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हे छठी मइया, सुनि लेहू अरज हमार...
Faridabad
Updated Mon, 19 Nov 2012 12:00 PM IST
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फरीदाबाद। सुख-समृद्धि एवं मनोकामना पूर्ति के लिए जाने जाने वाले छठ पर्व की तैयारियां पूरी कर ली गईं हैं। सोमवार की शाम डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। मंगलवार को सुबह उगते सूर्य देवता की आराधना के साथ ही व्रत समाप्त होगा।
दर्जनों जगहाें पर छठ पर्व के लिए घाट तैयार कराए गए हैं। हर घाट पर मेले जैसा माहौल है। जहां पर लोगों ने रविवार को पूजा सामग्री की खरीदारी की। डबुआ स्थित भोजपुरी-अवधी समाज के कार्यालय, सेक्टर-52 के शिव मंदिर, सेक्टर-22 के शिव मंदिर, सेक्टर-23, संजय कालोनी, सोहना रोड, सेक्टर-तीन, सेक्टर-55, खेड़ी पुल, पल्ला पुल, नंगला रोड तालाब, बल्लभगढ़ एवं नंगला एंक्लेव आदि में घाट बनाए गए हैं।
लोक आस्था के इस पर्व पर हर जगह पूर्वांचल एवं बिहार के लोग सोमवार को सूर्य देवता को अर्घ्य देने की तैयारी कर रहे हैं। ज्योतिषाचार्य पंडित रंजित झा कहते हैं कि संभवत: यह अपने आप में इस बात के लिए अनूठा पर्व है जिसमें उगते सूर्य के साथ-साथ डूबते की भी पूजा की जाती है। व्रतियों को चार दिन तक उपवास करना पड़ता है इसलिए इसे महाव्रत कहते हैं।
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उनके मुताबिक इस पर्व के बारे में मान्यता है कि इसका आरंभ कुंती द्वारा सूर्य की आराधना से हुआ था। आराधना में कुंती ने सूर्य से अपने पुत्र के कल्याण की कामना की थी। कहा जाता है कि पांडवों के राजपाट छिन जाने पर द्रौपदी ने छठ का व्रत रखने का प्रण किया था। मनोकामना पूरी होने पर उन्होंने छठ का व्रत किया।
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दर्जनों जगहाें पर छठ पर्व के लिए घाट तैयार कराए गए हैं। हर घाट पर मेले जैसा माहौल है। जहां पर लोगों ने रविवार को पूजा सामग्री की खरीदारी की। डबुआ स्थित भोजपुरी-अवधी समाज के कार्यालय, सेक्टर-52 के शिव मंदिर, सेक्टर-22 के शिव मंदिर, सेक्टर-23, संजय कालोनी, सोहना रोड, सेक्टर-तीन, सेक्टर-55, खेड़ी पुल, पल्ला पुल, नंगला रोड तालाब, बल्लभगढ़ एवं नंगला एंक्लेव आदि में घाट बनाए गए हैं।
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लोक आस्था के इस पर्व पर हर जगह पूर्वांचल एवं बिहार के लोग सोमवार को सूर्य देवता को अर्घ्य देने की तैयारी कर रहे हैं। ज्योतिषाचार्य पंडित रंजित झा कहते हैं कि संभवत: यह अपने आप में इस बात के लिए अनूठा पर्व है जिसमें उगते सूर्य के साथ-साथ डूबते की भी पूजा की जाती है। व्रतियों को चार दिन तक उपवास करना पड़ता है इसलिए इसे महाव्रत कहते हैं।
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उनके मुताबिक इस पर्व के बारे में मान्यता है कि इसका आरंभ कुंती द्वारा सूर्य की आराधना से हुआ था। आराधना में कुंती ने सूर्य से अपने पुत्र के कल्याण की कामना की थी। कहा जाता है कि पांडवों के राजपाट छिन जाने पर द्रौपदी ने छठ का व्रत रखने का प्रण किया था। मनोकामना पूरी होने पर उन्होंने छठ का व्रत किया।