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जिग जैग तकनीक नहीं अपनाने वाले भट्ठा मालिकों के खिलाफ किए मामले दर्ज
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नारनौंद। खाद्य एवं आपूर्ति विभाग ने गांव सीसर में चल रहे बिना जिग जैग तकनीक ईंट भट्ठों पर भट्ठा मालिकों के खिलाफ मुकदमे दर्ज करवाए हैं। इस संबंध में हरियाणा पॉल्युशन कंट्रोल बोर्ड व नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की अनुमति के बिना ईंट भट्ठों को सरकार की तरफ से बंद करने के आदेश जारी किए गए हैं, लेकिन कुछ भट्ठा मालिक अपने ईंट भट्ठों को अभी भी चला रहे थे। इसलिए विभाग ने ये कार्रवाई की है।
जानकारी के अनुसार जिग जैग तकनीक अपनाने के लिए विभाग द्वारा भट्ठा संचालकों को दो तीन बार मोहलत भी दी गई, लेकिन उसके बाद भी कुुुछ भट्ठा मालिक आदेशों की परवाह किये बिना ही चलाए जा रहे है। प्रदूषण का स्तर कम करने के लिए ईंट-भट्ठों पर सरकार ने जिगजैग तकनीक लगाने का निर्णय लिया था और इसके लिए ईंट-भट्ठा संचालकों को तकनीक अपनाने के लिए मोहलत भी दी गई थी। जिसके बाद भी ईंट-भट्ठे आज भी पुरानी तकनीक से चल रहे हैं। इस कारण प्रदूषण का स्तर बढ़ा हुआ है। ऐसे में अब विभाग ने भट्ठों का निरीक्षण कर उन पर कार्रवाई करने का निर्णय लिया है।
बाक्स
क्या है जिग जैग तकनीक :
भट्ठों में आमतौर पर ईंट पकाने के लिए छल्लियों में सीधी हवा दी जाती है। जिगजैग में टेढ़ी-मेढ़ी लाइन बनाकर हवा दी जाती है। इससे ईंधन कम लगता है। वैसे एक लाख ईंट पकाने में 26 टन कोयला खर्च होता है, जबकि इस तकनीक में 16 टन का ही खर्च है। जिगजैग तकनीक में ईंटों की गुणवत्ता अच्छी रहती है। साधारण विधि का इस्तेमाल करने पर भट्ठे में करीब 50 फीसदी ईंट अव्वल निकलती हैं। इस तकनीक में 90 फीसदी अव्वल ईंट होती हैं। इस तकनीक में कोयले की कम खपत होने से प्रदूषण भी कम होगा। अधिकारियों की मानें तो इस तकनीक का इस्तेमाल होने से प्रदूषण में 70 फीसदी कमी आ सकती है।
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क्यो जरूरी है नई तकनीक :
पुरानी तकनीक पर आधारित ईंट भट्ठे की तुलना में नई तकनीक से तैयार होने वाले ईंट भट्ठा काफी बेहतर होता है। पुरानी ईंट भट्ठा से जहां प्रदूषण ज्यादा होता है वहीं नई तकनीक से प्रदूषण में काफी हद तक कमी आती है। वर्तमान में फिक्स चिमनी भट्ठा से ईंट पकाई जाती है। इस तकनीक में ईंट को पकाने के लिए ईंट को पायों में सजाया जाता है और कोयले की झोंकाई चम्मच द्वारा की जाती है। इस तकनीक में कोयला पूरी तरह से जल नहीं पाता है। इस तकनीक से वायु प्रदूषण भी ज्यादा होता है। पुरानी तकनीक से कम ईंट एक नंबर की निकलती है। नई तकनीक इससे अलग है।
रमेश श्योराण, भट्ठा मालिक, बुडाना।
इन पर हुई कार्रवाई :
सीसर गांव के ईंट भट्ठा मालिक हांसी निवासी संजय बंसल, झझर निवासी योगेश फौगाट, मेहन्दा निवासी संजय कुमार, मेहन्दा निवासी पवन कुमार व गुराना स्थित कापड़ो निवासी बलजीत सिंह के खिलाफ खाद्य एवं आपूर्ति विभाग की तरफ से कार्रवाई की गई है।
रमेश श्योराण, भट्ठा मालिक, बुडाना।
बॉक्स
सरकार की तरफ से दो तीन बार भट्ठा मालिकों को पुरानी तकनीक को जिग जैग में बदलने के लिए समय दिया गया था। जिन्होंने अभी तक नहीं बदले उन पर सरकार की तरफ से कार्रवाई के आदेश हैं। उनके आदेश के तहत ही कार्रवाई की जा रही है।
अनिल हुड्डा, इंस्पेक्टर खाद्य एवं आपूर्ति विभाग, हांसी।
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जानकारी के अनुसार जिग जैग तकनीक अपनाने के लिए विभाग द्वारा भट्ठा संचालकों को दो तीन बार मोहलत भी दी गई, लेकिन उसके बाद भी कुुुछ भट्ठा मालिक आदेशों की परवाह किये बिना ही चलाए जा रहे है। प्रदूषण का स्तर कम करने के लिए ईंट-भट्ठों पर सरकार ने जिगजैग तकनीक लगाने का निर्णय लिया था और इसके लिए ईंट-भट्ठा संचालकों को तकनीक अपनाने के लिए मोहलत भी दी गई थी। जिसके बाद भी ईंट-भट्ठे आज भी पुरानी तकनीक से चल रहे हैं। इस कारण प्रदूषण का स्तर बढ़ा हुआ है। ऐसे में अब विभाग ने भट्ठों का निरीक्षण कर उन पर कार्रवाई करने का निर्णय लिया है।
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क्या है जिग जैग तकनीक :
भट्ठों में आमतौर पर ईंट पकाने के लिए छल्लियों में सीधी हवा दी जाती है। जिगजैग में टेढ़ी-मेढ़ी लाइन बनाकर हवा दी जाती है। इससे ईंधन कम लगता है। वैसे एक लाख ईंट पकाने में 26 टन कोयला खर्च होता है, जबकि इस तकनीक में 16 टन का ही खर्च है। जिगजैग तकनीक में ईंटों की गुणवत्ता अच्छी रहती है। साधारण विधि का इस्तेमाल करने पर भट्ठे में करीब 50 फीसदी ईंट अव्वल निकलती हैं। इस तकनीक में 90 फीसदी अव्वल ईंट होती हैं। इस तकनीक में कोयले की कम खपत होने से प्रदूषण भी कम होगा। अधिकारियों की मानें तो इस तकनीक का इस्तेमाल होने से प्रदूषण में 70 फीसदी कमी आ सकती है।
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क्यो जरूरी है नई तकनीक :
पुरानी तकनीक पर आधारित ईंट भट्ठे की तुलना में नई तकनीक से तैयार होने वाले ईंट भट्ठा काफी बेहतर होता है। पुरानी ईंट भट्ठा से जहां प्रदूषण ज्यादा होता है वहीं नई तकनीक से प्रदूषण में काफी हद तक कमी आती है। वर्तमान में फिक्स चिमनी भट्ठा से ईंट पकाई जाती है। इस तकनीक में ईंट को पकाने के लिए ईंट को पायों में सजाया जाता है और कोयले की झोंकाई चम्मच द्वारा की जाती है। इस तकनीक में कोयला पूरी तरह से जल नहीं पाता है। इस तकनीक से वायु प्रदूषण भी ज्यादा होता है। पुरानी तकनीक से कम ईंट एक नंबर की निकलती है। नई तकनीक इससे अलग है।
रमेश श्योराण, भट्ठा मालिक, बुडाना।
इन पर हुई कार्रवाई :
सीसर गांव के ईंट भट्ठा मालिक हांसी निवासी संजय बंसल, झझर निवासी योगेश फौगाट, मेहन्दा निवासी संजय कुमार, मेहन्दा निवासी पवन कुमार व गुराना स्थित कापड़ो निवासी बलजीत सिंह के खिलाफ खाद्य एवं आपूर्ति विभाग की तरफ से कार्रवाई की गई है।
रमेश श्योराण, भट्ठा मालिक, बुडाना।
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सरकार की तरफ से दो तीन बार भट्ठा मालिकों को पुरानी तकनीक को जिग जैग में बदलने के लिए समय दिया गया था। जिन्होंने अभी तक नहीं बदले उन पर सरकार की तरफ से कार्रवाई के आदेश हैं। उनके आदेश के तहत ही कार्रवाई की जा रही है।
अनिल हुड्डा, इंस्पेक्टर खाद्य एवं आपूर्ति विभाग, हांसी।
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