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ठंडे बस्ते में गया ‘गंदा’ गांव का नाम बदलने का प्रस्ताव
अमर उजाला ब्यूरो, फतेहाबाद
Updated Sun, 20 Nov 2016 11:06 PM IST
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पीएम मोदी को पत्र लिखने वाली हरप्रीत कौर ।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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रतिया के गांव ‘गंदा’ का नाम बदलने को लेकर जिला प्रशासन और प्रदेश सरकार ने जितनी तेजी दिखाई थी, वो अब हवा होती नजर आ रही है। इस मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय के दखल के बावजूद अभी तक गंदा गांव का नाम बदलने की फाइल सरकारी दफ्तरों में ही घूमती नजर आ रही है। जून और जुलाई में बातें की जा रही थी कि गंदा और कई अन्य गांवों के नाम बदलने के लिए बाकायदा कैबिनेट की विशेष बैठक बुलाकर नामों को बदला जाएगा, लेकिन छह महीने होने के बावजूद सूबे के अफसरों और नेताओं ने इस दिशा में एक कदम तक आगे नहीं बढ़ाया है।
8 जनवरी को लिखा था खत, चार महीने बाद आया था जवाब
गांव गंदा के सरकारी स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा हरप्रीत कौर ने अपने गांव का नाम बदलने के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खत इसी साल की शुरुआत में 8 जनवरी को लिखा था। इसमें उसने अपने गांव ‘गंदा’ का नाम बदलने की दरख्वास्त की थी। लगभग चार महीने बाद पीएम मोदी के दफ्तर से इस बाबत एक जवाबी खत जिला और रतिया प्रशासन के नाम आया, जिसमें गांव गंदा से संबंधित समस्याओं का निदान करने के निर्देश दिए गए थे।
पीएम मोदी के दफ्तर से खत आते ही जिला प्रशासन ने इस संदर्भ में आननफानन में इस बारे में कार्यवाही शुरू कर दी। हालांकि उस कार्यवाही का नतीजा क्या हुआ, पांच माह बीतने के बाद भी किसी को नहीं मालूम। किसी भी गांव का नाम बदलने की कार्यवाही मंत्रिमंडल की बैठक में प्रस्ताव पारित होने पर ही हो सकती है लेकिन पिछले पांच माह में आधा दर्जन से अधिक मंत्रिमंडल की बैठक हो चुकी है लेकिन एक बार भी ये मुद्दा मंत्रिमंडल में नहीं लाया गया।
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नेताओं से लेकर अफसरों तक में लगी थी गांव गंदा के दौरे की होड़
पीएम मोदी के दफ्तर से गांव गंदा की समस्याओं के निदान का निर्देश संबंधी खत की खबर जैसे ही फैली, जिले के राजनेताओं से लेकर अधिकारियों तक इस गांव का दौरा करने की होड़ लग गई। कुछेक काम हुए भी सही लेकिन गांव का नाम आज तक नहीं बदला।
जिले में एकमात्र बत्ती और झंडी वाली गाड़ी लेकर चलने वाली भाजपा नेत्री सुनीता दुग्गल ने तो एक कार्यक्रम में पीएम को खत लिखने वाली हरप्रीत कौर को सम्मानित भी किया लेकिन गांव का नाम बदलने का मामला कहां तक पहुंचा, इस बारे में कोई अफसर बताने को तैयार नजर नहीं आता।
इससे पहले 1989 में भी हो चुका है प्रयास, नहीं चढ़ा था सिरे
रतिया के गांव गंदा का नाम बदलने की कवायद इससे पहले 1989 में भी हो चुकी है। गांव की पंचायत ने 4 मार्च 1989 को एक प्रस्ताव पास करके गांव का नाम अजीत नगर रखने की सिफारिश की थी। लेकिन उस वक्त भी राजस्व विभाग की औपचारिकताएं पूरी ना होने से इस गांव के नाम को बदलने की प्रक्रिया पर अमल नहीं हो सका था।
अन्य जिलों से भी उठी थी कई गांवों के नाम बदलने की आवाज
फतेहाबाद में गंदा गांव के साथ साथ नकटा गांव का नाम बदलने के लिए गांव की पंचायत ने प्रस्ताव पारित कर प्रशासन को भेजा था। फतेहाबाद के गंदा गांव का मसला जब मीडिया की सुर्खियों में आया तो कई जिलों के ऐसे अजीब नाम वाले गांवों ने भी इस दिशा में आवाज बुलंद की। इसी के चलते सिरसा के गांव कुताबढ़, हिसार का गांव चोरमार आदि ने भी अपने गांव का नाम बदलने के लिए प्रस्ताव प्रदेश सरकार को भेजे थे लेकिन अभी तक प्रदेश सरकार की ओर से इस बारे में कोई कदम नहीं उठाया गया है।
हर अफसर दूसरे अफसर पर डाल रहा जिम्मेदारी
गांव गंदा रतिया उपमंडल में आता है तो सबसे पहली जिम्मेदारी रतिया एसडीएम की थी। रतिया एसडीएम पूजा चावरियां से जब इस बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि हमने प्रस्ताव एडीसी दफ्तर को भेज दिया था।
अब इस बारे में एडीसी साहब ही कुछ बता सकेंगे। एडीसी जेके अभीर से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्होंने तो ये फाइल राजस्व विभाग के पास भिजवा दिया था। जिला राजस्व अधिकारी विजेंद्र भारद्वाज से जब इस बारे में बात की गई तो उनका कहना था कि उन्होंने तो सरकार को फाइल भिजवा दी थी। सरकार से अभी तक जवाब आया नहीं है। जब उनसे पूछा गया कि सरकार से कोई फॉलोअप क्यों नहीं लिया गया तो इस बात का उनके पास कोई जवाब नहीं था।
पीएम को भेजे खत में ये लिखा था आठवीं की छात्रा हरप्रीत कौर ने
आदरणीय प्रधानमंत्री जी, भारत सरकार, नई दिल्ली
सविनय निवेदन ये है कि हमारे गांव का नाम ‘गंदा’ है। हम जहां भी जाते हैं, लोग हमारी बेइज्जती करते हैं हमारे गांव के नाम लेकर। प्लीज इसे बदल दीजिए। समस्याएं और भी हैं। स्कूल की चारदीवारी नहीं है। स्कूल टाइम में आवारा पशु अंदर घुस जाते हैं और हमें पढ़ाई में दिक्कत होती है। छोटे बच्चे तो अपने घर चले जाते हैं। हमारे स्कूल और साथ लगते पशु अस्पताल में तकरीबन 100 पौधे लगे हैं, लेकिन चारदीवारी नहीं होने से उनकी भी सुरक्षा नहीं होती। स्कूल और अस्पताल की जमीन पर अवैध कब्जे कर भेड़ों का बाड़ा बना दिया गया है। इन समस्याओं से भी निजात दिलाएं।
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8 जनवरी को लिखा था खत, चार महीने बाद आया था जवाब
गांव गंदा के सरकारी स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा हरप्रीत कौर ने अपने गांव का नाम बदलने के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खत इसी साल की शुरुआत में 8 जनवरी को लिखा था। इसमें उसने अपने गांव ‘गंदा’ का नाम बदलने की दरख्वास्त की थी। लगभग चार महीने बाद पीएम मोदी के दफ्तर से इस बाबत एक जवाबी खत जिला और रतिया प्रशासन के नाम आया, जिसमें गांव गंदा से संबंधित समस्याओं का निदान करने के निर्देश दिए गए थे।
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पीएम मोदी के दफ्तर से खत आते ही जिला प्रशासन ने इस संदर्भ में आननफानन में इस बारे में कार्यवाही शुरू कर दी। हालांकि उस कार्यवाही का नतीजा क्या हुआ, पांच माह बीतने के बाद भी किसी को नहीं मालूम। किसी भी गांव का नाम बदलने की कार्यवाही मंत्रिमंडल की बैठक में प्रस्ताव पारित होने पर ही हो सकती है लेकिन पिछले पांच माह में आधा दर्जन से अधिक मंत्रिमंडल की बैठक हो चुकी है लेकिन एक बार भी ये मुद्दा मंत्रिमंडल में नहीं लाया गया।
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नेताओं से लेकर अफसरों तक में लगी थी गांव गंदा के दौरे की होड़
पीएम मोदी के दफ्तर से गांव गंदा की समस्याओं के निदान का निर्देश संबंधी खत की खबर जैसे ही फैली, जिले के राजनेताओं से लेकर अधिकारियों तक इस गांव का दौरा करने की होड़ लग गई। कुछेक काम हुए भी सही लेकिन गांव का नाम आज तक नहीं बदला।
जिले में एकमात्र बत्ती और झंडी वाली गाड़ी लेकर चलने वाली भाजपा नेत्री सुनीता दुग्गल ने तो एक कार्यक्रम में पीएम को खत लिखने वाली हरप्रीत कौर को सम्मानित भी किया लेकिन गांव का नाम बदलने का मामला कहां तक पहुंचा, इस बारे में कोई अफसर बताने को तैयार नजर नहीं आता।
इससे पहले 1989 में भी हो चुका है प्रयास, नहीं चढ़ा था सिरे
रतिया के गांव गंदा का नाम बदलने की कवायद इससे पहले 1989 में भी हो चुकी है। गांव की पंचायत ने 4 मार्च 1989 को एक प्रस्ताव पास करके गांव का नाम अजीत नगर रखने की सिफारिश की थी। लेकिन उस वक्त भी राजस्व विभाग की औपचारिकताएं पूरी ना होने से इस गांव के नाम को बदलने की प्रक्रिया पर अमल नहीं हो सका था।
अन्य जिलों से भी उठी थी कई गांवों के नाम बदलने की आवाज
फतेहाबाद में गंदा गांव के साथ साथ नकटा गांव का नाम बदलने के लिए गांव की पंचायत ने प्रस्ताव पारित कर प्रशासन को भेजा था। फतेहाबाद के गंदा गांव का मसला जब मीडिया की सुर्खियों में आया तो कई जिलों के ऐसे अजीब नाम वाले गांवों ने भी इस दिशा में आवाज बुलंद की। इसी के चलते सिरसा के गांव कुताबढ़, हिसार का गांव चोरमार आदि ने भी अपने गांव का नाम बदलने के लिए प्रस्ताव प्रदेश सरकार को भेजे थे लेकिन अभी तक प्रदेश सरकार की ओर से इस बारे में कोई कदम नहीं उठाया गया है।
हर अफसर दूसरे अफसर पर डाल रहा जिम्मेदारी
गांव गंदा रतिया उपमंडल में आता है तो सबसे पहली जिम्मेदारी रतिया एसडीएम की थी। रतिया एसडीएम पूजा चावरियां से जब इस बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि हमने प्रस्ताव एडीसी दफ्तर को भेज दिया था।
अब इस बारे में एडीसी साहब ही कुछ बता सकेंगे। एडीसी जेके अभीर से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्होंने तो ये फाइल राजस्व विभाग के पास भिजवा दिया था। जिला राजस्व अधिकारी विजेंद्र भारद्वाज से जब इस बारे में बात की गई तो उनका कहना था कि उन्होंने तो सरकार को फाइल भिजवा दी थी। सरकार से अभी तक जवाब आया नहीं है। जब उनसे पूछा गया कि सरकार से कोई फॉलोअप क्यों नहीं लिया गया तो इस बात का उनके पास कोई जवाब नहीं था।
पीएम को भेजे खत में ये लिखा था आठवीं की छात्रा हरप्रीत कौर ने
आदरणीय प्रधानमंत्री जी, भारत सरकार, नई दिल्ली
सविनय निवेदन ये है कि हमारे गांव का नाम ‘गंदा’ है। हम जहां भी जाते हैं, लोग हमारी बेइज्जती करते हैं हमारे गांव के नाम लेकर। प्लीज इसे बदल दीजिए। समस्याएं और भी हैं। स्कूल की चारदीवारी नहीं है। स्कूल टाइम में आवारा पशु अंदर घुस जाते हैं और हमें पढ़ाई में दिक्कत होती है। छोटे बच्चे तो अपने घर चले जाते हैं। हमारे स्कूल और साथ लगते पशु अस्पताल में तकरीबन 100 पौधे लगे हैं, लेकिन चारदीवारी नहीं होने से उनकी भी सुरक्षा नहीं होती। स्कूल और अस्पताल की जमीन पर अवैध कब्जे कर भेड़ों का बाड़ा बना दिया गया है। इन समस्याओं से भी निजात दिलाएं।