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Chandigarh-Haryana News: हाईकोर्ट ने 44 साल पुराने जमीनी विवाद को दिया विराम
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-35 कनाल 16 मरला भूमि मामले में याचिकाकर्ता की मांग खारिज
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 44 साल पुराने जमीनी विवाद को विराम देते हुए इस मामले में याचिकाकर्ता साधु राम के परिवार के खिलाफ फैसला दिया है। जस्टिस दीपक गुप्ता ने 1981 से विचाराधीन याचिका को खारिज कर दिया।
विवाद महेंद्रगढ़ जिले की नारनौल तहसील के खोर गांव की ज़मीन से जुड़ा था। 1981 में बिहारी लाल नामक किसान ने अपनी 35 कनाल 16 मरला भूमि में से एक-तिहाई हिस्सा साधु राम और एक अन्य ग्रामीण मातादीन को बेचने पर सहमति जताई थी। सौदे के तहत साधु राम को 5,040 की राशि सीधे देने के बजाय तीन साल के भीतर उस पैसे से बिहारी लाल के कर्ज चुकाने थे। कर्ज चुकाने के बाद भूमि का स्वामित्व साधु राम को मिलना था। विवाद तब शुरू हुआ जब साधु राम ने दावा किया कि उसने लेनदारों को नोटिस भेजे थे जबकि बिहारी लाल ने पूरे सौदे से इन्कार कर दिया। इसी विवाद ने आने वाले चार दशकों तक अदालतों के चक्कर लगवाए। साधुराम ने पहले 1986 में अदालत का रुख किया लेकिन 8 दिसंबर 1986 को बिना अनुमति के मुकदमा वापस ले लिया। केवल दो दिन बाद, 10 दिसंबर 1986 को उन्होंने दोबारा नया मुकदमा दायर कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने 21 सितंबर 1991 को फैसला देते हुए माना कि समझौता असली था लेकिन उसे लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि साधु राम ने निर्धारित तीन साल में कर्ज नहीं चुकाया और अपनी तत्परता भी साबित नहीं की। ऊपरी अदालत ने 2 अप्रैल 1992 को इस निर्णय को बरकरार रखा। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा और तीन दशक तक लंबित रहा।
सुनवाई के दौरान साधु राम के वकील ने दलील दी कि याची को कर्जदारों का पता नहीं चल सका। इसलिए देरी को माफ किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह कहते हुए अपील को खारिज कर दिया कि तत्परता साबित न कर पाने से वादी राहत पाने का हकदार नहीं रह जाता। इस तरह 44 साल पुराने इस विवाद पर आखिरकार विराम लग गया, जिसमें साधु राम और बिहारी लाल दोनों ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी पीढ़ियां इस मुकदमे को लड़ती रहीं।
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 44 साल पुराने जमीनी विवाद को विराम देते हुए इस मामले में याचिकाकर्ता साधु राम के परिवार के खिलाफ फैसला दिया है। जस्टिस दीपक गुप्ता ने 1981 से विचाराधीन याचिका को खारिज कर दिया।
विवाद महेंद्रगढ़ जिले की नारनौल तहसील के खोर गांव की ज़मीन से जुड़ा था। 1981 में बिहारी लाल नामक किसान ने अपनी 35 कनाल 16 मरला भूमि में से एक-तिहाई हिस्सा साधु राम और एक अन्य ग्रामीण मातादीन को बेचने पर सहमति जताई थी। सौदे के तहत साधु राम को 5,040 की राशि सीधे देने के बजाय तीन साल के भीतर उस पैसे से बिहारी लाल के कर्ज चुकाने थे। कर्ज चुकाने के बाद भूमि का स्वामित्व साधु राम को मिलना था। विवाद तब शुरू हुआ जब साधु राम ने दावा किया कि उसने लेनदारों को नोटिस भेजे थे जबकि बिहारी लाल ने पूरे सौदे से इन्कार कर दिया। इसी विवाद ने आने वाले चार दशकों तक अदालतों के चक्कर लगवाए। साधुराम ने पहले 1986 में अदालत का रुख किया लेकिन 8 दिसंबर 1986 को बिना अनुमति के मुकदमा वापस ले लिया। केवल दो दिन बाद, 10 दिसंबर 1986 को उन्होंने दोबारा नया मुकदमा दायर कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने 21 सितंबर 1991 को फैसला देते हुए माना कि समझौता असली था लेकिन उसे लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि साधु राम ने निर्धारित तीन साल में कर्ज नहीं चुकाया और अपनी तत्परता भी साबित नहीं की। ऊपरी अदालत ने 2 अप्रैल 1992 को इस निर्णय को बरकरार रखा। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा और तीन दशक तक लंबित रहा।
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सुनवाई के दौरान साधु राम के वकील ने दलील दी कि याची को कर्जदारों का पता नहीं चल सका। इसलिए देरी को माफ किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह कहते हुए अपील को खारिज कर दिया कि तत्परता साबित न कर पाने से वादी राहत पाने का हकदार नहीं रह जाता। इस तरह 44 साल पुराने इस विवाद पर आखिरकार विराम लग गया, जिसमें साधु राम और बिहारी लाल दोनों ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी पीढ़ियां इस मुकदमे को लड़ती रहीं।
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