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इन-सीटू अवशेष प्रबंधन तकनीक से किसान अब धान वाले खेत में कर सकेंगे आलू की बिजाई

Fri, 06 Nov 2020 11:42 PM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Fri, 06 Nov 2020 11:42 PM IST
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HAU scientiest inovate new machine
इन-सीटू अवशेष प्रबंधन तकनीक से खेत तैयार करते हुए। (फाइल फोटो) - फोटो : Hisar
हिसार। धान की फसल वाले खेत में आलू की बिजाई करने वाले किसानों के लिए खुशखबरी है। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने धान की पराली के प्रबंधन का इन-सीटू अवशेष प्रबंधन तकनीक से हल निकाला है। इसके प्रयोग से अब पराली को बिना जलाए व खेत के अंदर ही उपयोग कर आलू की बिजाई की जा सकेगी।
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इस पराली प्रबंधन तकनीक को हाल ही में अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान प्रोजेक्ट (आलू) की वार्षिक कार्यशाला में स्वीकृति मिल चुकी है। यह कार्यशाला केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला के निदेशक डॉ. मनोज कुमार की अध्यक्षता में शिमला में हुई थी। इस तकनीक को उन क्षेत्रों के लिए सिफारिश किया गया है, जहां किसान धान की फसल के बाद आलू की बिजाई करते हैं।
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इन वैज्ञानिकों ने किया अनुसंधान
पराली प्रबंधन की इन-सीटू अवशेष प्रबंधन तकनीक पर कृषि महाविद्यालय के सब्जी विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. अरुण कुमार भाटिया के नेतृत्व मेें डॉ. विजय पाल पंघाल, डॉ. लीला बोरा व क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थान उचानी (करनाल) से डॉ. धर्मबीर यादव के सहयोग से अनुसंधान किया गया। इस तकनीक के लिए लगातार दो वर्ष तक उचानी में ट्रायल लगाए गए और उसके बाद सकारात्मक परिणाम आने के बाद किसानों के लिए सिफारिश की गई।
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किसानों को यह आ रही थी मुख्य समस्या
अनुसंधान निदेशक डॉ. एसके सहरावत ने बताया कि पराली की कटाई की समस्या व फसल अवशेषों के पारंपरिक उपयोग की कमी के कारण आज किसान समस्याओं का सामना कर रहा। अक्तूबर माह में ही धान की कटाई होती है और इसी माह में आलू की बिजाई की जाती है। इसी के चलते ऐसी तकनीक विकसित करना जरूरी था, जिससे किसानों को इस समस्या से निजात मिल सके।
बनी रहेगी भूमि की उर्वरा शक्ति
पराली प्रबंधन की इस इन-सीटू अवशेष प्रबंधन तकनीक को अपनाकर किसान एक ओर जहां फसल विविधीकरण को अपना सकेंगे तो दूसरी ओर भूमि की उर्वरा शक्ति भी कायम रहेगी। फसल अवशेष जलाने से पर्यावरण प्रदूषण के साथ-साथ भूमि व जनजीवन के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं। ऐसे में किसान आलू लगाकर फसल चक्र अपनाते हुए भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाए रखेंगे और जमीन भी अगली फसल की बिजाई तक खाली नहीं रखनी पड़ेगी।
ऐसे कर सकते हैं किसान इस तकनीक का उपयोग
डॉ. विजय पाल पंघाल ने बताया कि धान की फसल की कटाई के बाद और आलू बोने से पहले धान की फसल के अवशेषों को अच्छी तरह से ट्रैक्टर चालित पैडी स्ट्रा चॉपर एवं सह स्प्रेडर के साथ खेत में फैला देना चाहिए। फिर 50 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव के बाद 500 लीटर प्रति हेक्टेयर डीकंपोजर और 500 लीटर प्रति हेक्टेयर गोबर घोल का छिड़काव करें। इसके बाद डिस्क हैरो और रोटावेटर की सहायता से जुताई करते हुए पूरे खेत में मिला देना चाहिए। साथ ही विश्वविद्यालय की समग्र सिफारिशों का उपयोग करते हुए आलू की बिजाई करनी चाहिए।

पराली प्रबंधन की समस्या से मिल सकेगी निजात : प्रोफेसर समर सिंह
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर समर सिंह ने बताया कि यह अवशेष प्रबंधन तकनीक उन क्षेत्रों के किसानों के लिए अधिक कारगर साबित हो सकती है, जहां किसान धान की फसल के तुरंत बाद आलू की बिजाई करते हैं। इससे फसल चक्र को भी मदद मिलेगी और भूमि की उर्वरा शक्ति भी कायम रहेेगी। साथ ही पर्यावरण प्रदूषण से भी निजात मिलेगी। उन्होंने वैैज्ञानिकों को इसके लिए बधाई दी।
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