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Hisar News: नाजुक कंधों पर भारी-भरकम बस्ते का बोझ
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सुरेश सहारण
हिसार। भविष्य उज्ज्वल करने वाली पुस्तकें ही अगर स्कूली बच्चों पर सितम ढाने लगे तो पढ़ाई पर ध्यान कैसे लगा पाएंगे। भारी भरकम स्कूली बैग मासूम बच्चों का बचपन छीन रहा है। नाजुक कंधों पर भारी बैग का असर बच्चों के विकास पर पड़ रहा है। बचपन में ही उनके कंधे झूक सकते हैं, वहीं, जवानी में कमर दर्द सहना पड़ सकता है। अगर, समय रहते अभिभावक नहीं संभले तो विद्यार्थियों का शारीरिक व मानसिक विकास रुक जाएगा। नागरिक अस्पताल में हर रोज 5 से 10 बच्चे पीठ दर्द के चलते दवा लेने आ रहे हैं।
गर्दन और रीढ़ की हड्डी में होता है दर्द
नागरिक अस्पताल के हड्डी रोग विशेषज्ञ डाॅ. सुरेश कौशिक ने बताया कि उम्र के हिसाब से बच्चों के स्कूल बैग में वजन होना चाहिए। अगर, बैग में जरूरत से ज्यादा वजन होगा तो इसका असर बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ेगा। स्कूल जाने वाले मासूमों को पीठ और गर्दन के दर्द की परेशानी है। भारी स्कूल बैग गर्दन की मांसपेशियों को खींचता है। गर्दन के दर्द के कारण रीढ़ की हड्डी के पीछे तकलीफ होती है। यह दर्द पढ़ाई के साथ-साथ खेल में भी बच्चे का प्रदर्शन खराब कर सकता है। इससे बच्चे के विकास पर असर पड़ता है। उन्होंने बताया कि बचपन मे अधिक बोझ उठाने से सर्वाइकल पेन होता है।
शिक्षक जरूरत के मुताबिक स्कूल मंगवाएं किताबें
चिकित्सक ने बताया कि कम उम्र में कंधों पर अधिक बोझ उठाने से कंधे आगे की तरफ झुक जाते हैं। जब बच्चा जवान होता है तो उसके कंधे आगे की तरफ झुक रहते हैं। जिस कारण रीढ़ की हड्डी में दर्द होने लगता है। उम्र के हिसाब से दर्द बढ़ता जाता है। उनका कहना है कि अध्यापकों को चाहिए कि जिस विषय की किताब की जरूरत है, उसे ही बैग में मंगवाएं।
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सरकार की गाइडलाइन के अनुसार स्कूलों में पुस्तकों का निर्धारण करना चाहिए। स्कूल संचालकों से कहना है कि पाठ्यक्रम के अलावा अन्य अनाव्यशक पुस्तकें न लगाए। एनसीआरटी की पुस्तकों से ही पढ़ाई करवाएं। अभिभावकों को भी इस और ध्यान देना चाहिए कि बैग के अंदर बिना जरूरत की पुस्तकें न हों। - कुलदीप सिहाग, जिला शिक्षा अधिकारी
एनसीईआरटी की गाइडलाइन के अनुसार किताबों का वजन
कक्षा : पुस्तकों का भार
पहली से दूसरी : 1.6 किलो से 2.2 किलो
तीसरी से 5वीं : 1.7 किलो से 2.5 किलो
छठी से सातवीं : 2 किलो से तीन किलो
आठवीं : 2.5 किलो से चार किलो
9वीं से 10वीं : 2.5 किलो से साढ़े चार किलो
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हिसार। भविष्य उज्ज्वल करने वाली पुस्तकें ही अगर स्कूली बच्चों पर सितम ढाने लगे तो पढ़ाई पर ध्यान कैसे लगा पाएंगे। भारी भरकम स्कूली बैग मासूम बच्चों का बचपन छीन रहा है। नाजुक कंधों पर भारी बैग का असर बच्चों के विकास पर पड़ रहा है। बचपन में ही उनके कंधे झूक सकते हैं, वहीं, जवानी में कमर दर्द सहना पड़ सकता है। अगर, समय रहते अभिभावक नहीं संभले तो विद्यार्थियों का शारीरिक व मानसिक विकास रुक जाएगा। नागरिक अस्पताल में हर रोज 5 से 10 बच्चे पीठ दर्द के चलते दवा लेने आ रहे हैं।
गर्दन और रीढ़ की हड्डी में होता है दर्द
नागरिक अस्पताल के हड्डी रोग विशेषज्ञ डाॅ. सुरेश कौशिक ने बताया कि उम्र के हिसाब से बच्चों के स्कूल बैग में वजन होना चाहिए। अगर, बैग में जरूरत से ज्यादा वजन होगा तो इसका असर बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ेगा। स्कूल जाने वाले मासूमों को पीठ और गर्दन के दर्द की परेशानी है। भारी स्कूल बैग गर्दन की मांसपेशियों को खींचता है। गर्दन के दर्द के कारण रीढ़ की हड्डी के पीछे तकलीफ होती है। यह दर्द पढ़ाई के साथ-साथ खेल में भी बच्चे का प्रदर्शन खराब कर सकता है। इससे बच्चे के विकास पर असर पड़ता है। उन्होंने बताया कि बचपन मे अधिक बोझ उठाने से सर्वाइकल पेन होता है।
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शिक्षक जरूरत के मुताबिक स्कूल मंगवाएं किताबें
चिकित्सक ने बताया कि कम उम्र में कंधों पर अधिक बोझ उठाने से कंधे आगे की तरफ झुक जाते हैं। जब बच्चा जवान होता है तो उसके कंधे आगे की तरफ झुक रहते हैं। जिस कारण रीढ़ की हड्डी में दर्द होने लगता है। उम्र के हिसाब से दर्द बढ़ता जाता है। उनका कहना है कि अध्यापकों को चाहिए कि जिस विषय की किताब की जरूरत है, उसे ही बैग में मंगवाएं।
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सरकार की गाइडलाइन के अनुसार स्कूलों में पुस्तकों का निर्धारण करना चाहिए। स्कूल संचालकों से कहना है कि पाठ्यक्रम के अलावा अन्य अनाव्यशक पुस्तकें न लगाए। एनसीआरटी की पुस्तकों से ही पढ़ाई करवाएं। अभिभावकों को भी इस और ध्यान देना चाहिए कि बैग के अंदर बिना जरूरत की पुस्तकें न हों। - कुलदीप सिहाग, जिला शिक्षा अधिकारी
एनसीईआरटी की गाइडलाइन के अनुसार किताबों का वजन
कक्षा : पुस्तकों का भार
पहली से दूसरी : 1.6 किलो से 2.2 किलो
तीसरी से 5वीं : 1.7 किलो से 2.5 किलो
छठी से सातवीं : 2 किलो से तीन किलो
आठवीं : 2.5 किलो से चार किलो
9वीं से 10वीं : 2.5 किलो से साढ़े चार किलो