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ऑस्ट्रेलिया में वीआईपी कल्चर नहीं, इसलिए मिल रहीं सुविधाएं : सुरेंद्र

Wed, 15 Jan 2020 12:15 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Wed, 15 Jan 2020 12:15 AM IST
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surendra chal, austrelian counsler,
बातचीत करते आस्ट्रेलिया से भिवानी पहुंचें काउंसलर सुरेंद्र चहल साथ में है अधिवक्ता राजनारायण प? - फोटो : Bhiwani
ऑस्ट्रेलिया के एडिलेड से पार्षद (काउंसलर) बने हरियाणा के सुरेंद्र चहल मंगलवार को भिवानी पहुंचे। वे यहां से मुक्केबाज, कुश्ती और एथलेटिक खिलाड़ी ज्यादा होने के बारे में सुनने के बाद व्यवस्थाएं देखने पहुंचे थे। उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया में वीआईपी कल्चर नहीं है। वहां के नेता भी बिना सिक्योरिटी के घूमते हैं। इसी कारण वहां आमजन को बेहतर सुविधाएं मिल रही है।
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पिछले 12 सालों से ऑस्ट्रेलिया में रह रहे मूलरूप से जींद के गांव झाझवान वासी सुरेंद्र चहल हाल ही में वहां सिटी ऑफ वेस्ट टोरेंस के प्लंपटन वार्ड से पार्षद बने हैं। ऑस्ट्रेलिया से तुलना करते हुए उन्होंने बताया कि वहां पार्षदों की जवाबदेही है। वे ऐसे वादे चुनाव में नहीं कर सकते, जो पूरे न कर सके। वहां आमजन की मूलभूत सुविधाओं की जिम्मेदारी पार्षद की होती है जो सीओ (जिला अधिकारी) के साथ बैठक में मुद्दे रखकर काम करवाता है। इसी कारण वहां साफ-सफाई व सभी तरह की सुविधाएं आमजन को मिल रही है। वहां बड़े नेता भी बिना सिक्योरिटी के घूमते हैं और पुलिस अपने मूल काम में रहती है मगर अपने यहां स्थिति बिल्कुल विपरीत है।
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खिलाड़ियों के साथ नहीं होते फिजियो और मसाजर
सुरेंद्र चहल ने बताया कि उन्होंने भिवानी से अधिक संख्या में खिलाड़ी होने के बारे में सुना था और इसी कारण वह यहां व्यवस्थाएं देखने आया। यहां अन्य देशों की तुलना में मजबूत खिलाड़ी हैं मगर सुविधाओं में बहुत पिछड़े हैं। यहां कोचिंग का सिस्टम कमजोर है और अधिकतर खिलाड़ी स्वयं ही अभ्यास करते हैं। खेल का सामान इतना कम है कि खिलाड़ियों को पहले अभ्यास कर रहे खिलाड़ियों के अभ्यास खत्म होने का इंतजार करना पड़ता है, ताकि उसी सामान से वे अभ्यास कर सकें। जबकि ऑस्ट्रेलिया में एक फुटबाल खिलाड़ी के पास भी 20-20 बॉल होंगी ताकि एक बॉल दूर जाती है तो उसे लाने में समय बर्बाद न हो और वह पूरी तरह ट्रेनिंग पर ध्यान दे सके। यहां विदेशों में जाने वाली टीमों के पास भी फिजियो और मसाजर नहीं होते। ऐसा ही नजारा उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में हुए लाइफ सेविंग खेलों में देखा था, जहां भारतीय टीम के पास फिजियो तक नहीं था। अगर यहां बेहतर सुविधाएं मिले तो खिलाड़ी अन्य देशों की तुलना बेहतर कर सकते हैं। भिवानी खेल स्टेडियम में हॉकी और सिंथेटिक ट्रैक तो बेहतर लगा मगर अन्य मैदानों में गड्ढे हैं, जिससे खिलाड़ी चोटिल हो सकते हैं।
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