{"_id":"138-27690","slug":"Gurgaon-27690-138","type":"story","status":"publish","title_hn":"शव ढोने में भी वर्चस्व की लड़ाई ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शव ढोने में भी वर्चस्व की लड़ाई
Gurgaon
Updated Sat, 24 Nov 2012 12:00 PM IST
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गुड़गांव। जिले में शवों को ढोने के लिए एंबुलेंस चालकों में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है। हालांकि नियमों के हिसाब से एंबुलेंस में शव नहीं ले जाया जा सकता। इसके बावजूद शव वाहन न होने के कारण एंबुलेंस चालक लोगों की मजबूरी का फायदा उठाते हैं। सेक्टर-10 में घटी घटना को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है।
जिला स्वास्थ्य विभाग के पास एक भी शव वाहन नहीं है। ऐसे में निजी एंबुलेंस चालक अस्पताल के बाहर ही जमे रहते हैं। जब भी कोई शव ले जाना होता है, इन एंबुलेंस चालकों में ऐसी होड़ मचती है, जैसे कि सवारियां लेते समय अवैध वाहन चालकों के बीच देखी जाती है। बाकायदा मोलभाव होता है और अंत में जिसका पलड़ा भारी पड़ता है, वो शव लेकर निकल पड़ता है। केवल शव ले जाने के लिए ही नहीं, बल्कि घायलों को ले जाने के लिए भी नियम कानून इस कदर सख्त हैं कि लोगों के पास निजी एंबुलेंस चालक की मनमानी सहने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचता।
दूसरे जिलों में नहीं जा सकती सरकारी एंबुलेंस
नियमों के अनुसार अगर मरीज को जिले के ही किसी प्राइवेट हॉस्पिटल ले जाना है तो सरकारी एंबुलेंस में नहीं ले जाया जा सकता। इसके लिए संबंधित डॉक्टर और आला अधिकारियों की विशेष अनुमति की जरू रत होती है। अगर जिले से बाहर किसी सरकारी अस्पताल में भी मरीज को रेफर करना पड़े तो भी इसी प्रक्रिया को दोहराया जाता है। लेकिन किसी भी हालत में शवों को एंबुलेंस में ढोने की अनुमति नहीं है। चूंकि सरकारी डॉक्टर स्वयं से मरीज को प्राइवेट अस्पताल में रेफर करने में कठिनाई महसूस करते हैं, लिहाजा मरीज के परिजनों को मजबूरी में प्राइवेट एंबुलेंस चालकों की मनमानी का शिकार बनना पड़ जाता है।
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सिविल अस्पताल के पास सिर्फ 11 एंबुलेंस
सिविल अस्पताल में कुल 11 एंबुलेंस हैं। अत्याधुनिक एंबुलेंस के लिए जहां 15 रुपये प्रति किलोमीटर का शुल्क लिया जाता है, वहीं साधारण एंबुलेंस के लिए यह खर्च सात रुपये प्रति किलोमीटर निर्धारित है। हादसों में घायल लोगों को अस्पताल पहुंचाने, गर्भवती महिला को घर से लाने और घर पहुंचाने समेत कुछ मामलों में एंबुलेंस सुविधा को निशुल्क उपलब्ध कराया जाता है।
यूपी और बिहार तक ले जाते हैं शव
सरकारी एंबुलेंस पर तैनात एक चालक ने बताया कि प्राइवेट एंबुलेंस चालक तो यूपी और बिहार तक शव ले जाते हैं। इसके लिए 20 से 25 हजार रुपये की मांग की जाती है। खास बात कि अन्य दिनों जहां सिविल अस्पताल के बाहर प्राइवेट एंबुलेंस का जमावड़ा दिखाई देता था, वहीं शुक्रवार को केवल एक ही एंबुलेंस खड़ी थी। सूत्रों ने बताया कि अस्पताल के कुछ कर्मचारी भी प्राइवेट एंबुलेंस चालकों के साथ मिले हैं। यह कर्मचारी अंदर खाते ही सब सेटिंग कर लेते हैं और सौदा पक्का होते ही एंबुलेंस चालकों को बुला लेते हैं। अस्पताल प्रशासन भी इस बात को भलीभांति जानता है। लेकिन शव वाहन की व्यवस्था न होने के कारण बेबस है।
कई संस्थाएं निशुल्क में कराती हैं एंबुलेंस उपलब्ध
शहर में कई संस्थाएं हैं, जो फ्री में एंबुलेंस उपलब्ध कराती हैं। ताऊ देवीलाल विकास मंच के सदस्य एवं पार्षद रिषिराज राणा ने बताया कि हेल्पलाइन नंबर 0124-6410178 पर संपर्क करके निशुल्क एंबुलेंस सेवा प्राप्त की जा सकती है। एसआरआईएमएस इमरजेंसी सर्विस फाउंडेशन के नंबर 0124-6111111 से भी एंबुलेंस फ्री में मिल जाएगी। इसके अलावा राकेश दौलताबाद की तरफ से भी कई फ्री एंबुलेंस चलाई जा रही है।
जिले में शव वाहन उपलब्ध कराने के लिए पत्र लिखा जा चुका है। पिछले दिनों चंडीगढ़ में हुई बैठक में भी यह मसला उठाया गया था। सकारात्मक संकेत मिले हैं। उम्मीद है कि जल्द ही शव वाहन की मांग पूरी हो जाएगी।
-डॉ. संजय नरूला, नोडल अधिकारी, रेफर ट्रांसपोर्ट, स्वास्थ्य विभाग, गुड़गांव
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जिला स्वास्थ्य विभाग के पास एक भी शव वाहन नहीं है। ऐसे में निजी एंबुलेंस चालक अस्पताल के बाहर ही जमे रहते हैं। जब भी कोई शव ले जाना होता है, इन एंबुलेंस चालकों में ऐसी होड़ मचती है, जैसे कि सवारियां लेते समय अवैध वाहन चालकों के बीच देखी जाती है। बाकायदा मोलभाव होता है और अंत में जिसका पलड़ा भारी पड़ता है, वो शव लेकर निकल पड़ता है। केवल शव ले जाने के लिए ही नहीं, बल्कि घायलों को ले जाने के लिए भी नियम कानून इस कदर सख्त हैं कि लोगों के पास निजी एंबुलेंस चालक की मनमानी सहने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचता।
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दूसरे जिलों में नहीं जा सकती सरकारी एंबुलेंस
नियमों के अनुसार अगर मरीज को जिले के ही किसी प्राइवेट हॉस्पिटल ले जाना है तो सरकारी एंबुलेंस में नहीं ले जाया जा सकता। इसके लिए संबंधित डॉक्टर और आला अधिकारियों की विशेष अनुमति की जरू रत होती है। अगर जिले से बाहर किसी सरकारी अस्पताल में भी मरीज को रेफर करना पड़े तो भी इसी प्रक्रिया को दोहराया जाता है। लेकिन किसी भी हालत में शवों को एंबुलेंस में ढोने की अनुमति नहीं है। चूंकि सरकारी डॉक्टर स्वयं से मरीज को प्राइवेट अस्पताल में रेफर करने में कठिनाई महसूस करते हैं, लिहाजा मरीज के परिजनों को मजबूरी में प्राइवेट एंबुलेंस चालकों की मनमानी का शिकार बनना पड़ जाता है।
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सिविल अस्पताल के पास सिर्फ 11 एंबुलेंस
सिविल अस्पताल में कुल 11 एंबुलेंस हैं। अत्याधुनिक एंबुलेंस के लिए जहां 15 रुपये प्रति किलोमीटर का शुल्क लिया जाता है, वहीं साधारण एंबुलेंस के लिए यह खर्च सात रुपये प्रति किलोमीटर निर्धारित है। हादसों में घायल लोगों को अस्पताल पहुंचाने, गर्भवती महिला को घर से लाने और घर पहुंचाने समेत कुछ मामलों में एंबुलेंस सुविधा को निशुल्क उपलब्ध कराया जाता है।
यूपी और बिहार तक ले जाते हैं शव
सरकारी एंबुलेंस पर तैनात एक चालक ने बताया कि प्राइवेट एंबुलेंस चालक तो यूपी और बिहार तक शव ले जाते हैं। इसके लिए 20 से 25 हजार रुपये की मांग की जाती है। खास बात कि अन्य दिनों जहां सिविल अस्पताल के बाहर प्राइवेट एंबुलेंस का जमावड़ा दिखाई देता था, वहीं शुक्रवार को केवल एक ही एंबुलेंस खड़ी थी। सूत्रों ने बताया कि अस्पताल के कुछ कर्मचारी भी प्राइवेट एंबुलेंस चालकों के साथ मिले हैं। यह कर्मचारी अंदर खाते ही सब सेटिंग कर लेते हैं और सौदा पक्का होते ही एंबुलेंस चालकों को बुला लेते हैं। अस्पताल प्रशासन भी इस बात को भलीभांति जानता है। लेकिन शव वाहन की व्यवस्था न होने के कारण बेबस है।
कई संस्थाएं निशुल्क में कराती हैं एंबुलेंस उपलब्ध
शहर में कई संस्थाएं हैं, जो फ्री में एंबुलेंस उपलब्ध कराती हैं। ताऊ देवीलाल विकास मंच के सदस्य एवं पार्षद रिषिराज राणा ने बताया कि हेल्पलाइन नंबर 0124-6410178 पर संपर्क करके निशुल्क एंबुलेंस सेवा प्राप्त की जा सकती है। एसआरआईएमएस इमरजेंसी सर्विस फाउंडेशन के नंबर 0124-6111111 से भी एंबुलेंस फ्री में मिल जाएगी। इसके अलावा राकेश दौलताबाद की तरफ से भी कई फ्री एंबुलेंस चलाई जा रही है।
जिले में शव वाहन उपलब्ध कराने के लिए पत्र लिखा जा चुका है। पिछले दिनों चंडीगढ़ में हुई बैठक में भी यह मसला उठाया गया था। सकारात्मक संकेत मिले हैं। उम्मीद है कि जल्द ही शव वाहन की मांग पूरी हो जाएगी।
-डॉ. संजय नरूला, नोडल अधिकारी, रेफर ट्रांसपोर्ट, स्वास्थ्य विभाग, गुड़गांव