Quit india movement: देश में पहली बार हिसार से शुरू हुई अगस्त क्रांति, रेलवे लाइन उखाड़ने का किया था प्रयास
भारत छोड़ो आंदोलन की चिंगारी देश में पहली बार पुराने हिसार जिले से शुरू हुई थी। क्रांतिकारियों ने आदमपुर और भट्टू में रेलवे लाइन को उखाड़ने का प्रयास किया। डाकघर और तारघर में आग लगा दी गई और फिर खुद थानों में जाकर गिरफ्तारियां दीं।
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अंग्रेजों से भारत को कैसे आजाद कराएं, इस बारे में कांग्रेस वर्किंग कमेटी के नेताओं ने मुंबई में 8 अगस्त 1942 को बैठक की। उसमें कोई निर्णय लेते उससे पहले अंग्रेजों ने कमेटी के सभी सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया। उस समय गांधी ने नारा दिया 'करो या मरो'। जब इसका पता भारत वासियों को चला तो भारत छोड़ो आंदोलन की चिंगारी फैल गई। उस चिंगारी की आग पुराने हिसार जिले में पहुंची। देश में पहली बार क्रांतिकारियों ने आदमपुर और भट्टू में रेलवे लाइन को उखाड़ने का प्रयास किया। सिरसा, हिसार, हांसी, भिवानी रेलवे स्टेशनों पर तोड़फोड़ की गई। डाकघर और तारघर में आग लगा दी गई। खुद थानों में जाकर गिरफ्तारियां दीं।
चटर्जी लाइब्रेरी बना क्रांतिकारियों का मुख्यालय
इतिहासकार प्रोफेसर महेंद्र सिंह बताते हैं कि 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत के साथ जिला हिसार में भी क्रांतिकारियों ने अपनी गतिविधियां बढ़ा दी। क्रांतिकारियों का मुख्यालय नागोरी गेट स्थित चटर्जी लाइब्रेरी था। कटला रामलीला मैदान में बैठक होती थी और सातरोड गांव स्थित लाला हरदेव सहाय स्कूल में क्रांति का प्रचार-प्रसार किया जाता था।
गांव के बच्चे एक-दूसरे से मिलकर प्रचार करते थे। क्रांति के दौरान अंग्रेजी शासन ने पंडित नेकी राम शर्मा, लाला श्याम लाल, साहिब राम, बलवंत राय तायल, दादा गणेशी लाल, जय सिंह, श्यामलाल, कृपाराम, श्योकरण, हरदेव सहाय को गिरफ्तार कर लिया था। चटर्जी लाइब्रेरी को सील कर दिया था। कटला रामलीला मैदान में मीटिंगों पर रोक लगा दी थी। क्रांति को आगे बढ़ाना था तो ऐसे में जो बचे नेता थे वो भूमिगत हो गए थे।
सार्वजनिक तौर पर पहली बार हुई थी तोड़फोड़
पुराने हिसार जिले में पहली बार सिरसा, हांसी, फतेहाबाद, भिवानी और हिसार में सार्वजनिक तौर पर तोड़फोड़ की गई थी। सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया था। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारियों में आक्रोश था। नेताओं की गिरफ्तारी के बाद खुद अपनी गिरफ्तारी को लेकर पुलिस थानों में पहुंच गए थे। रिपोर्ट के अनुसार उस समय 5200 लोगों ने थानों में जाकर गिरफ्तारियां दी थी। बच्चे गांव-गांव में जाकर उनके खाने-पीने का व्यवस्था करते थे और जेलों में देकर आते थे।
भूमिगत नेताओं को नहीं ढूंढ पाई थी अंग्रेजी हुकूमत
जिले के क्रांतिकारी बड़े नेताओं को अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार कर लिया था। उसके बाद भारत छोड़ो आंदोलन को आगे चलाने और लोगों तक पहुंचाने के लिए बाकी बचे नेताओं ने जिम्मेदारी ली। वे सभी भूमिगत हो गए और दिन में किसान खेतों में और दुकानदार अपनी दुकानों में बैठते थे ताकि अंग्रेजों को शक ना हो। रात के समय भूमिगत नेता गांव-गांव जाकर लोगों से संपर्क करते और क्रांति के बारे में जागरूक करते। नेताओं ने दिन के समय बैठक करना बंद कर दिया था। अंग्रेजी हुकूमत भूमिगत नेताओं को कभी पकड़ नहीं सकी और भूमिगत नेता अपने इरादों में कामयाब भी हुए।
72 लोगों ने अपने पिता का नाम गांधी बताया था
इतिहासकार बताते हैं कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब पुलिस क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए सिसाय गांव में गई तो पुलिस वालों ने जिस किसी से भी नाम पूछा तो उसने अपना नाम दौलतराम बताया। पुलिस ने उस दौरान 72 लोगों को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तार किए गए सभी 72 लोगों ने अपना नाम दौलत और पिता का नाम गांधी बताया था। पुलिस भी हैरान थी, बाद में सभी को छोड़ दिया गया।
तायल को नहीं छोड़ने का मुद्दा इंग्लैंड की पार्लियामेंट में गूंजा था
बलवंत राय तायल को अंग्रेजी शासन ने हिसार जिले के 20 नेताओं के साथ गिरफ्तार किया था। कुछ दिनों के बाद बलवंत राय तायल को छोड़कर सभी को पुलिस ने आजाद कर दिया था।। बलवंत राय तायल को न छोड़ने पर इंग्लैंड की पार्लियामेंट में यह मुद्दा गूंजा था और वहां से तायल को छोड़ने के आदेश हुए थे। दो दिन के बाद पुलिस ने बलवंत राय तायल को छोड़ दिया था।