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निर्मल विचारधारा अपनाकर विकारों से मुक्ति संभव: गीता महाराज
Sat, 16 Aug 2025 11:50 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
संवाद न्यूज एजेंसी, चरखी दादरी
Updated Sat, 16 Aug 2025 11:50 PM IST
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गुरु मंदिर में भंडारे के दौरान उपस्थित श्रद्धालु।
चरखी दादरी। जैन स्थानक परिसर में गीता जी महाराज ठाणे- 5 के सानिध्य में श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव धूमधाम से मनाया गया। नन्हें-मुन्ने बच्चों ने राधा-कृष्ण की फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में भाग लिया और गुरु आराधना सत्संग कार्यक्रम के दौरान गुरु मंदिर में भंडारे का आयोजन भी किया गया।
गीता महाराज ने प्रवचनों के माध्यम से बताया की मनुष्य का मन विकारों से मुक्त तभी हो सकता है, जब उसकी विचारधारा निर्मल होगी। निर्मल मन पाने के लिए व्यक्ति की संगत और रंगत में स्वच्छता और शुद्धता का होना जरूरी है। मनुष्य को जीवन में मुश्किलों और परेशानियों का कई बार सामना करना पड़ता है। इसका एक कारण यह है कि व्यक्ति की स्वार्थपूर्ति की लालसा बनी रहती है। आदमी इसी धुन में लगा हुआ है कि सांसारिक कामनाओं की पूर्ति हो जाए तो ही उसे सुख मिल सकता है। दूसरे का अच्छा हो या बुरा, इससे कोई मतलब नहीं।
उन्होंने कहा कि सृष्टि एक है और जिस धरा पर हम जीवन व्यतीत कर रहे हैं, वह भी एक है। यहां सूरज और चांद भी एक-एक ही हैं। जब प्रकृति का संबंध आपस में अटूट है तो व्यक्ति-व्यक्ति में भेद संभव नहीं है। अर्थात हर जीव एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। हम किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति मन में छल कपट के भाव रख कर कार्य करेंगे तो उसमें बुरा खुद का ही होगा। व्यक्ति को केवल अपने बारे में नहीं, अपितु जग के बारे चिंतन करना चाहिए।
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गीता महाराज ने प्रवचनों के माध्यम से बताया की मनुष्य का मन विकारों से मुक्त तभी हो सकता है, जब उसकी विचारधारा निर्मल होगी। निर्मल मन पाने के लिए व्यक्ति की संगत और रंगत में स्वच्छता और शुद्धता का होना जरूरी है। मनुष्य को जीवन में मुश्किलों और परेशानियों का कई बार सामना करना पड़ता है। इसका एक कारण यह है कि व्यक्ति की स्वार्थपूर्ति की लालसा बनी रहती है। आदमी इसी धुन में लगा हुआ है कि सांसारिक कामनाओं की पूर्ति हो जाए तो ही उसे सुख मिल सकता है। दूसरे का अच्छा हो या बुरा, इससे कोई मतलब नहीं।
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उन्होंने कहा कि सृष्टि एक है और जिस धरा पर हम जीवन व्यतीत कर रहे हैं, वह भी एक है। यहां सूरज और चांद भी एक-एक ही हैं। जब प्रकृति का संबंध आपस में अटूट है तो व्यक्ति-व्यक्ति में भेद संभव नहीं है। अर्थात हर जीव एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। हम किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति मन में छल कपट के भाव रख कर कार्य करेंगे तो उसमें बुरा खुद का ही होगा। व्यक्ति को केवल अपने बारे में नहीं, अपितु जग के बारे चिंतन करना चाहिए।
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