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Hisar News: 22 साल कानूनी लड़ाई...मुआवजे की आस में बुझते गए उम्मीद के दीये

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 25 Oct 2026 12:30 AM IST
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A 22-year legal battle... as the hope for compensation gradually faded away.

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हिसार। बेटे की मौत के बाद मुआवजे की आस में मां-बाप ने 22 साल कानूनी लड़ाई लड़ी...आखिरकार 8 अक्तूबर को हक में फैसला आया। बढ़ा हुआ मुआवजा मिला, ब्याज समेत रकम बैंक खाते में जमा हो गई मगर विडंबना देखिए कि मुआवजा राशि पाने वाले हाथ अब इस दुनिया में नहीं थे। मामला वर्ष 2001 में सड़क हादसे में शक्ति सिंह की मौत से जुड़ा है।
अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता जगबीर दलाल ने बताया कि 15 मार्च, 2001 को मुल्तानी चौक निवासी जयप्रकाश का बेटा शक्ति सिंह साइकिल से घर लौट रहा था। सिरसा रोड पर मछली प्रजनन केंद्र के पास एक वैन ने उसे पीछे से टक्कर मार दी। वैन को शिवनाथ चला रहा था। गंभीर घायल शक्ति को पहले सामान्य अस्पताल और फिर एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया लेकिन 16 मार्च को उसकी मौत हो गई। बेटे को खोने के बाद पिता जयप्रकाश व मां परमेश्वरी देवी ने मुआवजे के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की। मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल, हिसार की अदालत ने 14 जून, 2004 को एक लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया और राशि 12 महीने के लिए सावधि जमा में रखने के लिए कहा। यह रकम जयप्रकाश और परमेश्वरी देवी को एक साल बाद मिली।
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मुआवजा राशि बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट में अपील
जयप्रकाश ने मुआवजा राशि बढ़ाने के लिए 13 सितंबर, 2004 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में अपील दायर की। करीब 10 साल एक महीने बाद 14 अक्तूबर, 2014 को जयप्रकाश का निधन हो गया। इसके बाद भी अदालत में लड़ाई जारी रही। आखिरकार 8 अक्तूबर को हाईकोर्ट के न्यायाधीश अमरिंद्र सिंह ग्रेवाल ने मुआवजा एक लाख रुपये से बढ़ाकर 3.85 लाख रुपये कर दिया। अदालत ने अपील दायर करने की तारीख से राशि के भुगतान तक 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश भी दिया लेकिन इस फैसले की कहानी में सबसे मार्मिक अध्याय अभी बाकी था। बेटे को न्याय दिलाने के इस संघर्ष का अंतिम नतीजा देखने के लिए परमेश्वरी देवी भी दुनिया में नहीं रहीं। अधिवक्ता के मुताबिक, मुआवजे की बढ़ी राशि बैंक में जमा होने की खबर ऐसे समय आई जब शक्ति सिंह की मां दुनिया को अलविदा कह गईं। यह कहानी उस इंतजार की है जिसमें तारीखें बदलती रहीं साल गुजरते रहे और उम्मीद का दिया जलाए रखने वाले एक-एक कर बुझते चले गए।
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