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Hisar News: हांसी के मशहूर कांजी के बड़े, आज भी 70 साल पुराना स्वाद
Sun, 24 May 2026 12:28 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार
संवाद न्यूज एजेंसी, हिसार
Updated Sun, 24 May 2026 12:28 AM IST
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हांसी में रेहड़ी पर ग्राहकों को कांजी के बड़े देते हुए।
हांसी। ऐतिहासिक नगरी हांसी केवल अपने किले व बड़सी गेट के लिए ही नहीं बल्कि अपने अनूठे खान-पान के स्वाद के लिए भी जानी जाती है। इसी स्वाद की फेहरिस्त में शामिल है हांसी के कांजी के बड़े जिसकी शुरुआत आज से लगभग 70 वर्ष पहले प्रह्लाद राय सैनी ने की थी। शुरुआती दौर में प्रह्लाद राय सैनी पूरे शहर में अपने सिर पर मटका रखकर घूम-घूम कर बड़े बेचा करते थे। आज उनकी तीसरी पीढ़ी इस स्वाद की विरासत को संभाल रही है।
गर्व कीजिए हांसी में हैं में आज हम जानेंगे हांसी के कांजी के बड़ों के बारे में। प्रह्लाद राय सैनी ने जब आजादी के ठीक बाद इस काम की शुरुआत की थी, तब वे दिनभर में महज 2 रुपये 20 पैसे का काम करते थे। शुरुआती संघर्ष के दिनों में किसी मददगार ने सहयोग करके उन्हें एक रेहड़ी दिलवाई थी। पिछले 55 वर्षों से यह रेहड़ी ऐतिहासिक बड़सी गेट के बाहर अपनी पहचान बनाए हुए है। वह घर में बड़े बनाते हैं।
राजस्थानी कारीगर से सीखा हुनर
बइस स्वाद के पीछे का इतिहास भी बेहद दिलचस्प है। प्रह्लाद राय सैनी से पहले लाल सड़क पर राजस्थान का एक व्यक्ति कांजी के बड़े बेचता था। उसने करीब 25 से 30 साल हांसी में काम किया। प्रह्लाद राय ने उस राजस्थानी व्यक्ति को काम करते देखा और उससे यह हुनर सीखा जो आज हांसी की पहचान बन चुका है। कांजी के बड़े बनाने के लिए मूंग धुली की दाल को रातभर भिगोया जाता है और सुबह पीसकर कड़ाही में शुद्ध बड़े तैयार किए जाते हैं। फिर उन्हें राई व नमक के पानी से भरे मटके में रखा जाता है। इसे खाने के लिए साथ में चटनी दी जाती है। अमचूर की लाल रंग की चटनी बनाई जाती है। शाम करीब सात बजे रेहड़ी लगती है और महज तीन घंटे में 1000 से ज्यादा बड़े बिक जाते हैं। इसमें पैकिंग करवाकर भी ले जाते हैं। - बंसी भगत, प्रह्लाद राय के बेटे।
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दूर-दूर से आते हैं कद्रदान, तीसरी पीढ़ी संभाल रही कमान
हांसी के इस कांजी बड़े का क्रेज सिर्फ स्थानीय लोगों में ही नहीं है। दिल्ली, हिसार, रोहतक और भिवानी जैसे अन्य शहरों से आने वाले लोग विशेष रूप से बड़सी गेट रुककर इसका स्वाद लेते हैं। इसके स्वाद का यह आलम है कि दूसरे शहरों में भी हांसी के कांजी के बड़े के नाम से रेहड़ियां व स्टॉल लगी हुई हैं। खासकर हिसार, फतेहाबाद, सिरसा की तरफ ऐसा देखा जाता है। प्रह्लाद राय सैनी के बाद अब उनकी विरासत को उनके बेटे बंसी भगत, पोते प्रवीन व अजय और बंसी भगत के भांजे नानू राम सैनी मिलकर संभाल रहे हैं।
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गर्व कीजिए हांसी में हैं में आज हम जानेंगे हांसी के कांजी के बड़ों के बारे में। प्रह्लाद राय सैनी ने जब आजादी के ठीक बाद इस काम की शुरुआत की थी, तब वे दिनभर में महज 2 रुपये 20 पैसे का काम करते थे। शुरुआती संघर्ष के दिनों में किसी मददगार ने सहयोग करके उन्हें एक रेहड़ी दिलवाई थी। पिछले 55 वर्षों से यह रेहड़ी ऐतिहासिक बड़सी गेट के बाहर अपनी पहचान बनाए हुए है। वह घर में बड़े बनाते हैं।
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राजस्थानी कारीगर से सीखा हुनर
बइस स्वाद के पीछे का इतिहास भी बेहद दिलचस्प है। प्रह्लाद राय सैनी से पहले लाल सड़क पर राजस्थान का एक व्यक्ति कांजी के बड़े बेचता था। उसने करीब 25 से 30 साल हांसी में काम किया। प्रह्लाद राय ने उस राजस्थानी व्यक्ति को काम करते देखा और उससे यह हुनर सीखा जो आज हांसी की पहचान बन चुका है। कांजी के बड़े बनाने के लिए मूंग धुली की दाल को रातभर भिगोया जाता है और सुबह पीसकर कड़ाही में शुद्ध बड़े तैयार किए जाते हैं। फिर उन्हें राई व नमक के पानी से भरे मटके में रखा जाता है। इसे खाने के लिए साथ में चटनी दी जाती है। अमचूर की लाल रंग की चटनी बनाई जाती है। शाम करीब सात बजे रेहड़ी लगती है और महज तीन घंटे में 1000 से ज्यादा बड़े बिक जाते हैं। इसमें पैकिंग करवाकर भी ले जाते हैं। - बंसी भगत, प्रह्लाद राय के बेटे।
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हांसी के इस कांजी बड़े का क्रेज सिर्फ स्थानीय लोगों में ही नहीं है। दिल्ली, हिसार, रोहतक और भिवानी जैसे अन्य शहरों से आने वाले लोग विशेष रूप से बड़सी गेट रुककर इसका स्वाद लेते हैं। इसके स्वाद का यह आलम है कि दूसरे शहरों में भी हांसी के कांजी के बड़े के नाम से रेहड़ियां व स्टॉल लगी हुई हैं। खासकर हिसार, फतेहाबाद, सिरसा की तरफ ऐसा देखा जाता है। प्रह्लाद राय सैनी के बाद अब उनकी विरासत को उनके बेटे बंसी भगत, पोते प्रवीन व अजय और बंसी भगत के भांजे नानू राम सैनी मिलकर संभाल रहे हैं।