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परामर्श कार्यों में घोटाले के आरोपों पर वीसी ने तोड़ी चुप्पी
hisar
Updated Mon, 28 Apr 2014 12:12 AM IST
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गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में कंसलटेंसी के नाम पर फर्जीवाड़े के आरोपों के बाद वीसी ने सख्त कदम उठाते हुए 2014 से किसी भी नई कंसलटेंसी को शुरू करने पर रोक लगा दी है।
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कुलपति ने इस मामले में चुप्पी तोड़ते हुए आदेश जारी किए हैं कि जब तक कंसलटेंसी (परामर्श कार्य) के लिए विवि की ओर से नई गाइडलाइन तैयार नहीं की जाती, तब तक कोई नई कंसलटेंसी नहीं होगी।
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पर्यावरण विभाग में पांच करोड़ के कंसलटेंसी बिलों में घोटाले की जांच मामले में कुलपति ने जांच की मांग करने वाले दोनों प्रोफेसरों से एफिडेविट देने को कहा है। एफिडेविट के बाद ही विवि प्रशासन की ओर से जांच की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
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दस दिनों पहले शुरू हुए कंसलटेंसी विवाद को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन ने सख्त कदम उठाने की कवायद शुरू कर दी है। इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कुलपति ने विवि प्रशासन को आदेश जारी किए हैं कि 2014 से किसी भी नई कंसलटेंसी को अनुमति नहीं दी जाए। इस दौरान केवल पुरानी कंसलटेंसी पहले की तरह जारी रहेगी।
17 अप्रैल को पर्यावरण विभाग के कुछ प्रोफेसर गजुटा प्रधान एनके मलिक के साथ एक दिन के सांकेतिक धरने पर बैठे थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि हरियाणा पर्यावरण विभाग की ओर से जीजेयू के पर्यावरण विभाग को प्रदेश में हवा और पानी के सैंपलों की जांच करने और कंसलटेंसी (परामर्श कार्य) करने की अनुमति दी थी।
सन 2005 से विभाग को प्रदेश सरकार की ओर से यह काम सौंपा गया था, जो अभी तक चल रहा है। इस काम में प्रयोग किए गए केमिकल आदि में करीब पांच करोड़ रुपये के बिलों में हेरफेर है।
एक शिक्षक ने आरटीआई के माध्यम से विभाग के शिक्षकों से जानकारी मांगी थी, जिसमें से तीन ने जानकारी नहीं दी। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी प्रशासन को इस मामले में विजिलेंस जांच करवाते हुए उचित कार्रवाई करवानी चाहिए।
कंसलटेंसी विश्वविद्यालय के कुछ गिने चुने विभागों में ही होती है। इन्हीं विभागों में बाहर की कंपनियों की ओर से संपर्क साधा जाता है। पर्यावरण विभाग, साइकोलॉजी विभाग और हरियाणा स्कूल ऑफ बिजनेस के अलावा एक दो अन्य विभागों में कंसलटेंसी की जाती है।
कुलपति डॉ. एमएल रंगा ने कंसलटेंसी के बिलों के घोटाले की जांच की मांग कर रहे प्रोफेसरों को एफिडेविट देने के आदेश दिए हैं। कुलपति ने कहा कि पर्यावरण विभाग के दो प्रोफेसरों ने विभाग के ही कुछ प्रोफेसरों पर कंसलटेंसी के बिलों में पांच करोड़ रुपये के घोटाले के आरोप लगाए थे और जांच की मांग कर रहे थे।
ऐसे में दोनों शिक्षकों को आदेश दिए गए कि जांच करवाने के लिए वह विवि प्रशासन को एफिडेविट जमा करवाएं। कल को यदि शिक्षक एक हो जाते हैं या पीछे हट जाते हैं तो विश्वविद्यालय के पास जांच का क्या आधार रह जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए पर्यावरण विभाग के दोनों शिक्षकों से एफिडेविट मांगे गए हैं।