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ग्राउंड रिपोर्ट : हरियाणा में पाताल में जा रहा भूजल, खतरे में जांटी के औषधीय पेड़

Wed, 24 Feb 2021 04:39 PM IST
निवेदिता वर्मा यशपाल शर्मा, अमर उजाला, लीलस/भिवानी (हरियाणा) 
यशपाल शर्मा, अमर उजाला, लीलस/भिवानी (हरियाणा)  Published by: निवेदिता वर्मा Updated Wed, 24 Feb 2021 04:39 PM IST
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Ground water in Haryana reached at minimum level
हरियाणा में पानी की कमी से सूख रहे हैं जांटी के पेड़। - फोटो : अमर उजाला

राजस्थान सीमा से सटे हरियाणा के गांवों में औषधीय पेड़ जांटी (प्रोसोपिस सिनेरेरिया) खतरे में हैं। लीलस, नलोई, गुरेरा, झुंपा कलां, गेंडावास, बुधसेली और सैनीवास आदि गांवों में बरसात कम होती ही है, लिहाजा अब भूजल पाताल में जा रहा है। बीते कुछ सालों में भूजल का स्तर 30 से 40 फीट नीचे गया है।

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मरुस्थल में 200-300 वर्ष पुराने जांटी के पेड़ भी मिल जाएंगे, लेकिन कुछ पुराने व नए पेड़ अब सूख रहे हैं। बारिश कम होने के साथ ही भूजल स्तर नीचे जाने से इनकी जड़ों को कम नमी मिल रही है। जिससे जांटी के पेड़ पहले की तुलना काफी कम हुए हैं। इन पर पानी के अलावा कटान की मार भी पड़ रही है। निर्धन ग्रामीण आजीविका चलाने के लिए इन्हें हर साल काटकर बेच रहे हैं।
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जांटी के पेड़ पर जून में आने वाले फल सांगरी की सब्जी बेहद स्वादिष्ट होती है। ग्रामीणों का कहना है कि दस्त रोकने में बेहद लाभदायक है। अगर दस्त लगे हैं और इसकी सब्जी बनाकर खा लें तो जल्दी आराम मिलता है। इसकी पत्तियां फसल के लिए उत्तम खाद हैं। इसके पत्तों पर साल में दस-बारह दिन गोंद आती है, जो मिसरी की तरह मीठी होती है।

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50 से 90 फीट पहुंच गया है भूजल का स्तर
लीलस के सरपंच राजा राम ने बताया कि बारिश कम होती है। काफी भूमि असिंचित है, भूजल नीचे जा रहा है। ज्यादातर जगह पहले 45 से 50 फीट पर भूजल था जो अब 85 से 90 फीट तक जा पहुंचा है। कुछ स्थानों पर यह 100 फीट से भी नीचे चला गया है। 

जांटी के पेड़ कृषि भूमि के बीचों बीच हैं, जहां सिंचाई हो रही है, वहां पर ये हरे-भरे हैं, बाकी जगह काफी पेड़ सूख रहे हैं। अगर राजस्थान सीमा से सटे सभी गांवों में सिंचाई होने लगे तो जांटी के पेड़ों की आयु और बढ़ेगी। इसके फल की सब्जी पेट की बीमारियों के लिए फायदेमंद है। बरसात न होने पर रेतीली जमीन में अकाल की स्थिति बनने पर लोग इन पेड़ों को काटकर रुपये कमा परिवार का भरण पोषण करते हैं।

भरपूर ऑक्सीजन देते हैं ये पड़, लकड़ी का बनता है फर्नीचर
झुंपा कलां के मयंक, नलोई के ग्रामीण मांगे राम व इंद्र सिंह ने बताया कि जांटी के पेड़ ऑक्सीजन भी भरपूर देते हैं। इनकी लकड़ी मजबूत होने के कारण फर्नीचर बनाने के काम आती है। भीषण गर्मी में भी इसके पत्ते हरे रहते हैं। इन पेड़ों का संरक्षण बेहद जरूरी है। इन औषधीय पेड़ों की संख्या लगातार घटती जा रही है। सरकार इन्हें बचाने के लिए जरूरी कदम उठाए।

जांटी के बारे में ये जानना भी जरूरी
  • जब रेगिस्तान में जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता, तब यह पेड़ छाया देता है।
  • जब खाने को कुछ नहीं होता, तब यह चारा देता है, जिसे लूंग कहा जाता है। यह बेहद ताकतवर होती है
  • इसका फूल मींझर कहलाता है। इसके फल सांगरी को सूखने पर खोखा कहते हैं, जो सूखा मेवा है।
  • किसान सितंबर, अक्तूबर में सरसों बुआई से पहले इनकी छंगाई करते हैं। टहनियों को चूल्हे में जलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। 
  • इस पेड़ के नीचे अनाज की पैदावार ज्यादा होती है। इसकी जड़ से हल बनता है।

जांटी के पेड़ों का संरक्षण वन विभाग से सुनिश्चित कराया जाएगा। कुछ समय लग सकता है, लेकिन आने वाले समय में राजस्थान सीमा से सटे हर गांव में नहरी पानी से कृषि भूमि की सिंचाई होने लगेगी। हमारी सरकार बड़े पैमाने पर नहरी पानी को लाने के लिए प्रयत्नशील है।  -जेपी दलाल, कृषि मंत्री, हरियाणा

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