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इलाज दिए बिना बच्ची को निकाला नर्सरी से बाहर
fatehabad
Updated Sun, 13 Jul 2014 11:45 PM IST
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सिविल अस्पताल के नर्सरी वार्ड में खून की कमी से जूझ रही बच्ची का इलाज कराने आए परिजनों ने रविवार को जमकर हंगामा किया। परिजनों का आरोप था कि चिकित्सक ने उनकी बच्ची का इलाज करने की बजाय बाहर का रास्ता दिखा दिया। परिजनों का कसूर केवल इतना था कि वह नर्सरी वार्ड में दाखिल होने से पहले जूते और चप्पल बाहर उतारना भूल गए। मामले ने उस समय तुल पकड़ा लिया, जब उपायुक्त के हस्तक्षेप के बाद भी बच्ची को इलाज नहीं मिल पाया। परिजन जहां चिकित्सक पर अपनी बच्ची की जिंदगी खतरे में डालने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं चिकित्सक और अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि बच्ची के परिजन उसे अपनी मर्जी से ले गए हैं। ऐेसे में वे जबरदस्ती इलाज नहीं दे सकते।
भट्टू निवासी चमेली ने बताया कि उसकी छह माह की पोती गूंजन दस्त लगने के कारण दो दिन से एक निजी अस्पताल में दाखिल थी। रविवार की सुबह निजी अस्पताल के डॉक्टर ने बच्ची में खून की कमी बताते हुए उन्हें सिरसा से खून की व्यवस्था करने के लिए कहा था। इसके बाद वे बच्ची को सामान्य अस्पताल में ले आए। जब वे इमरजेंसी वार्ड में गए तो वहां से उन्हें ऊपर नर्सरी में भेज दिया गया। जब वे नर्सरी में पहुंचे तो ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने यह कहकर बाहर निकाल दिया कि तुम चप्पल पहनकर अंदर कैसे आए। चमेली ने आरोप लगाया कि उन्होंने इसके लिए माफी भी मांगी, लेकिन डॉक्टर इस कद्र भड़क गए थे कि उनकी एक नहीं सुनी और नर्सरी से बाहर निकाल दिया।
डीसी के पास फरियाद लेकर पहुंचे
जब कहीं सुनवाई नहीं हुई तो गुंजन की दादी और पिता रमेश उसे लेकर जिला उपायुक्त के निवास स्थान पर पहुंचे और उन्हें सामान्य अस्पताल से निकाले जाने की बात बताई। उपायुक्त ने सीएमओ डॉ. सूरजभान कंबोज को बच्ची को दाखिल करने के आदेश दिए।
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इसके बाद भी नहीं मिल पाया इलाज
रमेश ने बताया कि डीसी के आदेश के बावजूद उनकी बच्ची को इलाज नहीं मिल पाया। चिकित्सक ने इलाज से पहले एक फार्म पर साइन करने को कहा। फार्म पर लिखा था कि अगर बच्ची को कुछ हो गया तो उसकी जिम्मेदारी हमारी नहीं होगी। इस पर गूंजन के परिजन घबरा गए और उन्होंने बच्ची को वहां से ले जाने में ही भलाई समझी।
नर्सरी के बाहर नहीं है सिक्योरिटी गार्ड
नवजात बच्चों के इलाज के लिए बनी नर्सरी के बाहर कोई सिक्योरिटी गार्ड तैनात नहीं रहता। ऐसे में कोई भी अंदर आ और जा सकता है। नर्सरी के बाहर जूते और चप्पल इसलिए उतरवाए जाते हैं ताकि नवजात बच्चों में संक्रमण न फैले। इससे पहले भी नर्सरी में कई बार संक्रमण फैलने के मामले सामने आ चुके हैं। इसके मद्देनजर ही चिकित्सक अब इस ओर पूरा ध्यान देते हैं।
मेरा काम नर्सरी के मरीजों को देखना है : डॉ. वरुण
नर्सरी में मौजूद डॉ. वरुण से जब इस बारे में बात की गई तो उन्होंने कहा कि बच्ची के परिजन चप्पल डालकर अंदर घुस आए। उन्होंने केवल इतना कहा था कि जूते और चप्पल बाहर उतारकर आओ, लेकिन बच्ची के परिजन भड़क गए। नर्स के साथ बहस करने लग गए। उनकी ड्यूटी केवल नर्सरी में मौजूद नवजात बच्चों को देखना है। फिर भी उन्होंने बच्ची के परिजनों को कहा कि वे नर्सरी में दाखिल नवजातों को देखने के बाद बच्ची का इलाज करेंगे, लेकिन वे पहले देखने की बात पर अड़े थे और गुस्से में आकर बाहर चले गए।
बच्ची को भर्ती करने की प्रक्रिया थी फार्म भरवाना
इस बारे में सीएमओ एसबी कंबोज ने बताया कि बच्ची के परिजन पहले इलाज कराने की जिद पर अड़े थे। डॉक्टर ने जब उनसे थोड़ा इंतजार करने को कहा तो वे भड़क गए। डीसी साहब का मेरे पास फोन आया था, जिस पर मैंने बच्ची को भर्ती करने के निर्देश दे दिए थे। भर्ती करते समय सभी परिजनों से कंसेंट फार्म भरवाया जाता है, लेकिन बच्ची के परिजनों ने फार्म भरने से मना कर दिया और वहां से चले गए।
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भट्टू निवासी चमेली ने बताया कि उसकी छह माह की पोती गूंजन दस्त लगने के कारण दो दिन से एक निजी अस्पताल में दाखिल थी। रविवार की सुबह निजी अस्पताल के डॉक्टर ने बच्ची में खून की कमी बताते हुए उन्हें सिरसा से खून की व्यवस्था करने के लिए कहा था। इसके बाद वे बच्ची को सामान्य अस्पताल में ले आए। जब वे इमरजेंसी वार्ड में गए तो वहां से उन्हें ऊपर नर्सरी में भेज दिया गया। जब वे नर्सरी में पहुंचे तो ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने यह कहकर बाहर निकाल दिया कि तुम चप्पल पहनकर अंदर कैसे आए। चमेली ने आरोप लगाया कि उन्होंने इसके लिए माफी भी मांगी, लेकिन डॉक्टर इस कद्र भड़क गए थे कि उनकी एक नहीं सुनी और नर्सरी से बाहर निकाल दिया।
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डीसी के पास फरियाद लेकर पहुंचे
जब कहीं सुनवाई नहीं हुई तो गुंजन की दादी और पिता रमेश उसे लेकर जिला उपायुक्त के निवास स्थान पर पहुंचे और उन्हें सामान्य अस्पताल से निकाले जाने की बात बताई। उपायुक्त ने सीएमओ डॉ. सूरजभान कंबोज को बच्ची को दाखिल करने के आदेश दिए।
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इसके बाद भी नहीं मिल पाया इलाज
रमेश ने बताया कि डीसी के आदेश के बावजूद उनकी बच्ची को इलाज नहीं मिल पाया। चिकित्सक ने इलाज से पहले एक फार्म पर साइन करने को कहा। फार्म पर लिखा था कि अगर बच्ची को कुछ हो गया तो उसकी जिम्मेदारी हमारी नहीं होगी। इस पर गूंजन के परिजन घबरा गए और उन्होंने बच्ची को वहां से ले जाने में ही भलाई समझी।
नर्सरी के बाहर नहीं है सिक्योरिटी गार्ड
नवजात बच्चों के इलाज के लिए बनी नर्सरी के बाहर कोई सिक्योरिटी गार्ड तैनात नहीं रहता। ऐसे में कोई भी अंदर आ और जा सकता है। नर्सरी के बाहर जूते और चप्पल इसलिए उतरवाए जाते हैं ताकि नवजात बच्चों में संक्रमण न फैले। इससे पहले भी नर्सरी में कई बार संक्रमण फैलने के मामले सामने आ चुके हैं। इसके मद्देनजर ही चिकित्सक अब इस ओर पूरा ध्यान देते हैं।
मेरा काम नर्सरी के मरीजों को देखना है : डॉ. वरुण
नर्सरी में मौजूद डॉ. वरुण से जब इस बारे में बात की गई तो उन्होंने कहा कि बच्ची के परिजन चप्पल डालकर अंदर घुस आए। उन्होंने केवल इतना कहा था कि जूते और चप्पल बाहर उतारकर आओ, लेकिन बच्ची के परिजन भड़क गए। नर्स के साथ बहस करने लग गए। उनकी ड्यूटी केवल नर्सरी में मौजूद नवजात बच्चों को देखना है। फिर भी उन्होंने बच्ची के परिजनों को कहा कि वे नर्सरी में दाखिल नवजातों को देखने के बाद बच्ची का इलाज करेंगे, लेकिन वे पहले देखने की बात पर अड़े थे और गुस्से में आकर बाहर चले गए।
बच्ची को भर्ती करने की प्रक्रिया थी फार्म भरवाना
इस बारे में सीएमओ एसबी कंबोज ने बताया कि बच्ची के परिजन पहले इलाज कराने की जिद पर अड़े थे। डॉक्टर ने जब उनसे थोड़ा इंतजार करने को कहा तो वे भड़क गए। डीसी साहब का मेरे पास फोन आया था, जिस पर मैंने बच्ची को भर्ती करने के निर्देश दे दिए थे। भर्ती करते समय सभी परिजनों से कंसेंट फार्म भरवाया जाता है, लेकिन बच्ची के परिजनों ने फार्म भरने से मना कर दिया और वहां से चले गए।