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Bhiwani News: सीबीएलयू में गूंजी विभाजन की पीड़ा, पूर्व कुलपति और पीड़ितों ने सुनाए दर्द भरे किस्से
Fri, 08 Aug 2025 10:28 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
Updated Fri, 08 Aug 2025 10:28 PM IST
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चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में मौजूद कुलपति प्रो दीप्ति धर्माणी, कुलसचि
भिवानी। चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय में शुक्रवार को भारत विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर माहौल भावुक हो उठा। मंच से पीड़ितों और विभाजन देख चुके साक्षियों ने अपने जख्मों की कहानियां सुनाईं तो श्रोताओं की आंखें नम हो गईं।
युवा कल्याण विभाग और हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में हुए कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. दीप्ति धर्माणी ने की। कुलसचिव डॉ. भावना शर्मा विशेष रूप से मौजूद रहीं। मुख्य अतिथि के रूप में मुख्यमंत्री के ओएसडी एवं पूर्व कुलपति प्रो. राज नेहरू और मुख्य वक्ता के रूप में हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के कार्यकारी उपाध्यक्ष एवं पूर्व कुलपति डॉ. कुलदीप चंद्र अग्निहोत्री ने शिरकत की। विशिष्ट अतिथियों में पूर्व सूचना आयुक्त भूपेंद्र धर्माणी, वरिष्ठ अधिवक्ता सोहन लाल मक्कड़ और नेवी से सेवानिवृत्त अधिकारी रमेश चंद्र शामिल हुए। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. सुरेश मलिक और संचालन डॉ. सोनल शेखावत ने किया।
मुख्य अतिथि प्रो. राज नेहरू ने कहा कि वे विभाजन की पीड़ा को भली-भांति समझते हैं क्योंकि उनका जन्म जम्मू-कश्मीर में हुआ और उन्हें भी घर-बार छोड़कर कई वर्षों तक टेंट में रहना पड़ा। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने पूर्वजों की इस पीड़ा को समझें और यह संकल्प लें कि इस तरह की दर्दनाक त्रासदी फिर कभी न हो। उन्होंने बताया कि भारत की प्राचीन सभ्यता विश्व की सबसे अनूठी थी जिसे देखने विदेशों से लोग आते थे। सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्रियों के अनुसार प्राचीन भारत की जीडीपी विश्व की कुल जीडीपी का 35 से 50 प्रतिशत तक थी जिससे हमारी शैक्षिक और आर्थिक समृद्धि का अंदाजा लगाया जा सकता है।
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मुख्य वक्ता प्रो. कुलदीप चंद्र अग्निहोत्री ने कहा कि यह केवल देश का नहीं बल्कि पंजाब और बंगाल प्रांतों का भी विभाजन था। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में पूरे हिंदुस्तान ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, जिससे घबराकर उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई। भारत को कमजोर करने के लिए अंग्रेजों ने विभाजन की साजिश रची थी जिसका खामियाजा लाखों लोगों को भुगतना पड़ा।
कुलपति प्रो. दीप्ति धर्माणी ने कहा कि हम एकजुट और संगठित रहकर हर चुनौती पर विजय पा सकते हैं। यदि हम संगठित रहेंगे, तो हमें कोई हरा नहीं सकता। उन्होंने कहा कि विभाजन की त्रासदी में महिलाओं ने दोहरी पीड़ा सही जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। डीन स्टूडेंट वेलफेयर डॉ. सुरेश मलिक ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के महत्व पर विस्तृत जानकारी दी। कार्यक्रम में पीड़ित परिवारों से वरिष्ठ अधिवक्ता सोहन लाल मक्कड़ और नेवी से सेवानिवृत्त अधिकारी रमेश चंद्र ने अपने अनुभव साझा किए, जिनमें उस दौर की भयावह परिस्थितियों और दर्दनाक घटनाओं का जिक्र था।
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युवा कल्याण विभाग और हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में हुए कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. दीप्ति धर्माणी ने की। कुलसचिव डॉ. भावना शर्मा विशेष रूप से मौजूद रहीं। मुख्य अतिथि के रूप में मुख्यमंत्री के ओएसडी एवं पूर्व कुलपति प्रो. राज नेहरू और मुख्य वक्ता के रूप में हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के कार्यकारी उपाध्यक्ष एवं पूर्व कुलपति डॉ. कुलदीप चंद्र अग्निहोत्री ने शिरकत की। विशिष्ट अतिथियों में पूर्व सूचना आयुक्त भूपेंद्र धर्माणी, वरिष्ठ अधिवक्ता सोहन लाल मक्कड़ और नेवी से सेवानिवृत्त अधिकारी रमेश चंद्र शामिल हुए। कार्यक्रम का संयोजन डॉ. सुरेश मलिक और संचालन डॉ. सोनल शेखावत ने किया।
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मुख्य अतिथि प्रो. राज नेहरू ने कहा कि वे विभाजन की पीड़ा को भली-भांति समझते हैं क्योंकि उनका जन्म जम्मू-कश्मीर में हुआ और उन्हें भी घर-बार छोड़कर कई वर्षों तक टेंट में रहना पड़ा। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने पूर्वजों की इस पीड़ा को समझें और यह संकल्प लें कि इस तरह की दर्दनाक त्रासदी फिर कभी न हो। उन्होंने बताया कि भारत की प्राचीन सभ्यता विश्व की सबसे अनूठी थी जिसे देखने विदेशों से लोग आते थे। सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्रियों के अनुसार प्राचीन भारत की जीडीपी विश्व की कुल जीडीपी का 35 से 50 प्रतिशत तक थी जिससे हमारी शैक्षिक और आर्थिक समृद्धि का अंदाजा लगाया जा सकता है।
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मुख्य वक्ता प्रो. कुलदीप चंद्र अग्निहोत्री ने कहा कि यह केवल देश का नहीं बल्कि पंजाब और बंगाल प्रांतों का भी विभाजन था। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में पूरे हिंदुस्तान ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, जिससे घबराकर उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति अपनाई। भारत को कमजोर करने के लिए अंग्रेजों ने विभाजन की साजिश रची थी जिसका खामियाजा लाखों लोगों को भुगतना पड़ा।
कुलपति प्रो. दीप्ति धर्माणी ने कहा कि हम एकजुट और संगठित रहकर हर चुनौती पर विजय पा सकते हैं। यदि हम संगठित रहेंगे, तो हमें कोई हरा नहीं सकता। उन्होंने कहा कि विभाजन की त्रासदी में महिलाओं ने दोहरी पीड़ा सही जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। डीन स्टूडेंट वेलफेयर डॉ. सुरेश मलिक ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के महत्व पर विस्तृत जानकारी दी। कार्यक्रम में पीड़ित परिवारों से वरिष्ठ अधिवक्ता सोहन लाल मक्कड़ और नेवी से सेवानिवृत्त अधिकारी रमेश चंद्र ने अपने अनुभव साझा किए, जिनमें उस दौर की भयावह परिस्थितियों और दर्दनाक घटनाओं का जिक्र था।