{"_id":"645fd3592903ffb6400b1f8b","slug":"research-irrigation-in-paddy-field-by-awd-method-will-reduce-methane-emission-by-48-percent-30-percent-water-will-be-saved-hisar-news-c-21-hsr1034-132437-2023-05-13","type":"story","status":"publish","title_hn":"शोध: AWD विधि से धान के खेत में सिंचाई से 48 प्रतिशत तक कम होगा मिथेन का उत्सर्जन, 30 प्रतिशत बचेगा पानी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शोध: AWD विधि से धान के खेत में सिंचाई से 48 प्रतिशत तक कम होगा मिथेन का उत्सर्जन, 30 प्रतिशत बचेगा पानी
Sun, 14 May 2023 01:37 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
उदयभान त्रिपाठी, अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)
उदयभान त्रिपाठी, अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)
Updated Sun, 14 May 2023 01:37 AM IST
सार
मिथेन गैस का उत्सर्जन अधिक होता है, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। हरियाणा व पंजाब के अलावा पश्चिमी यूपी समेत देश के विभिन्न हिस्सों में सिंचाई के साधनों पर भी अधिक खर्च होता है।
विज्ञापन
एडब्ल्यूडी तकनीक के तहत जलमग्न खेत में पानी नापने का तरीका।
विस्तार
धान के खेतों में सिंचाई के दौरान पानी की खपत कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान केंद्र (आईआरआरआई) ने नई तकनीक खोजी है। इसे नाम दिया गया है एडब्ल्यूडी अर्थात अल्टरनेटिव वेटिंग एंड ड्राइंग यानी बार-बार गीला और सूखा करना।
विज्ञापन
फिलीपींस की इस तकनीक में खेत में लगे एक फीट के प्लास्टिक पाइप के जरिए नमी का पता लगाकर सिंचाई की जाएगी। इससे सिंचाई में 30 प्रतिशत पानी बचेगा, वहीं मिथेन गैस का उत्सर्जन भी 48 प्रतिशत तक कम होगा। यह तकनीक हरियाणा, पंजाब व पश्चिमी यूपी में सबसे अधिक फायदेमंद है।
विज्ञापन
धान की खेती में रोपाई से लेकर सिंचाई तक अत्यधिक पानी की जरूरत होती है। रोपाई के बाद महीने भर तक किसान खेत में लगातार पानी जमा रखते हैं। इससे मिथेन गैस का उत्सर्जन अधिक होता है, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। हरियाणा व पंजाब के अलावा पश्चिमी यूपी समेत देश के विभिन्न हिस्सों में सिंचाई के साधनों पर भी अधिक खर्च होता है।
विज्ञापन
अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान केंद्र के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र वाराणसी के वैज्ञानिक डॉ. विपिन अहलावत बताते हैं कि धान की खेती में पानी की बचत के लिए एडब्ल्यूडी तकनीक खोजी है। इस तकनीक को अब देश भर में प्रचारित किया जा रहा है। हरियाणा, पंजाब व पश्चिमी यूपी में सिंचाई के लिए यह तकनीक सबसे अधिक फायदेमंद है।
प्लास्टिक के पाइप या बांस से बना सकते हैं उपकरण
यह विधि सरल है और इसके निर्माण में खर्च भी कम है। डॉ. विपिन ने बताया कि किसान को प्लास्टिक या बांस का एक फीट लंबा पाइप लेना है, जिसका व्यास 6 इंच हो। इसके आधे हिस्से में ढाई सेंटीमीटर की दूरी पर छिद्र बना ले। इस छिद्र वाले हिस्से को खेत के सबसे समतल क्षेत्र में मेड़ के नजदीक जमीन में 15 सेंटीमीटर दबा दें। पाइप के अंदर की पूरी मिट्टी निकाल दें। यह देख लें कि खेत में जमा पानी व पाइप के अंदर के पानी का तल समान है।
पानी सूख जाए तो करें पांच सेंटीमीटर सिंचाई
धान के पौधों की जड़ें जमीन में 15 सेंटीमीटर तक फैली होती हैं। इस वाटर ट्यूब का निचला तल भी खेत के तल से 15 सेंटीमीटर नीचे होता है। जब वाटर ट्यूब के निचले तल पर पानी सूख जाए तो किसान को खेत की सिंचाई करनी चाहिए। एक बार में 5 सेंटीमीटर तक पानी भरना चाहिए। खेत में धान की रोपाई के दो सप्ताह बाद इस विधि से सिंचाई करनी चाहिए और फूल बनते वक्त इस विधि का प्रयोग बंद कर देना चाहिए।