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Fatehabad News: नौकरी दांव पर रखकर विवादित ढांचा ध्वस्त करने पहुंच गए थे फतेहाबाद के हरिकृष्ण नारंग

Mon, 08 Jan 2024 11:11 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फतेहाबाद Updated Mon, 08 Jan 2024 11:11 PM IST
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Harikrishna Narang of Fatehabad had come to demolish the disputed structure by risking his job
बाबारी मस्जिद विध्वंस के शामिल रहे हरिकृष्ण नारंग।
फतेहाबाद। जब 1990 में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर चिंगारी जली थी तो इसका असर 1992 में कार सेवकों द्वारा विवादित ढांचे को ध्वस्त करने के बाद पूरा हुआ। फतेहाबाद जिले से कई कार सेवक अयोध्या पहुंचे थे। इनमें फतेहाबाद के हरिकृष्ण नारंग भी थे। भगवान राम के मंदिर स्थापना के सपने को पूरे करने लेकर वे विवादित ढांचे के गुंबद पर चढ़ गए और तोड़ने में लग गए थे। हरिकृष्ण फिलहाल फतेहाबाद के हुडा सेक्टर-3 में रह रहे हैं। उनमें कारसेवा को लेकर इतना जुनून था कि उस समय वे अपनी नौकरी से छुट्टी लेकर अयोध्या पहुंच गए थे। अपने इस कार्य से हरिकृष्ण नारंग एक समय कारसेवकों में हीरो बन गए थे।
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22 जनवरी 2024 को अयोध्या में रामलला का आगमन हो रहा है। अपनी इस बहुप्रतीक्षित सपने को पूरा होते देख हरिकृष्ण बताते हैं कि मैं 1971 में बिजली विभाग अब निगम में भर्ती हुआ था। 1990 में जब मैं 38 साल का था तो मैंने टीवी पर देखा कि कारसेवकों पर हमला हुआ है। मैं शुरू से ही रामभक्त रहा हूं, ऐसे में यह उसी समय मेरा मन विचलित हो गया। 2 दिसंबर 1992 को मुझे सूचना मिली कि कुछ कारसेवक अयोध्या में राम मंदिर के लिए फतेहाबाद से दुर्गा मंदिर से निकल रहे हैं। यह पता चलते ही तुरंत निगम से छुट्टी के लिए अप्लाई कर दिया। नौकरी दांव पर थी, लेकिन मुझे जुनून था कि अयोध्या जाना ही है। 3 बजे मैं दुर्गा मंदिर के पास पहुंच गया। यहां पर आरएसएस के श्रीराम बंसल, उनकी पत्नी, पूर्व विधायक बलबीर चौधरी, भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डॉ. आत्मप्रकाश मेहता, ओमप्रकाश रेल्हन, नरेश लोहिया, मेहरचंद गांधी, शम्मी ढींगड़ा, विजय गोयल व रमेश गांधी मौजूद थे। उनके साथ मैं बस में सवार होकर दिल्ली पहुंच गया। यहां से हम ट्रेन पकड़ कर 4 दिसंबर को अयोध्या पहुंचे। वहां पर पुलिस का भारी पहरा था। किसी प्रकार से हम सरयू नदी के किनारे पर पहुंच गए। यहां पर कारसेवकों के रहने की व्यवस्था थी। 5 दिसंबर को हमने सरयू नदी पर स्नान किया और वापस अपनी सराय में पहुंच गए। 6 दिसंबर को सुबह सरयू नदी पर स्नान किया और सरयू की रेत उठाकर बाबरी मस्जिद से आधा किलोमीटर दूर बने मंच पर पहुंच गए। यहां पर देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री रही उमा भारती सहित कई अन्य नेतागण मौजूद थे।
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भाषण से भर गया जोश
उस समय इन नेताओं के भाषण से मौके पर मौजूद हजारों की तादाद में कारसेवकों में जोश भर गया। मैं भी यहीं पर शामिल था तो वहीं से जब कारसेवक सब्बल आदि उठाकर विवादित ढांचे को ध्वस्त करने के लिए जा रहे थे, तो उनके बीच में पहुंच गया और गुंबद पर चढ़ गया। सभी लोग विवादित ढांचे पर चढ़कर उसे तोड़ने लगे। करीब डेढ़ बजे पहला, ढाई से 3 बजे के करीब दूसरा और 4 बजे तीसरा गुंबद तोड़ दिया गया। जब मैंने गुंबद गिरने के बाद अंदर जाकर देखा तो साफ लग रहा था कि यहां पर हिंदू मंदिर था।
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रास्ते में बरसाए पत्थर
हम जब घर लौट आ रहे थे तो हमारी बसों पर पत्थर बरसाए गए। कुछ लोगों ने मुख्य रास्तों पर टायर जलाकर छोड़ दिए थे। किसी तरह हमें दूसरा मार्ग मिला और हम वहां से निकल आए। उस समय मोबाइल फोन नहीं होते थे, ऐसे में परिवार वालों को चिंता थी, दिल्ली पहुंच कर घर पर लैंडलाइन फोन से जानकारी दी कि जल्द घर आ रहे हैं, तभी परिवारवालों ने राहत की सांस ली। मैं वहां से एक ईंट उठाकर लाया था। शिव नगर में जब मैंने अपना घर बनाया तो उसमें आज भी वह ईंट लगी हुई है।



मैंने भगवान राम को हमेशा से माना है। 2004 में दरियापुर में बिजली ठीक करते समय मैं दुर्घटना का शिकार हो गया था। परिवारवालों ने मान लिया था कि मैं दुनिया छोड़ चुका हूं, हाथ जल गया था और एक आंख भी चली गई। मगर शायद भगवान राम की शक्ति ही थी कि अब मैं 78 साल की उम्र में 22 जनवरी को भगवान श्रीराम के मंदिर में मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा को देख पाउंगा। गम यह भी है कि 1992 में मेरे साथ जाने वाले कई साथी अब इस समय दुनिया में नहीं है।
हरिकृष्ण नारंग, कारसेवक एवं सेवानिवृत्त कर्मचारी
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