्द, जगरामबास, लाड, बेरला, खेड़ी, निहालगढ़, बिंद्रावन शामिल हैं। चकबंदी कार्य के दौरान जिन किसानों की जमीन गांव की सीमा में अलग-अलग भागों में होती है उसे रिकॉर्ड में एक जगह इकट्ठा कर दिया जाता है ताकि उसे खेती करने में सुविधा हो लेकिन कुछेेक किसानों की जमीन रास्तों आदि में कट भी जाती है। जमीन के इस आंकड़ों के फेरबदल में कई किसानों की जमीन तराई एरिया में तो किसी की जमीन बरानी एरिया में दर्ज कर दी जाती है इससे उन्हें नुकसान भी होता है। इस वजह से ग्रामीण विरोध कर बैठते हैं और चकबंदी का काम सिरे नहीं चढ़ पाता।


विभाग ने कुछ दिन पहले कई गांवों में चकबंदी का कार्य शुरू करवाया है। चकबंदी कार्य में ग्रामीणों को विभाग का सहयोग करना चाहिए। चकबंदी न होने से जमीन की पैमाइश करने में बड़ी दिक्कत आ रही है। इन गांवों में रास्ते व फिरनी नहीं हैं। ग्रामीण भी परेशान हैं।
-राजकुमार अरोड़ा, जिला राजस्व अधिकारी
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