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मश्कोह घाटी में भारत माता की जय बोल शहीद हुए थे नरेंद्र
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शहीद नरेंद्र जाखड़ की मेहूवाला में लगी हुई प्रतिमा।
- फोटो : Fatehabad
कारगिल युद्ध देश के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। कारगिल युद्ध का जिक्र होते ही मेहूवाला के शहीद नरेंद्र सिंह जाखड़ का नाम सबकी जुबां पर आता है। यही नाम है, जो युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। नरेंद्र सिंह जाखड़ की शहादत मेहूवाला वासियों के लिए गौरव है। गांव में लगी उनकी प्रतिमा याद दिलाती है कि मेहूवाला कोई साधारण गांव नहीं है। कारगिल युद्ध के दौरान 9 जुलाई 1999 को अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए नरेंद्र सिंह जाखड़ वीर गति को प्राप्त हुए थे। मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले नरेंद्र की याद में हर वर्ष उनके परिजन व अनेक साथी शहीदी दिवस के रूप में उनकी कुर्बानी को याद कर श्रद्धांजलि देते हैं।
शहीद नरेंद्र सिंह का जन्म 17 सितंबर 1978 को हुआ। उनका पूरा परिवार ही देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत था। उनके दादा अमर सिंह जाखड़ व पिता जय सिंह जाखड़ भी फौज में थे। नरेंद्र सिंह की शुरुआती शिक्षा मध्यप्रदेश के फौजी कैंट टैकनपुर में हुई। उनके पिता सीमा सुरक्षा बल में थे। फौजी कैंट की शिक्षा ने नरेंद्र सिंह पर ऐसी छाप छोड़ी की उन्होंने सेना में भर्ती होकर देश सेवा करने की ठान ली। उनके पिता की 24 वर्ष सेवाएं पूरी होने के बाद उन्हें अपने पिता के साथ गांव में लौटना पड़ा और बाकी पढ़ाई उन्होंने बाल भारती स्कूल में पूरी की।
नशे के खिलाफ था नरेंद्र
नरेंद्र सिंह के पिता जयसिंह जाखड़ बताते हैं कि नरेंद्र सिंह हर प्रकार के नशे के खिलाफ था। खाने में वह दही व घी लेता था। बालीवाल और क्रिकेट उसके पसंदीदा खेल थे। नरेंद्र को 18 वर्ष की उम्र में हिसार के फौजी कैंट में भर्ती के दौरान सफलता मिली और देश सेवा का सपना उसका पूरा हो गया। उनकी ड्यूटी कश्मीर के सबसे ऊंचे पर्वतों पर लगी वहां के प्रतिकूल वातावरण में भी अपने कर्तव्य का बखूबी पालन किया।
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राष्ट्र के मुद्दों पर चर्चा करता था मेरा बेटा
माता रेशमा देवी बताती हैं कि छुट्टियों के दिनों में जब भी घर आता, हमेशा देश सेवा की बात करता था। वह राष्ट्र से जुड़े विषयों पर चर्चा करता था। उसे खाली बैठना पसंद नहीं था। वह घर के हर काम में हाथ बंटाता था।
जब दुश्मनों से किया मुकाबला
भाई रविंद्र बताते हैं कि नरेंद्र में चीते जैसी फुर्ती थी। उसे किसी प्रकार का कोई भय नहीं था, वह निडर और साहसी था। मई 1999 में पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सीमा में टाइगर हिल, मश्कोह घाटी, द्राक्ष, बटालिक व कारगिल क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और मुकाबले में आए भारतीय सैनिकों को मार गिराया। पाकिस्तानी सेना 5 से 18 हजार फुट की ऊंचाई पर होने के कारण भारतीय सेना को काफी नुकसान उठाना पड़ा। डटकर मुकाबला करने के लिए भारतीय सेना को विजय ऑपरेशन शुरू करना पड़ा, जिसमे 8वीं रेजिमेंट से बहादुर सिपाही नरेंद्र सिंह को दुश्मनों से टक्कर लेने के लिए भेजा गया। वे दुश्मनों को परास्त करते हुए मश्कोह घाटी के प्वाइंट 5301 पर पहुंच गए और रात को दुश्मनों की गोलियों का सामना किया। इसके बाद बहादुरी से दुश्मनों को मौत के घाट उतार दिया और त्रिशूल घाटी पर तिरंगा लहरा दिया। त्रिशूल घाटी पर रात के समय काफी अंधेरा होने के कारण दुश्मनों ने मौके का फायदा उठाते हुए चोटी पर हमला बोल दिया। मुकाबले में एक गोली नरेंद्र सिंह की जांघ में लगी और दूसरी गोली सिर में लगी। घायल नरेंद्र सिंह मश्कोह घाटी के प्वाइंट 5301 पर गिर पड़े और भारत माता का जयकारा लगाते हुए शहीद हो गए।
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शहीद नरेंद्र सिंह का जन्म 17 सितंबर 1978 को हुआ। उनका पूरा परिवार ही देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत था। उनके दादा अमर सिंह जाखड़ व पिता जय सिंह जाखड़ भी फौज में थे। नरेंद्र सिंह की शुरुआती शिक्षा मध्यप्रदेश के फौजी कैंट टैकनपुर में हुई। उनके पिता सीमा सुरक्षा बल में थे। फौजी कैंट की शिक्षा ने नरेंद्र सिंह पर ऐसी छाप छोड़ी की उन्होंने सेना में भर्ती होकर देश सेवा करने की ठान ली। उनके पिता की 24 वर्ष सेवाएं पूरी होने के बाद उन्हें अपने पिता के साथ गांव में लौटना पड़ा और बाकी पढ़ाई उन्होंने बाल भारती स्कूल में पूरी की।
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नशे के खिलाफ था नरेंद्र
नरेंद्र सिंह के पिता जयसिंह जाखड़ बताते हैं कि नरेंद्र सिंह हर प्रकार के नशे के खिलाफ था। खाने में वह दही व घी लेता था। बालीवाल और क्रिकेट उसके पसंदीदा खेल थे। नरेंद्र को 18 वर्ष की उम्र में हिसार के फौजी कैंट में भर्ती के दौरान सफलता मिली और देश सेवा का सपना उसका पूरा हो गया। उनकी ड्यूटी कश्मीर के सबसे ऊंचे पर्वतों पर लगी वहां के प्रतिकूल वातावरण में भी अपने कर्तव्य का बखूबी पालन किया।
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राष्ट्र के मुद्दों पर चर्चा करता था मेरा बेटा
माता रेशमा देवी बताती हैं कि छुट्टियों के दिनों में जब भी घर आता, हमेशा देश सेवा की बात करता था। वह राष्ट्र से जुड़े विषयों पर चर्चा करता था। उसे खाली बैठना पसंद नहीं था। वह घर के हर काम में हाथ बंटाता था।
जब दुश्मनों से किया मुकाबला
भाई रविंद्र बताते हैं कि नरेंद्र में चीते जैसी फुर्ती थी। उसे किसी प्रकार का कोई भय नहीं था, वह निडर और साहसी था। मई 1999 में पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सीमा में टाइगर हिल, मश्कोह घाटी, द्राक्ष, बटालिक व कारगिल क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और मुकाबले में आए भारतीय सैनिकों को मार गिराया। पाकिस्तानी सेना 5 से 18 हजार फुट की ऊंचाई पर होने के कारण भारतीय सेना को काफी नुकसान उठाना पड़ा। डटकर मुकाबला करने के लिए भारतीय सेना को विजय ऑपरेशन शुरू करना पड़ा, जिसमे 8वीं रेजिमेंट से बहादुर सिपाही नरेंद्र सिंह को दुश्मनों से टक्कर लेने के लिए भेजा गया। वे दुश्मनों को परास्त करते हुए मश्कोह घाटी के प्वाइंट 5301 पर पहुंच गए और रात को दुश्मनों की गोलियों का सामना किया। इसके बाद बहादुरी से दुश्मनों को मौत के घाट उतार दिया और त्रिशूल घाटी पर तिरंगा लहरा दिया। त्रिशूल घाटी पर रात के समय काफी अंधेरा होने के कारण दुश्मनों ने मौके का फायदा उठाते हुए चोटी पर हमला बोल दिया। मुकाबले में एक गोली नरेंद्र सिंह की जांघ में लगी और दूसरी गोली सिर में लगी। घायल नरेंद्र सिंह मश्कोह घाटी के प्वाइंट 5301 पर गिर पड़े और भारत माता का जयकारा लगाते हुए शहीद हो गए।

शहीद नरेंद्र जाखड़ के माता-पिता व परिवार के अन्य सदस्यग।- फोटो : Fatehabad

शहीद नरेंद्र सिंह की फाइल फोटो। - फोटो : Fatehabad