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जुबां छिपाती रही दर्द... नम आंखों ने बयां किया हाल

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 11 Oct 2021 12:12 AM IST
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The pain kept hiding the tongue... moist eyes told the condition
पिंकू यादव
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हिसार। कहते हैं कि बाजार में हर चीज आसानी से मिल जाती है, लेकिन मां जैसी जन्नत और पिता जैसा साया कहीं नहीं मिल सकता। जब तक सिर पर माता-पिता का साया है, सभी परेशानियां छोटी लगती हैं। लेकिन आज समाज इतना संवेदनहीन हो गया है कि लोग माता-पिता को ही परेशानी समझने लगे हैं। बेटों की चेतना मर रही है। हालात ये हैं कि कड़ी मेहनत कर बच्चों को शिखर तक पहुंचाने वाले माता-पिता को वृद्धाश्रम का सहारा लेना पड़ रहा है। कैमरी रोड़ स्थित मोक्षाश्रम में एक मां ऐसी भी है, जिसने दो बेटियों और एक बेटे को पाल-पोस कर बड़ा कर दिया, उन्हें कामयाब बना दिया, लेकिन अब होटलों का बिजनेस करने वाले बेटे के पास अपनी मां तक के लिए भी समय नहीं है। दिल्ली राजौरी गार्डन की रहने वाली 83 वर्ष की किरण ओहरी वाईएमसीए में अंग्रेजी की प्राध्यापिका थीं। उनके पति दिल्ली में बीसटी टेक्सटाइल मिल में जरनल मैनेजर के पद पर कार्यरत थे, जो 33 वर्ष पहले दुनिया को अलविदा कह चुके। किरण ओहरी दो वर्षों से हिसार के मोक्ष वृद्धाश्रम में रह रही हैं। दो वर्षों से बच्चों ने कोई संपर्क नहीं किया। संवाद
मैं चाहती थी कि मेरे बच्चे किसी से पीछे न रहें...मुझे ही पीछे छोड़ गए
किरण ओहरी ने कहा कि पति के निधन के बाद मैंने अपने बच्चों की परवरिश इतने अच्छे से की कि आज वे तीनों अपनी जिंदगी में अच्छे मुकाम पर हैं। उनकी बड़ी बेटी बंगलूरू में और छोटी बेटी कैथल में और बेटा दिल्ली में रहता है। किरण ओहरी का कहना है कि उनके बेटे को अच्छा पैकेज मिलता है। उसका होटलों का अच्छा बिजनेस है। वे कहती हैं कि मैंने शुरू से ही अपने बच्चों पर बहुत ध्यान दिया है। मैंने उन्हें कंप्यूटर, ड्राइविंग, फैशन डिजाइनिंग सब सिखाया। मैं चाहती थी कि मेरे बच्चे कभी किसी से पीछे न रहें, लेकिन किस्मत का किसी को नहीं पता होता आज मेरे बच्चे इतने आगे निकल गए कि उनके पास मेरे लिए ही समय नहीं है।
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मैं खुश हूं....भगवान का रूप हैं मोक्ष आश्रम के मालिक
किरण ओहरी कहती हैं कि हिसार में बने इस मोक्ष वृद्धाश्रम के बारे में मुझे किसी ने नहीं कुछ नहीं बताया था। बस मैंने जस्ट डायल नंबर डायल किया और किस्मत ने मुझे यहां भेज दिया। यहां मैं बहुत खुश हूं... इस मोक्ष आश्रम के मालिक में मैंने भगवान का रूप देखा हैं। यहां मुझे बहुत इज्जत और प्यार मिलता है।
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बच्चे छोड़ गए, नहीं छूटी मां की ममता
चेहरे पर हंसी, दिल में दर्द और आंखों में नमी लिए बैठी एक मां के पास अपने बच्चों के लिए अच्छे या बुरे कोई शब्द नहीं हैं। दर्द इतना बढ़ चुका है कि वे अपने बच्चों के बारे में कोई बात ही नहीं करना चाहती हैं। उनका कहना है कि जिनकी वजह से हम यहां हैं, उनके बारे में क्या बातें करनी... पुरानी बातों को याद कर या दोहराकर खुद को दुखी करने के अलावा महज और कुछ नहीं है। वे कहती हैं कि जो बच्चे अपने मां-बाप का साथ नहीं दे सकते मैं उनको बददुआएं भी नहीं देना चाहती, क्योंकि वे बद्दुआएं भी वापस हम पर ही उल्टी पड़ती हैं।
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