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Bhiwani News: चार दशक से चकबंदी की बाट जोह रहे जूई खुर्द व जूई बिचली के ग्रामीण

Sun, 22 Sep 2024 03:52 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी Updated Sun, 22 Sep 2024 03:52 AM IST
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Villagers of Jui Khurd and Jui Bichli are waiting for consolidation
अनिल लाम्बा
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जूई। कभी राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले जूई खुर्द व जूई बिचली के ग्रामीणों के लिए चकबंदी न होना नासूर बन गया है। खेतों में जाने को रास्ते नहीं हैं। जमीनों के खाते अलग नहीं हो पा रहे। आए दिन ग्रामीणों के डोले के लिए विवाद होते रहते हैं। वहीं दोनों गांव विकास के नाम पर पिछड़ गए हैं।
ऐसा भी नहीं की ग्रामीणों ने स्थानीय नेता से लेकर मुख्यमंत्री तक व कर्मचारी से लेकर उपायुक्त तक सभी के आगे गुहार न लगाई हो। लेकिन आज तक धरातल पर काम शून्य ही रहा है। जबकि ये मामला विभागीय फाइलों में ही उलझा हुआ है। चुनावी समर में गावों के हर मतदाता ने इस समस्या से निजात दिलाने की गुहार लगाई है ताकि गांव में भी विकास की बयार बह सके।
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जूई बिचली के पूर्व सरपंच उमेद लांबा, सत्यनाराय शर्मा, शेर सिंह, भीम सिंह, हरिसिंह, राजेश लांबा, विनोद जांगड़ा, राजपाल यादव, इंद्रपाल ने बताया कि दोनों गांवों की चकबंदी नहीं होने से गांव में बहुत ज्यादा नुकसान हुआ है। सारे विकास कार्य ठप पड़े हैं। दोनों गांवों में कोई खेल स्टेडियम, कॉलेज, आईटीआई, कोचिंग सेंटर नहीं बन पाया। खिलाड़ी, पढ़ने वाले बच्चे बहुत परेशान हैं। ऐसे में गांव की चकबंदी होने से ही विकास के द्वार खुलेंगे।
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चुनावों में इतने सालों से नेता वोट ले जाते हैं पर इस समस्या की तरफ किसी का ध्यान नहीं है। अगर ये काम बने तो गांव का भाईचारा कायम रहे। आने वाले सभी प्रत्याशी को इसके बारे में अवगत करवाया जा रहा है। ये भविष्य के गर्भ में है कि दो गांवों की इस प्रमुख समस्या पर ध्यान देते हैं।



चार दशक पहले हुई थी चकबंदी

जूई खुर्द व जूई बिचली के बुजुर्गों की माने तो चार दशक पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल ने दोनों गांवों की चकबंदी शुरू करवाई थी। काम पूरा भी हो गया था लेकिन लोगों ने खेतों में कब्जे नहीं पकड़े और यथास्थिति को कायम रखा। बुजुर्गों की उस गलती की सजा आज की पीढ़ी खेत के रास्तों, डोले को लेकर हो रहे प्रतिदिन विवाद के रूप में भुगत रहे हैं। राजस्व विभाग से जमीनी रिकॉर्ड लेने चले जाओ चार पीढ़ियों तक के सभी दस्तावेज लेने पड़ते हैं। इसमें आर्थिक नुकसान भी भुगतना पड़ता है।
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