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Highcourt: बच्चे की कस्टडी के लिए सीधे बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल नहीं कर सकते मां-बाप, HC का अहम फैसला

Wed, 17 Dec 2025 07:26 PM IST
चण्डीगढ़-हरियाणा ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: चण्डीगढ़-हरियाणा ब्यूरो Updated Wed, 17 Dec 2025 07:26 PM IST
सार

कोर्ट ने कहा कि कस्टडी के मामलों में नाबालिग के कल्याण को सबसे ज्यादा अहमियत दी जानी चाहिए। इस तरह के निर्धारण के लिए कई कारकों का समग्र और बारीक मूल्यांकन जरूरी है, जिसमें बच्चे की मनोवैज्ञानिक भलाई, शारीरिक माहौल और कुल मिलाकर सुरक्षा शामिल है।

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Parents cannot directly file habeas corpus petition for custody of child: High Court
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने अहम फैसले में यह साफ कर दिया है कि कस्टडी या मुलाकात के विवादों में फैमिली कोर्ट को बाइपास करके बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए माता-पिता हाईकोर्ट में नहीं आ सकते है जब तक बच्चे को तुरंत और गंभीर खतरा न हो।
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जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका फैमिली कोर्ट की ओर से तय आदेश के मामले में विकल्प नहीं है और वह भी तब जब कस्टडी और मुलाकात के अधिकार पहले ही एक सक्षम सिविल कोर्ट की ओर से तय किए जा चुके हों। मुलाकात के अधिकारों के दुरुपयोग, दुर्व्यवहार या माता-पिता के गलत व्यवहार के आरोप ऐसे विवादित तथ्य हैं जो सीधे फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उन पर दोबारा विचार नहीं किया जा सकता है सिवाय उन मामलों के जब बच्चे को गंभीर और तत्काल खतरा हो।
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कोर्ट ने कहा कि कस्टडी के मामलों में नाबालिग के कल्याण को सबसे ज्यादा अहमियत दी जानी चाहिए। इस तरह के निर्धारण के लिए कई कारकों का समग्र और बारीक मूल्यांकन जरूरी है, जिसमें बच्चे की मनोवैज्ञानिक भलाई, शारीरिक माहौल और कुल मिलाकर सुरक्षा शामिल है।
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कोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में नाबालिग बच्चे की स्थायी कस्टडी पहले ही एक सिविल कोर्ट की ओर से पारित आपसी सहमति से तलाक के फैसले के तहत मां को दी जा चुकी थी जिसमें पिता को मुलाकात के अधिकार दिए गए थे। मां की ओर से पिता पर मुलाकात के अधिकारों के दुरुपयोग और दुर्व्यवहार के बारे में आरोप लगाए गए थे।


कोर्ट ने कहा कि आरोप विवादित हैं और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की कार्यवाही में उनका फैसला नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता एक पूरा कानूनी तंत्र प्रदान करती है जिसका इस्तेमाल आपराधिक शिकायत की स्थिति में किया जाना चाहिए। सिर्फ आशंका के आधार पर पुलिस सुरक्षा के निर्देश देना या माता-पिता के कानूनी मुलाकात के अधिकारों में कटौती करना सही नहीं ठहराया जा सकता। कोई असाधारण या तत्काल खतरे की आशंका न पाते हुए जस्टिस गोयल ने मां की याचिका पर सुनवाई करते हुए किसी भी प्रकार का दखल देने से इनकार कर दिया है।
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