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सत्संग का अर्थ है सत्य का संग : कंवर महाराज
Mon, 08 Jul 2024 06:22 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
Updated Mon, 08 Jul 2024 06:22 AM IST
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भिवानी। सत्संग का अर्थ है सत्य का संग। सत्य केवल परमात्मा है। इसलिए सत्संग परमात्मा का संग है। हर सांस में जब परमात्मा का जिक्र होगा तब सत्संग होगा। ये बातें संत कंवर महाराज ने दिनोद गांव में स्थित राधास्वामी आश्रम में कहीं।
उन्होंने कहा कि तन से सेवा, मन से सुमिरन और धन भक्ति का होना चाहिए। महाराज ने सात जुलाई के दिन को स्मरण करते हुए कहा कि मेरे गुरु कुल मालिक ताराचंद महाराज ने 46 साल पहले सात जुलाई को मेरे ज्ञान चक्षु खोले थे। यह दिन राधास्वामी सत्संग दिनोद की संगत के लिए पवित्र दिन है। सात जुलाई सतहत्तर को कंवर महाराज ने गुरु की शरण में आकर सेवा और समर्पण की मिसाल कायम की। महाराज ने कहा कि मान, बड़ाई, अभिमान को तजे बिना आप सेवक नहीं बन सकते। जो सेवक नहीं बन सकता वह गुरु भी नहीं बन सकता। भक्ति की पहली सीढ़ी सद्चरित्र है। तप, संयम, सेवा, दीनता इसकी अगली सीढ़ियां हैं।
कहा कि कद्र इंसान की देह की नहीं बल्कि उसके गुणों की है। इंसान का पहला गुण माता-पिता, सास-ससुर की सेवा है। दूसरा गुण गृहस्थ धर्म का पालन करना है। जिस घर में प्रेम और शांति है भक्ति भी वहीं है। कहा कि सत्य सतगुरु है। नूरी सतगुरु के दर्शन देह के सतगुरु के माध्यम से ही होंगे। संत मत गुरु वचन पर टिके रहने का मत है। जिसने आप को बड़ा बनाया, उनके आगे कभी बड़े मत बनो। अहंकार को त्याग कर मां-बाप, दीन-दुखी की सहायता करो। संवाद
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उन्होंने कहा कि तन से सेवा, मन से सुमिरन और धन भक्ति का होना चाहिए। महाराज ने सात जुलाई के दिन को स्मरण करते हुए कहा कि मेरे गुरु कुल मालिक ताराचंद महाराज ने 46 साल पहले सात जुलाई को मेरे ज्ञान चक्षु खोले थे। यह दिन राधास्वामी सत्संग दिनोद की संगत के लिए पवित्र दिन है। सात जुलाई सतहत्तर को कंवर महाराज ने गुरु की शरण में आकर सेवा और समर्पण की मिसाल कायम की। महाराज ने कहा कि मान, बड़ाई, अभिमान को तजे बिना आप सेवक नहीं बन सकते। जो सेवक नहीं बन सकता वह गुरु भी नहीं बन सकता। भक्ति की पहली सीढ़ी सद्चरित्र है। तप, संयम, सेवा, दीनता इसकी अगली सीढ़ियां हैं।
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कहा कि कद्र इंसान की देह की नहीं बल्कि उसके गुणों की है। इंसान का पहला गुण माता-पिता, सास-ससुर की सेवा है। दूसरा गुण गृहस्थ धर्म का पालन करना है। जिस घर में प्रेम और शांति है भक्ति भी वहीं है। कहा कि सत्य सतगुरु है। नूरी सतगुरु के दर्शन देह के सतगुरु के माध्यम से ही होंगे। संत मत गुरु वचन पर टिके रहने का मत है। जिसने आप को बड़ा बनाया, उनके आगे कभी बड़े मत बनो। अहंकार को त्याग कर मां-बाप, दीन-दुखी की सहायता करो। संवाद
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