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रेडियोलॉजिस्ट न होने से डेढ़ साल से डिब्बे में बंद 25 लाख की मशीन, निजी केंद्रों से 30 लाख में अल्ट्रासाउंड करवा रहा विभाग
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हिसार। डेढ़ साल पहले आई 25 लाख की अल्ट्रासाउंड मशीन आज भी डिब्बे में पैक है। कारण है रेडियोलॉजिस्ट का न होना। रेडियोलॉजिस्ट की कमी के कारण औसतन हर रोज 200 मरीजों के अल्ट्रासाउंड सामान्य अस्पताल प्रशासन निजी केंद्रों में करवा रहा है। इतना ही नहीं अस्पताल प्रशासन गर्भवती महिलाओं का एक ही अल्ट्रासाउंड अपने खर्च पर करवाता है, जिनका मासिक शुल्क 30 लाख रुपये बनता है। गर्भवती महिलाओं व अन्य मरीजों को अपने बाकी अल्ट्रासाउंड का खर्च स्वयं ही उठाना पड़ता है। औसतन 200 मरीज हर रोज निजी केंद्रों में अल्ट्रासाउंड के लिए जा रहे है यानी औसतन लाखों का मासिक नुकसान मरीजों को भी उठाना पड़ रहा है। अस्पताल प्रशासन पर पड़ रहे अतिरिक्त भार, मरीजों की परेशानी पर स्वास्थ्य महानिदेशक की दलील है कि कम वेतन के कारण रेडियोलॉजिस्ट नहीं मिल रहे। निजी अस्पतालों में उन्हें ज्यादा वेतन मिलता है।
बता दें कि जिला अस्पताल में डेढ़ साल पहले अल्ट्रासाउंड मशीन आई थी। मगर आज तक मरीजों को अल्ट्रासाउंड की सुविधा नहीं मिली है। हालांकि अस्पताल में जो आखिरी रेडियोलॉजिस्ट था, वह सिर्फ दो महीने ही रहा था। निजी क्षेत्र में अच्छा वेतन पैकेज मिलने पर उसने अपनी नौकरी से त्याग पत्र दे दिया था। उसके बाद से नागरिक अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट का पद खाली पड़ा है।
गर्भवती का एक अल्ट्रासाउंड निशुल्क, बाकी का खर्च स्वयं का
जिला नागरिक अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट नहीं है तो विभाग की तरफ से गर्भवती महिलाओं के अल्ट्रासाउंड के लिए बजट का प्रावधान किया गया है। पिछले वित्त वर्ष में विभाग ने गर्भवती महिलाओं के लिए एक अल्ट्रसाउंड के लिए करीब 27 लाख रुपये निजी अल्ट्रासाउंड केंद्रों को चुकाने पड़े थे। इससे पहले भी इस पर करीब 25 लाख रुपये खर्च आया था। चूंकि गर्भवती महिलाओं को डिलीवरी होने तक तीन से चार से अल्ट्रासाउंड कराने होते हैं। ऐसे में उन्हें बाकी अल्ट्रासाउंड अपने खर्च पर करवाने पड़ रहे हैं।
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गर्भवती के अलावा इन मरीजों को पड़ती है अल्ट्रासाउंड की जरूरत
गर्भवती के अलावा हैपेटाइटिस बी व सी, लीवर में दिक्कत, पेट में इंफेक्शन, पत्थरी या आंत में सूजन एवं अन्य गंभीर हालत के पेट रोगियों को अल्ट्रासाउंड की जरूरत पड़ती है। अस्पताल में हर रोज प्रसूति ओपीडी में 100 से 150 गर्भवती एवं 40 से 50 पेट रोगी आते है। यह आंकड़ा केवल जिला अस्पताल का है, बाकी ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र अलग है। निजी अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड कराने पर मरीजों को 900 से ढाई हजार रुपये तक चुकाने पड़ते हैं।
रेडियोलॉजिस्ट मांग रहे ज्यादा वेतन
स्वास्थ्य विभाग द्वारा रेडियोलॉजिस्ट की नियुक्ति के लिए सालाना 25 लाख रुपये का पैकेज निर्धारित है, लेकिन इस पैकेज में कोई भी रेडियोलॉजिस्ट आने को तैयार नहीं है। सूत्रों की मानें तो एक रेडियोलॉजिस्ट कम से कम 40 से 45 लाख रुपये सालाना पैकेज की मांग कर रहे है। उधर विभाग इतना सेलरी पैकेज देने को तैयार नहीं है, जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।
हमारी ओर से गर्भवती महिलाओं के लिए जिलेभर में एरिया के हिसाब से अल्ट्रासाउंड केंद्र चुने गए है। एक अल्ट्रासाउंड पर करीब 350 रुपये का खर्चा आता है। हमें सालाना बजट 28 से 30 लाख रुपये तक मिलता है। सरकार द्वारा केवल गर्भवती का एक अल्ट्रासाउंड निशुल्क है। बाकी चिकित्सक पर निर्भर है। चिकित्सक चाहे तो मरीज की हालत देखकर दूसरा अल्ट्रासाउंड करवा सकते हैं।
डॉ. जितेंद्र शर्मा, डिप्टी सीएमओ, हिसार।
रेडियोलॉजिस्ट हैं ही नहीं। उन्हें निजी अस्पताल में अधिक रुपये मिल रहे है। इसलिए सरकारी की बजाय निजी में जाना पसंद करते है। सरकारी नौकरी में जो सैलरी होती है, वहीं मिलती है। इसे बढ़ाया भी नहीं जा सकता। हिसार बड़ा जिला है, जहां पर रेडियोलॉजिस्ट की अधिक जरूरत है। मैंने भी कई बार मांग उठाई है, लेकिन मिल नहीं रहा। मैं खुद एक रेडियोलॉजिस्ट हूं। इस समस्या को भलीभांति समझती हूं। डर है कि अभी जो है, वो भी कहीं छोड़ कर ना चले जाएं।
डॉ. वीना सिंह, महानिदेशक, पंचकूला हेडक्वार्टर।
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बता दें कि जिला अस्पताल में डेढ़ साल पहले अल्ट्रासाउंड मशीन आई थी। मगर आज तक मरीजों को अल्ट्रासाउंड की सुविधा नहीं मिली है। हालांकि अस्पताल में जो आखिरी रेडियोलॉजिस्ट था, वह सिर्फ दो महीने ही रहा था। निजी क्षेत्र में अच्छा वेतन पैकेज मिलने पर उसने अपनी नौकरी से त्याग पत्र दे दिया था। उसके बाद से नागरिक अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट का पद खाली पड़ा है।
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गर्भवती का एक अल्ट्रासाउंड निशुल्क, बाकी का खर्च स्वयं का
जिला नागरिक अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट नहीं है तो विभाग की तरफ से गर्भवती महिलाओं के अल्ट्रासाउंड के लिए बजट का प्रावधान किया गया है। पिछले वित्त वर्ष में विभाग ने गर्भवती महिलाओं के लिए एक अल्ट्रसाउंड के लिए करीब 27 लाख रुपये निजी अल्ट्रासाउंड केंद्रों को चुकाने पड़े थे। इससे पहले भी इस पर करीब 25 लाख रुपये खर्च आया था। चूंकि गर्भवती महिलाओं को डिलीवरी होने तक तीन से चार से अल्ट्रासाउंड कराने होते हैं। ऐसे में उन्हें बाकी अल्ट्रासाउंड अपने खर्च पर करवाने पड़ रहे हैं।
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गर्भवती के अलावा इन मरीजों को पड़ती है अल्ट्रासाउंड की जरूरत
गर्भवती के अलावा हैपेटाइटिस बी व सी, लीवर में दिक्कत, पेट में इंफेक्शन, पत्थरी या आंत में सूजन एवं अन्य गंभीर हालत के पेट रोगियों को अल्ट्रासाउंड की जरूरत पड़ती है। अस्पताल में हर रोज प्रसूति ओपीडी में 100 से 150 गर्भवती एवं 40 से 50 पेट रोगी आते है। यह आंकड़ा केवल जिला अस्पताल का है, बाकी ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र अलग है। निजी अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड कराने पर मरीजों को 900 से ढाई हजार रुपये तक चुकाने पड़ते हैं।
रेडियोलॉजिस्ट मांग रहे ज्यादा वेतन
स्वास्थ्य विभाग द्वारा रेडियोलॉजिस्ट की नियुक्ति के लिए सालाना 25 लाख रुपये का पैकेज निर्धारित है, लेकिन इस पैकेज में कोई भी रेडियोलॉजिस्ट आने को तैयार नहीं है। सूत्रों की मानें तो एक रेडियोलॉजिस्ट कम से कम 40 से 45 लाख रुपये सालाना पैकेज की मांग कर रहे है। उधर विभाग इतना सेलरी पैकेज देने को तैयार नहीं है, जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।
हमारी ओर से गर्भवती महिलाओं के लिए जिलेभर में एरिया के हिसाब से अल्ट्रासाउंड केंद्र चुने गए है। एक अल्ट्रासाउंड पर करीब 350 रुपये का खर्चा आता है। हमें सालाना बजट 28 से 30 लाख रुपये तक मिलता है। सरकार द्वारा केवल गर्भवती का एक अल्ट्रासाउंड निशुल्क है। बाकी चिकित्सक पर निर्भर है। चिकित्सक चाहे तो मरीज की हालत देखकर दूसरा अल्ट्रासाउंड करवा सकते हैं।
डॉ. जितेंद्र शर्मा, डिप्टी सीएमओ, हिसार।
रेडियोलॉजिस्ट हैं ही नहीं। उन्हें निजी अस्पताल में अधिक रुपये मिल रहे है। इसलिए सरकारी की बजाय निजी में जाना पसंद करते है। सरकारी नौकरी में जो सैलरी होती है, वहीं मिलती है। इसे बढ़ाया भी नहीं जा सकता। हिसार बड़ा जिला है, जहां पर रेडियोलॉजिस्ट की अधिक जरूरत है। मैंने भी कई बार मांग उठाई है, लेकिन मिल नहीं रहा। मैं खुद एक रेडियोलॉजिस्ट हूं। इस समस्या को भलीभांति समझती हूं। डर है कि अभी जो है, वो भी कहीं छोड़ कर ना चले जाएं।
डॉ. वीना सिंह, महानिदेशक, पंचकूला हेडक्वार्टर।