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Bhiwani News: जंग के हीरों व खेल के सितारे हैं मातूराम
Thu, 14 Aug 2025 12:53 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
Updated Thu, 14 Aug 2025 12:53 AM IST
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मातूराम पायल।
कैरू। आजादी के परवाने न मौत से डरते हैं, न ही मजबूरियों के आगे झुकते हैं बल्कि उनका डटकर सामना करते हैं। यही कहानी है भिवानी जिले के गांव देवराला के मातूराम पायल की जिन्होंने भारतीय सेना में दुश्मनों से लोहा लिया और खेल जगत में भी अपना लोहा मनवाया। 18 साल की उम्र में सेना में भर्ती हुए मातूराम 19 वर्ष की आयु में जंग के मैदान में उतरे। 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध में उन्होंने अदम्य साहस दिखाया। पठानकोट से 50 किलोमीटर अंदर पाकिस्तान की सीमा में घुसकर नैना कोट गांव में पाक सेना के करीब 70 जवानों को बंदी बना लिया गया जिनमें मातूराम भी शामिल थे।
युद्ध के दौरान एक पाक अधिकारी मातूराम से भिड़ गया। उसने उनके सिर पर तेज डंडा मारा और कनपटी पर बंदूक तानकर ‘वालेकुम सलाम’ कहने के लिए मजबूर किया। मगर मातूराम पायल अपने वतन और धर्म के प्रति अडिग रहे। उन्होंने साफ कह दिया “मैं राम-राम बोलूंगा, चाहे मेरी गर्दन कट जाए लेकिन धर्म के खिलाफ नहीं जाऊंगा।” आज भी उनके सिर पर उस डंडे का निशान मौजूद है। तीन दिन बाद भारतीय सेना ने पलटवार कर 70 जवानों को छुड़ाया और दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया। मातूराम ने भी बदला लेते हुए कई पाक सैनिकों को घायल व ढेर किया।
आज भी याद है वो जंग का मंजर
करीब 13 दिन चले इस युद्ध में अंततः पाकिस्तान को हार माननी पड़ी। मातूराम पायल बताते हैं कि उन्होंने 1965 और 1971 दोनों लड़ाइयों में हिस्सा लिया। उस समय की यादें आज भी मन में गूंजती हैं। मातूराम केवल युद्ध के ही नहीं बल्कि खेल के भी माहिर खिलाड़ी रहे। उन्होंने हरियाणा व पंजाब में कबड्डी के दांवपेंच से कई खिताब जीते। अब उम्र के 83वें पड़ाव पर होने के बावजूद उनका जज्बा बरकरार है। खेल से भले संन्यास ले लिया हो मगर आज भी सुबह-शाम सैर करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।
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युद्ध के दौरान एक पाक अधिकारी मातूराम से भिड़ गया। उसने उनके सिर पर तेज डंडा मारा और कनपटी पर बंदूक तानकर ‘वालेकुम सलाम’ कहने के लिए मजबूर किया। मगर मातूराम पायल अपने वतन और धर्म के प्रति अडिग रहे। उन्होंने साफ कह दिया “मैं राम-राम बोलूंगा, चाहे मेरी गर्दन कट जाए लेकिन धर्म के खिलाफ नहीं जाऊंगा।” आज भी उनके सिर पर उस डंडे का निशान मौजूद है। तीन दिन बाद भारतीय सेना ने पलटवार कर 70 जवानों को छुड़ाया और दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया। मातूराम ने भी बदला लेते हुए कई पाक सैनिकों को घायल व ढेर किया।
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आज भी याद है वो जंग का मंजर
करीब 13 दिन चले इस युद्ध में अंततः पाकिस्तान को हार माननी पड़ी। मातूराम पायल बताते हैं कि उन्होंने 1965 और 1971 दोनों लड़ाइयों में हिस्सा लिया। उस समय की यादें आज भी मन में गूंजती हैं। मातूराम केवल युद्ध के ही नहीं बल्कि खेल के भी माहिर खिलाड़ी रहे। उन्होंने हरियाणा व पंजाब में कबड्डी के दांवपेंच से कई खिताब जीते। अब उम्र के 83वें पड़ाव पर होने के बावजूद उनका जज्बा बरकरार है। खेल से भले संन्यास ले लिया हो मगर आज भी सुबह-शाम सैर करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।
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