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बचपन की सेहत पर बस्ता भारी

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 01 May 2022 11:45 PM IST
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heavy on childhood health
संदीप रामायण
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हिसार। बस्ते के बोझ से दबे होने के कारण पैदल चलना भी मुश्किल हो रहा था। छुट्टी होने पर बस्ते को संभालने में वह परेशान नजर आया। कक्षा पूछी तो बच्चे ने कहा कि वह पहली कक्षा में पढ़ता है। बस्ते को लेकर देखा तो वजन 4 किलो से अधिक ही जान पड़ा। जबकि पहली कक्षा के बस्ते के लिए अधिकतम 1.6 किलोग्राम का वजन निर्धारित है। अमर उजाला की पड़ताल में स्कूल के ज्यादातर बच्चों के बैग निर्धारित वजन से ज्यादा रहे। यह स्कूल महज एक बानगी है। यह हाल शहर के ज्यादातर निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का है।
भविष्य उज्ज्वल करने वाली पुस्तकें ही अगर स्कूली बच्चों पर सितम ढाने लगे तो बच्चे उन पर ध्यान कैसे लगा पाएंगे। चिलचिलाती गर्मी में स्कूली सफर, भारी भरकम बैग बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालने लगा है। बच्चों की पीठ पर क्षमता से अधिक वजन को चिकित्सक उनके स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक बता रहे हैं। स्थिति कुछ ऐसी हो गई है कि किताबों का वजन बच्चों की उम्र के आधा है। बच्चों का यह दर्द अभिभावक महसूस तो करते हैं, लेकिन फिर बच्चों के भविष्य को लेकर एक आशा की किरण बच्चों के बस्ते के बोझ को दूर कर देती है।
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प्ले स्कूल के पाठ्यक्रम को छोड़ दें तो नर्सरी कक्षा से ही पुस्तकों की संख्या विषयानुसार बढ़ने लगती हैं। एक-एक विषय की कई पुस्तकें विद्यार्थियों के थैले में देखी जा सकती हैं। कुछ व्याकरण के नाम पर तो कुछ अभ्यास-पुस्तिका के नाम पर। शिक्षाविदों का कहना है कि बचपन जब अभिभवावकों की महत्वाकांक्षाओं से जुड़ जाता है तो बचपन एक निश्चित समय सीमा में बंधकर रह जाता है। दौर शुरू होता है तब जब बच्चा स्कूल में जाना शुरू कर देता है। अधिकतर अभिभावक अपने बच्चों को पांच वर्ष का होने से पहले ही स्कूलों में भेजना शुरू कर देते हैं। ऐसे में स्कूलों में लगने वाली पुस्तकों के बोझ के नीचे बचपन दब जाता है। अक्सर देखा जाता है कि निजी स्कूलों के छात्रों के बस्ते का वजन उसके बोझ से ज्यादा हो गया है। संवाद
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झुककर चलने को विवश हैं विद्यार्थी
भारी भरकम बस्ता उठाए विद्यालय जाते छात्रों को देखना तो अच्छा लगता है, पर इस वजन को उठाते हुए उनकी कमर झुक जाती है। वे झुककर चलने को विवश रहते हैं। इससे कम उम्र में ही उन्हें रीढ़ की हड्डी में दर्द रहने की समस्या शुरू हो जाती है। इसका सीधा असर बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ता है और उन्हें अल्पायु में ही चश्मा लग जाता है।
बस्ते का बोझ बढ़ने के कारण
बस्ते का बोझ बढ़ने के मुख्यतया दो कारण बताए गए हैं पहला यह कि अभिभावक भारी भरकम बस्ते को देखकर खुश होते हैं कि उनका बच्चा अन्य बच्चों की तुलना में ज्यादा पढ़ रहा है। दूसरा कारण हैं कि प्राइवेट स्कूल के प्रबंधकों की लालची प्रवृत्ति। वे पाठ्यक्रम में अधिक से अधिक पुस्तकें शामिल करवा देते हैं, ताकि अभिभावकों से अधिक से अधिक धन वसूल किया जा सके।
पहली से 5वीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के बैग में मिला कितना वजन
कक्षा विद्यार्थी का वजन बैग का वजन
दूसरी 10 किलोग्राम 4.700 किलोग्राम
पहली 9 किलोग्राम 4 किलोग्राम
तीसरी 14 किलोग्राम 5.150 किलोग्राम
पांचवीं 19 किलोग्राम नौ किलोग्राम
स्कूल बैग वजन का ये है प्रावधान
निदेशालय के सर्कुलर अनुसार प्री-प्राइमरी स्तर के 10 से 16 किलोग्राम वजन वाले बच्चों के लिए स्कूल बैग न ले जाने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं, पहली और दूसरी कक्षाओं के 16 से 22 किलो वजन वाले बच्चों के लिए स्कूल बैग का वजन 1.6 से 2.2 किलोग्राम तय किया गया है। इसी प्रकार तीसरी, चौथी व 5वीं कक्षा के 17 से 25 किलो वजन वाले विद्यार्थियों के लिए स्कूल बैग के भार की सीमा 1.7 से 2.5 किलो रखी गई है। छठी व सातवीं कक्षाओं के 20 से 30 किलो वजन वाले विद्यार्थियों के लिए बैग के वजन की सीमा 2 से 3 किलोग्राम निर्धारित है। आठवीं कक्षा के 25 से 40 तक वजन वाले विद्यार्थियों के लिए स्कूल बैग के वजन की सीमा 2.5 से 4 किलो तक निर्धारित है।

सरकार की गाइडलाइन के अनुसार की पुस्तकों का निर्धारण करना चाहिए। मेरा स्कूल संचालकों से कहना है कि पाठ्यक्रम के अलावा अन्य अनाव्यशक पुस्तकें न लगाएं। एनसीआरटी की पुस्तकों से ही पढ़ाई करवाएं। बच्चे को स्कूल जाने से पहले अपना स्कूल बेग जरूर संभालना चाहिए। अभिभावकों को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए।
- धनपत राम, जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी, हिसार
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