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पिता के पास थे बेटा-बेटी, मां ने कोर्ट को गुमराह कर ले लिया भरण-पोषण का आदेश
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हिसार। पति के साथ रह रहे बेटा-बेटी के भरण पोषण के लिए एक महिला ने अपने ही पति के खिलाफ आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत केस दायर किया। झूठे साक्ष्य देकर अपने पक्ष में अदालत का आदेश हासिल करने के आरोप में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी शिफा की अदालत ने हिसार निवासी महिला सुमन जांगड़ा को 14 जुलाई को पेश होने के लिए समन जारी किया है। पारिवारिक न्यायालय के रीडर हेमंत कुमार ने महिला के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 193 के तहत शिकायत दायर की है।
इस बारे में महिला के पति अनिल कुमार ने पारिवारिक न्यायालय के अतिरिक्त प्रिंसिपल जज सूर्य चंद्रकांत की अदालत में सीआरपीसी की धारा 340 के तहत याचिका दायर की थी। अपनी याचिका में उन्होंने बताया कि उसकी पत्नी सुमन ने गत 5 अप्रैल 2017 को उसके खिलाफ सीआरपीसी की धारा 125 के तहत केस दायर किया। महिला ने दावा किया कि उसका एक बेटा व एक बेटी उसके पास है, इसलिए उसको उसके पति से भरण पोषण दिलवाया जाए। अदालत ने 18 जनवरी 2019 को अनिल को आदेश दिया कि वह अपनी पत्नी को 30 हजार रुपये प्रति माह और दोनों बच्चों के लिए 30 हजार रुपये प्रतिमाह दें। जब अनिल ने यह राशि नहीं दी तो उसके खिलाफ वसूली वारंट जारी कर दिए गए, जिसकी राशि करीब 30 लाख रुपये थी।
अनिल ने अदालत को बताया कि उसकी पत्नी जब यह याचिका दायर की थी, उससे छह दिन पूर्व 30 मार्च 2017 को उसके ससुर ने पुलिस को शिकायत दी थी कि एक व्यक्ति उसकी बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया, इसलिए उसको बरामद किया जाए। जब पुलिस ने उसकी पत्नी के बयान लिए तो उसने आरोपी व्यक्ति के पक्ष में बयान दे दिए। इस आवेदन में यह स्पष्ट लिखा था कि महिला अकेली ही दूसरे व्यक्ति के पास रह रही है, जबकि उसके बेटा-बेटी पिता के पास है।
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इसी प्रकार भरण-पोषण की याचिका दायर करने के दिन ही उसकी पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत उसके खिलाफ मामला दायर किया था, जिसमें लिखा था कि उसके बेटा-बेटी उसके पति के पास है, जिनकी कस्टडी उसको दिलवाई जाए। यह याचिका अदालत ने खारिज कर दी और इसके खिलाफ अपील भी खारिज हो गई।
उन्होंने बताया कि एक तरफ उसकी पत्नी व ससुर दोनों मान रहे हैं कि उसके बेटा-बेटी उसके पास है न कि उसकी पत्नी के पास। वहीं दूसरी तरफ उसकी पत्नी ने शपथ पत्र देकर अदालत को गुमराह कर भरण-पोषण का आदेश हासिल कर लिया।
अदालत ने अपना कड़ा रुख : मनमोहन राय
एडवोकेट मनमोहन राय ने बताया कि इस मामले को अदालत ने गंभीर माना है। अदालत ने कहा कि सुमन जांगड़ा ने अपनी याचिका में अपने बेटे-बेटी की अभिरक्षा से संबंधित प्रमुख तथ्य जानबूझ कर छिपाए, जिसके कारण अदालत से गलती हुई। अदालत ने कहा कि पारिवारिक विवादों में झूठे दावे करना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस तरह की कार्य प्रणाली ने न्यायालय को कमजोर किया है।
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इस बारे में महिला के पति अनिल कुमार ने पारिवारिक न्यायालय के अतिरिक्त प्रिंसिपल जज सूर्य चंद्रकांत की अदालत में सीआरपीसी की धारा 340 के तहत याचिका दायर की थी। अपनी याचिका में उन्होंने बताया कि उसकी पत्नी सुमन ने गत 5 अप्रैल 2017 को उसके खिलाफ सीआरपीसी की धारा 125 के तहत केस दायर किया। महिला ने दावा किया कि उसका एक बेटा व एक बेटी उसके पास है, इसलिए उसको उसके पति से भरण पोषण दिलवाया जाए। अदालत ने 18 जनवरी 2019 को अनिल को आदेश दिया कि वह अपनी पत्नी को 30 हजार रुपये प्रति माह और दोनों बच्चों के लिए 30 हजार रुपये प्रतिमाह दें। जब अनिल ने यह राशि नहीं दी तो उसके खिलाफ वसूली वारंट जारी कर दिए गए, जिसकी राशि करीब 30 लाख रुपये थी।
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अनिल ने अदालत को बताया कि उसकी पत्नी जब यह याचिका दायर की थी, उससे छह दिन पूर्व 30 मार्च 2017 को उसके ससुर ने पुलिस को शिकायत दी थी कि एक व्यक्ति उसकी बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया, इसलिए उसको बरामद किया जाए। जब पुलिस ने उसकी पत्नी के बयान लिए तो उसने आरोपी व्यक्ति के पक्ष में बयान दे दिए। इस आवेदन में यह स्पष्ट लिखा था कि महिला अकेली ही दूसरे व्यक्ति के पास रह रही है, जबकि उसके बेटा-बेटी पिता के पास है।
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इसी प्रकार भरण-पोषण की याचिका दायर करने के दिन ही उसकी पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत उसके खिलाफ मामला दायर किया था, जिसमें लिखा था कि उसके बेटा-बेटी उसके पति के पास है, जिनकी कस्टडी उसको दिलवाई जाए। यह याचिका अदालत ने खारिज कर दी और इसके खिलाफ अपील भी खारिज हो गई।
उन्होंने बताया कि एक तरफ उसकी पत्नी व ससुर दोनों मान रहे हैं कि उसके बेटा-बेटी उसके पास है न कि उसकी पत्नी के पास। वहीं दूसरी तरफ उसकी पत्नी ने शपथ पत्र देकर अदालत को गुमराह कर भरण-पोषण का आदेश हासिल कर लिया।
अदालत ने अपना कड़ा रुख : मनमोहन राय
एडवोकेट मनमोहन राय ने बताया कि इस मामले को अदालत ने गंभीर माना है। अदालत ने कहा कि सुमन जांगड़ा ने अपनी याचिका में अपने बेटे-बेटी की अभिरक्षा से संबंधित प्रमुख तथ्य जानबूझ कर छिपाए, जिसके कारण अदालत से गलती हुई। अदालत ने कहा कि पारिवारिक विवादों में झूठे दावे करना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस तरह की कार्य प्रणाली ने न्यायालय को कमजोर किया है।