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हिंदी में पत्राचार के आदेश, फिर भी अंग्रेजी में पत्राचार कर रहे विभाग
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हिसार। हिंदी को राष्ट्रीय भाषा कहा जाता है लेकिन आज के समय में अधिकतर पाठ्यक्रम अंग्रेजी में करवाए जाते हैं। हिंदी को बचाने के लिए समय-समय पर काम करने के दावे किए गए, लेकिन बड़े स्तर पर ऐसा नहीं हुआ है। शिक्षण संस्थानों के जरिए हिंदी को बढ़ावा जरूर दिया गया है। गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय में हिंदी में बीटेक शुरू की गई तो अब एफसी कॉलेज में हाल ही में हिंदी एमए शुरू की गई। हिंदी को हिंदी दिवस पर ही याद किया जाता है। समय-समय पर सरकार हिंदी भाषा में ही पत्राचार करने के आदेश देती हैं, लेकिन इसके बावजूद विभिन्न विभाग अंग्रेजी में ही पत्राचार करते हैं। जानिए हिंदी दिवस पर हिंदी के प्राध्यापकों की राय....
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डॉ. कविता सिंधु खरींटा ने बताया कि हिंदी राजभाषा का यह दुर्भाग्य है कि हिंदी भाषा मौसमी भावुकता का अवसर बनकर रह गई है। इस दिन सरकारी और गैर सरकारी मंचों से हिंदी की जमकर प्रशंसा की जाएगी और साथ में उसकी उपेक्षा का रोना भी रोया जाएगा। परंतु उन कमियों की बात शायद ही कोई करेगा, जिनकी वजह से हिंदी आज तक राष्ट्रीय स्तर पर राज-काज की अकेली भाषा नहीं बन पाई या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसे अपेक्षित गौरव हासिल नहीं हो पाया। वह कल भी भावनाओं की भाषा थी, आज भी भावनाओं की ही भाषा है। हमारे दिलों में ठहरी हुई। उसके बारे में दिमाग से सोचने की जरूरत ही नहीं महसूस की हमने। हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या देश-दुनिया में हमेशा से ज्यादा है। हिंदी भाषी अपनी भाषा के प्रति जितने भावुक हैं, काश उतने व्यवहारिक भी होते। यकीन मानिए कि अगर अगले कुछ दशकों में हिंदी को ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी शिक्षा की भाषा के रूप में विकसित नहीं किया जा सका तो हमारी आने वाली पीढ़ियां इसे गंवारों की भाषा कहकर अस्वीकार कर देंगी।
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एफसी कॉलेज की लेक्चरर पुष्पा ने बताया कि आज का बच्चा ना हिंदी जानता है और न ही अंग्रेजी। बदलते समय के साथ बच्चों की भाषा बदल रही है। हमारा आधार हिंदी ही है लेकिन आज के समय में बच्चे को मात्राओं का भी ज्ञान नहीं होता। अभिभावक भी उन्हें अंग्रेजी की तरफ भगा रहे हैं, लेकिन बच्चे न तो पूरी अंग्रेजी सीख पाए और न ही हिंदी।
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हिंदी ने मुझे मान, सम्मान, पद, प्रतिष्ठा सब दिया है। जो लोग कहते हैं हिंदी में रोजगार नहीं हैं। उनको यह बताना चाहता हूं कि हिंदी में एमए करने के बाद मैं एक दिन भी बेरोजगार नहीं रहा। बल्कि नौकरियां उनके पास खुद चल कर आई थी। अखबार में काम किया फिर मुझे हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष पद की पेशकश मिली, जिसे मैंने स्वीकार किया। आज भी स्वतंत्र लेखन करते हुए हिंदी मुझे सब कुछ दे रही है। यह भ्रम टूट जाना चाहिए कि हिंदी में रोजगार नहीं है।
- कमलेश भारती, साहित्यकार।
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हिंदी विश्व स्तर पर बहुत बड़े भू भाग पर बोली जाती है। अगर हिंदी के मानक रूप की बात करें तो जरूरी नहीं कि उसे संस्कृत निष्ठ रूप में बोला जाए। चूंकि कोई भी भाषा वार्तालाप का माध्यम है अगर वह वार्तालाप में काम न आई तो फिर भाषा का महत्व क्या रह जाएगा। इसलिए हिंदी में भी अगर कोई अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश होता है तो उसे घृणित दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। अक्सर जब सोशल मीडिया पर कोई रचना या लेख लिखते हैं तो बहुत से बुद्धिजीवी सवाल खड़ा कर देते हैं कि हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों का समावेश सही नहीं है। अगर आज के संदर्भ में बात करें तो युवा पीढ़ी हिंदी को बहुत कम पढ़ रही है। इसलिए अंग्रेजी के शब्दों का समावेश जरूरी हो गया है।
- एमके कागदाना लेखिका, हिंदी प्राध्यापिका, जाट कॉलेेज हिसार।
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डॉ. कविता सिंधु खरींटा ने बताया कि हिंदी राजभाषा का यह दुर्भाग्य है कि हिंदी भाषा मौसमी भावुकता का अवसर बनकर रह गई है। इस दिन सरकारी और गैर सरकारी मंचों से हिंदी की जमकर प्रशंसा की जाएगी और साथ में उसकी उपेक्षा का रोना भी रोया जाएगा। परंतु उन कमियों की बात शायद ही कोई करेगा, जिनकी वजह से हिंदी आज तक राष्ट्रीय स्तर पर राज-काज की अकेली भाषा नहीं बन पाई या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसे अपेक्षित गौरव हासिल नहीं हो पाया। वह कल भी भावनाओं की भाषा थी, आज भी भावनाओं की ही भाषा है। हमारे दिलों में ठहरी हुई। उसके बारे में दिमाग से सोचने की जरूरत ही नहीं महसूस की हमने। हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या देश-दुनिया में हमेशा से ज्यादा है। हिंदी भाषी अपनी भाषा के प्रति जितने भावुक हैं, काश उतने व्यवहारिक भी होते। यकीन मानिए कि अगर अगले कुछ दशकों में हिंदी को ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी शिक्षा की भाषा के रूप में विकसित नहीं किया जा सका तो हमारी आने वाली पीढ़ियां इसे गंवारों की भाषा कहकर अस्वीकार कर देंगी।
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एफसी कॉलेज की लेक्चरर पुष्पा ने बताया कि आज का बच्चा ना हिंदी जानता है और न ही अंग्रेजी। बदलते समय के साथ बच्चों की भाषा बदल रही है। हमारा आधार हिंदी ही है लेकिन आज के समय में बच्चे को मात्राओं का भी ज्ञान नहीं होता। अभिभावक भी उन्हें अंग्रेजी की तरफ भगा रहे हैं, लेकिन बच्चे न तो पूरी अंग्रेजी सीख पाए और न ही हिंदी।
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हिंदी ने मुझे मान, सम्मान, पद, प्रतिष्ठा सब दिया है। जो लोग कहते हैं हिंदी में रोजगार नहीं हैं। उनको यह बताना चाहता हूं कि हिंदी में एमए करने के बाद मैं एक दिन भी बेरोजगार नहीं रहा। बल्कि नौकरियां उनके पास खुद चल कर आई थी। अखबार में काम किया फिर मुझे हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष पद की पेशकश मिली, जिसे मैंने स्वीकार किया। आज भी स्वतंत्र लेखन करते हुए हिंदी मुझे सब कुछ दे रही है। यह भ्रम टूट जाना चाहिए कि हिंदी में रोजगार नहीं है।
- कमलेश भारती, साहित्यकार।
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हिंदी विश्व स्तर पर बहुत बड़े भू भाग पर बोली जाती है। अगर हिंदी के मानक रूप की बात करें तो जरूरी नहीं कि उसे संस्कृत निष्ठ रूप में बोला जाए। चूंकि कोई भी भाषा वार्तालाप का माध्यम है अगर वह वार्तालाप में काम न आई तो फिर भाषा का महत्व क्या रह जाएगा। इसलिए हिंदी में भी अगर कोई अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश होता है तो उसे घृणित दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। अक्सर जब सोशल मीडिया पर कोई रचना या लेख लिखते हैं तो बहुत से बुद्धिजीवी सवाल खड़ा कर देते हैं कि हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों का समावेश सही नहीं है। अगर आज के संदर्भ में बात करें तो युवा पीढ़ी हिंदी को बहुत कम पढ़ रही है। इसलिए अंग्रेजी के शब्दों का समावेश जरूरी हो गया है।
- एमके कागदाना लेखिका, हिंदी प्राध्यापिका, जाट कॉलेेज हिसार।