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धरनास्थल पर आत्महत्या मामला: 1857 के विद्रोह से जुड़ा है रोहनात का इतिहास, ग्रामीणों को चुकानी पड़ी थी ये कीमत
Tue, 12 Sep 2023 10:21 PM IST
भूपेंद्र सिंह
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी (हरियाणा)
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी (हरियाणा)
Published by: भूपेंद्र सिंह
Updated Tue, 12 Sep 2023 10:21 PM IST
सार
14 सितंबर 1857 को गांव को बागी घोषित कर दिया था और अंग्रेजों ने गांव को नीलाम करने का फैसला किया। ग्रामीणों की मांग के अनुसार रोहनात के ग्रामीणों को नीलाम हुई भूमि पर मालिकाना हक नहीं मिला है और शहीदों के गांव की भी घोषणा नहीं हुई है।
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मृतक वेद सिंह का फाइल फोटो और ग्रामीण।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
हरियाणा के भिवानी के गांव रोहनात का इतिहास भी दिलचस्प है। हांसी में अंग्रेजी हुकूमत की छावनी होती थी। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी हिसार-हांसी भी पहुंची थी। 29 मई 1857 को मंगल खां के विरोध का साथ देते हुए स्वामी बरण दास बैरागी, रूपा खाती, नौंदा जाट सहित ग्रामीण एकत्रित होकर हांसी पहुंचे।
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गांव रोहनात के अलावा आसपास के गांवों के ग्रामीणों ने भी अंग्रेजों पर हमला किया। जिसमें हांसी हिसार के अंग्रेजी अफसर मारे गए। जेल में बंद कैदियों को भी ग्रामीणों ने रिहा करवा दिया और तत्कालीन अंग्रेजी सरकार के खजाने भी लूट लिए। जब अंग्रेज आला अधिकारियों को इसकी भनक लगी तो विरोध की चिंगारी को दबाने के लिए एक पलाटून को जरनल कोर्ट लैंड की अगुवाई में हांसी भेजा गया।
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अंग्रेजों ने गांव पुरी मंगल क्षेत्र में तोपें लगवाकर रोहनात पर हमला कर दिया। गांव रोहनात के सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। गांव के बिरड़ दास बैरागी को तोप पर बांध कर उनके शरीर को चिथड़ों की तरह उड़ा दिया। अंग्रेजों का विरोध करने वाले ग्रामीणों को अंग्रेज अपने साथ हांसी ले गए, जहां पर उनके शरीर के ऊपर से रोड रोलर चला दिया, इससे सडक़ खून से लाल गई और आज भी यह सडक़ लाल सडक़ के नाम से जानी जाती है।
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रोहनात में मौजूद है मौत का कुआं
गांव रोहनात के तालाब किनारे बना कुआं अंग्रेजी हुकूमत की बर्बरता का गवाह है। ग्रामीण और महिलाएं अपनी जान इज्जत बचाने के लिए कुएं में कूदे थे। यहीं पास में ही दो बरगद के पेड़ हैं, जहां पर अंग्रेजों ने लोगों को सरेआम फांसी पर लटका दिया था। मौत का कुआं आज भी मौजूद है।
अंग्रेजों ने नीलाम कर दी थी गांव की पूरी जमीन
14 सितंबर 1857 को गांव को बागी घोषित कर दिया था और अंग्रेजों ने गांव को नीलाम करने का फैसला किया। 20 जुलाई 1857 को जमीन नीलामी की प्रक्रिया शुरू की और महीने के अंदर गांव के लगभग 20656 बीघे और 19 मरले कृषि योग्य व गैर कृषि योग्य भूमि की नीलामी 8100 सौ रुपये में कर दी थी। जिसे आसपास के गांव के 61 लोगों ने खरीदा था। बेदखल होने के कारण गांव के किसान अपनी ही जमीन पर मजदूरी करने को मजबूर हो गए। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ तो लोगों ने अंग्रेजों की दी हुई सजा सरकार से वापस लेने की मांग की। ग्रामीणों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक से जमीन वापस दिलवाने की गुहार लगाई लेकिन आश्वासन के अलावा लोगों को कुछ नहीं मिला। तत्कालीन संयुक्त पंजाब में मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो ने 1966 में रोहनात वासियों को मुआवजा व जमीन हिसार के बीड फार्म में देने की बात कही, लेकिन इसी दौरान एक नवंबर 1966 को हरियाणा अपने अस्तित्व में आ गया और नया राज्य बन गया। गांव वासियों ने हरियाणा सरकार के सामने मांगें रखीं लेकिन सरकार ने खजाने में पैसे न होने की बात कह कर पल्ला झाड़ लिया। इस प्रकार रोहनात वासियों को जमीन आज तक नहीं मिली। इसके बाद गांववासी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस को भी नहीं मनाते थे। यहां तक कि गांव के लोग आजादी के पर्व में भी भाग नहीं लेते थे।
15 अगस्त 2010 में गांव में फहराया था काला झंडा
मांगें पूरी नहीं होने पर रोष स्वरूप 15 अगस्त 2010 को गांव में लोगों ने काला झंडा भी फहराया था, जो देशभर में चर्चा का विषय भी रहा था। इसके बाद 23 मार्च 2018 शहीद दिवस को मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने ग्रामीणों के साथ मिलकर उनके दर्द को समझा और गांव में तिरंगा झंडा फहराया और ग्रामीणों की मांग को जल्द पूरा करवाने का आश्वासन दिया था।
10 अगस्त 2022 से चल रहा है अनिश्चित कालीन धरना
ग्रामीणों ने 10 अगस्त 2022 को गांव को स्वतंत्रता सेनानी गांव घोषित करने व सरकार द्वारा आवंटित किए गए स्थान पर प्लॉट दिए जाने व विभिन्न पट्टियों में बंटे गांव की पट्टी को तोड़कर जमीन गांव के नाम करने की मांग को लेकर अनिश्चित कालीन धरना शुरू किया था। गांव के क्रांतिकारी कुएं के पास ये धरना चलता रहा। 17 अगस्त को ग्रामीण संतलाल की धरना स्थल पर मौत हो गई। जिसके बाद शव को धरना स्थल पर रखकर ग्रामीणों ने आंदोलन किया। जिस पर प्रशासन ने मांग पूरी करने का आश्वासन दिया और शव का करीब आठ दिन बाद अंतिम संस्कार करा दिया। इसके बाद प्रशासन से अनुमति लेकर लघु सचिवालय के बाहर रोहनात के ग्रामीणों ने धरना शुरू किया। करीब 156 दिनों से भिवानी के लघु सचिवालय के बाहर अनिश्चित कालीन धरना चल रहा था कि मंगलवार को वेद सिंह का शव धरना स्थल पर फंदे से लटका मिला।