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झुग्गियों में रहने वाले लोग अपराधी प्रवृत्ति के होते हैं जैसा निष्कर्ष निकालना अनुचित : हाईकोर्ट
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-एनडीपीएस मामले में नाबालिग आरोपी को जमानत देते हुए हाईकोर्ट की टिप्पणी
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एनडीपीएस के मामले में नाबालिग आरोपी को नियमित जमानत देते हुए कहा कि झुग्गी-बस्तियों में रहने वालों को अपराधियों के संपर्क में आने की संभावना होने के तर्क को मनमाना, अमानवीय, अपमानजनक और असंवैधानिक पूर्वाग्रह है। आरोपी दो वर्षों से हिरासत में था जबकि अधिकतम सजा तीन साल की है।
अंबाला की अदालत ने जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि वह अनाथ है और झुग्गी बस्ती में रहता है। इसलिए उसे ऑब्जर्वेशन होम में ही रहना चाहिए। हाईकोर्ट ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि झुग्गियों में रहने वाले लोग अपराधी प्रवृत्ति के होते हैं जैसा निष्कर्ष निकालना अनुचित और मानवीय गरिमा का अपमान है। किसी व्यक्ति के गरीब या झुग्गी बस्ती में रहने को उसकी आपराधिक प्रवृत्ति से जोड़ना न केवल क्रूरता है, बल्कि यह समाज के लिए भी अपमानजनक है। कोर्ट ने कहा कि भारत की एक बड़ी आबादी ऐसे ही सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में निवास करती है लेकिन वहां के निवासी आपसी सहयोग, भावनात्मक समर्थन और सामूहिक मूल्यों से संपन्न होते हैं। हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई कि निचली अदालत ने आरोपी के अनाथ होने को जमानत न देने का आधार बनाया। हाईकोर्ट ने कहा कि माता-पिता की अनुपस्थिति का मतलब यह नहीं कि बच्चे को हिरासत में ही रखा जाए। कोर्ट ने न्याय व्यवस्था को चेताया कि वह गरीबों और वंचित तबकों के प्रति किसी भी प्रकार का पूर्वग्रह न रखे।
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एनडीपीएस के मामले में नाबालिग आरोपी को नियमित जमानत देते हुए कहा कि झुग्गी-बस्तियों में रहने वालों को अपराधियों के संपर्क में आने की संभावना होने के तर्क को मनमाना, अमानवीय, अपमानजनक और असंवैधानिक पूर्वाग्रह है। आरोपी दो वर्षों से हिरासत में था जबकि अधिकतम सजा तीन साल की है।
अंबाला की अदालत ने जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि वह अनाथ है और झुग्गी बस्ती में रहता है। इसलिए उसे ऑब्जर्वेशन होम में ही रहना चाहिए। हाईकोर्ट ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि झुग्गियों में रहने वाले लोग अपराधी प्रवृत्ति के होते हैं जैसा निष्कर्ष निकालना अनुचित और मानवीय गरिमा का अपमान है। किसी व्यक्ति के गरीब या झुग्गी बस्ती में रहने को उसकी आपराधिक प्रवृत्ति से जोड़ना न केवल क्रूरता है, बल्कि यह समाज के लिए भी अपमानजनक है। कोर्ट ने कहा कि भारत की एक बड़ी आबादी ऐसे ही सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में निवास करती है लेकिन वहां के निवासी आपसी सहयोग, भावनात्मक समर्थन और सामूहिक मूल्यों से संपन्न होते हैं। हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई कि निचली अदालत ने आरोपी के अनाथ होने को जमानत न देने का आधार बनाया। हाईकोर्ट ने कहा कि माता-पिता की अनुपस्थिति का मतलब यह नहीं कि बच्चे को हिरासत में ही रखा जाए। कोर्ट ने न्याय व्यवस्था को चेताया कि वह गरीबों और वंचित तबकों के प्रति किसी भी प्रकार का पूर्वग्रह न रखे।
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