{"_id":"67880a7d901abac9940162aa","slug":"national-startup-day-dreams-bloomed-in-plastic-pots-returned-from-canada-and-formed-a-company-now-earning-in-lakhs-hisar-news-c-21-1-hsr1007-545888-2025-01-16","type":"story","status":"publish","title_hn":"Hisar News: राष्ट्रीय स्टार्टएप दिवस... प्लास्टिक के गमलों में खिले सपने...कनाडा से लौट कंपनी बनाई, अब लाखों में कमाई","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Hisar News: राष्ट्रीय स्टार्टएप दिवस... प्लास्टिक के गमलों में खिले सपने...कनाडा से लौट कंपनी बनाई, अब लाखों में कमाई
विज्ञापन
करनाल के काछवा गांव निवासी नितिन ललित ढक्कन से बनाए गमले के साथ।
अमित भारद्वाज
हिसार। खुद का बिजनेस शुरू करने का जुनून नितिन को स्वदेश खींच लाया। कनाडा की अच्छी-खासी नौकरी छोड़ अपने देश में प्लास्टिक को रिसाइकिल कर गमले बनाने का छोटा सा स्टार्ट-अप शुरू किया। आज सवा सौ लोगों को इस रोजगार से जोड़ दिया। उनके गमलों की ऑनलाइन अच्छी मांग है। उनके इस स्टार्ट-अप का सालाना टर्नओवर 65 लाख तक पहुंच गया है। नितिन अब अपने सपने को और विस्तार देने में लगे हैं।
करनाल के काछवा गांव निवासी नितिन ललित ने बताया कि वह हमेशा से कुछ अलग करना चाहते थे। पिता जयकिशन ललित बैंक से सेवानिवृत्त हैं। उन्होंने कर्ज लेकर पढ़ने के लिए कनाडा भेज दिया। वर्ष 2009-10 में बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वहीं जनरल मोटर्स कंपनी में सर्टिफाइड जर्नीमैन टेक्नीशियन की नौकरी शुरू कर दी। चार लाख रुपये महीने की अच्छी-खासी नौकरी थी लेकिन, बेगाने देश में अपनों से दूर सुकून नहीं था।
आखिरकार नितिन ने स्वदेश लौटने का फैसला ले लिया। 2016 में भारत आ गए। इसी बीच केंद्र सरकार की ओर से स्टार्ट-अप कार्यक्रम की शुरुआत की गई। नितिन ने बताया कि इस कार्यक्रम ने अपना बिजनेस करने के उनके सपने को पंख लगा दिए। उन्होंने काफी शोध किया और पाया कि प्लास्टिक की बोतलों को लोग इधर-उधर फेंक देते हैं। कचरा बीनने वाले बोतलें तो ले जाते, लेकिन ढक्कन छोड़ देते। उन्होंने इसी प्लास्टिक कचरे को रिसाइिकल करने का संकल्प लिया। अपना शोध कार्य पूरा कर 2017 में अल्फा एडवांटेक नाम से कंपनी बनाई और करनाल में काम शुरू कर दिया।
विज्ञापन
प्लास्टिक के ढक्कनों की मदद से उन्होंने खूबसूरत गमले बनाने शुरू किए। इसका अच्छा रिस्पांस भी मिला। आज सात साल बाद उनकी इस छोटी सी कंपनी का टर्नओवर करीब 65 लाख रुपये सालाना पहुंच गया है। नितिन कहते हैं कि इस स्टार्ट-अप ने मुझे आत्मविश्वास और संतोष दिया है। मैं हमेशा से कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे पर्यावरण का कुछ बचाव हो सके। इस नवाचार की बदौलत मुझे 2018-19 में इंडियन नर्सरी मैन एसो. की ओर से इमरजिंग टेक्नोलॉजी ऑफ द ईयर का पुरस्कार दिया गया।
एचएयू से मिले प्रशिक्षण ने दिखाईं नई राहें : नितिन बताते हैं कि मैं वर्ष 2019 में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के इनक्यूबेशन सेंटर में अपना आइडिया लेकर गया। वहां इसे पसंद किया गया। प्रशिक्षण के बाद 24 लाख रुपये की आर्थिक मदद मिली। सबसे पहले गमले बनाने की बड़ी मशीन बनवाई।
विज्ञापन
हिसार। खुद का बिजनेस शुरू करने का जुनून नितिन को स्वदेश खींच लाया। कनाडा की अच्छी-खासी नौकरी छोड़ अपने देश में प्लास्टिक को रिसाइकिल कर गमले बनाने का छोटा सा स्टार्ट-अप शुरू किया। आज सवा सौ लोगों को इस रोजगार से जोड़ दिया। उनके गमलों की ऑनलाइन अच्छी मांग है। उनके इस स्टार्ट-अप का सालाना टर्नओवर 65 लाख तक पहुंच गया है। नितिन अब अपने सपने को और विस्तार देने में लगे हैं।
करनाल के काछवा गांव निवासी नितिन ललित ने बताया कि वह हमेशा से कुछ अलग करना चाहते थे। पिता जयकिशन ललित बैंक से सेवानिवृत्त हैं। उन्होंने कर्ज लेकर पढ़ने के लिए कनाडा भेज दिया। वर्ष 2009-10 में बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वहीं जनरल मोटर्स कंपनी में सर्टिफाइड जर्नीमैन टेक्नीशियन की नौकरी शुरू कर दी। चार लाख रुपये महीने की अच्छी-खासी नौकरी थी लेकिन, बेगाने देश में अपनों से दूर सुकून नहीं था।
विज्ञापन
आखिरकार नितिन ने स्वदेश लौटने का फैसला ले लिया। 2016 में भारत आ गए। इसी बीच केंद्र सरकार की ओर से स्टार्ट-अप कार्यक्रम की शुरुआत की गई। नितिन ने बताया कि इस कार्यक्रम ने अपना बिजनेस करने के उनके सपने को पंख लगा दिए। उन्होंने काफी शोध किया और पाया कि प्लास्टिक की बोतलों को लोग इधर-उधर फेंक देते हैं। कचरा बीनने वाले बोतलें तो ले जाते, लेकिन ढक्कन छोड़ देते। उन्होंने इसी प्लास्टिक कचरे को रिसाइिकल करने का संकल्प लिया। अपना शोध कार्य पूरा कर 2017 में अल्फा एडवांटेक नाम से कंपनी बनाई और करनाल में काम शुरू कर दिया।
विज्ञापन
प्लास्टिक के ढक्कनों की मदद से उन्होंने खूबसूरत गमले बनाने शुरू किए। इसका अच्छा रिस्पांस भी मिला। आज सात साल बाद उनकी इस छोटी सी कंपनी का टर्नओवर करीब 65 लाख रुपये सालाना पहुंच गया है। नितिन कहते हैं कि इस स्टार्ट-अप ने मुझे आत्मविश्वास और संतोष दिया है। मैं हमेशा से कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे पर्यावरण का कुछ बचाव हो सके। इस नवाचार की बदौलत मुझे 2018-19 में इंडियन नर्सरी मैन एसो. की ओर से इमरजिंग टेक्नोलॉजी ऑफ द ईयर का पुरस्कार दिया गया।
एचएयू से मिले प्रशिक्षण ने दिखाईं नई राहें : नितिन बताते हैं कि मैं वर्ष 2019 में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के इनक्यूबेशन सेंटर में अपना आइडिया लेकर गया। वहां इसे पसंद किया गया। प्रशिक्षण के बाद 24 लाख रुपये की आर्थिक मदद मिली। सबसे पहले गमले बनाने की बड़ी मशीन बनवाई।