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11 साल बाद मिला न्याय: ट्रिब्यूनल ने कॉलेज प्रिंसिपल अलका शर्मा को बहाल किया
Thu, 04 Sep 2025 01:27 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
Updated Thu, 04 Sep 2025 01:27 AM IST
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भिवानी। जिले के एक कॉलेज में प्रिंसिपल के पद से 2014 में सेवा से बर्खास्त की गईं अलका शर्मा को करीब 11 साल बाद न्याय मिला है। सात साल तक चली सुनवाई के बाद शिक्षा ट्रिब्यूनल ने बुधवार को अपने 62 पन्नों के फैसले में उन्हें सेवा समाप्ति की तारीख से बहाल करने, वेतन सहित सभी लंबित लाभ और सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन देने के आदेश दिए हैं। इतना ही नहीं, जब तक बकाया भुगतान नहीं होता, उस पर 7.5 प्रतिशत ब्याज देने के भी निर्देश दिए गए हैं।
12 मार्च 2014 को उच्चतर शिक्षा विभाग के महानिदेशक ने भिवानी के एक कॉलेज की प्रिंसिपल अलका शर्मा की सेवाएं समाप्त करने का आदेश जारी किया था। उन पर प्रशासक के आदेशों का पालन न करने, शिक्षकों की नियुक्ति में पक्षपात करने और कर्तव्य में लापरवाही बरतने जैसे आरोप लगाए गए थे। ये आरोप प्रायः चेतावनी तक सीमित रहते हैं लेकिन इस मामले में गंभीर मानते हुए 25 मार्च 2014 को उनकी सेवा समाप्त कर दी गई। उस समय उनकी सेवानिवृत्ति में करीब साढ़े पांच साल का समय शेष था।
इसके बाद अलका शर्मा ने उच्चतर शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के पास अपील दायर की लेकिन 30 दिसंबर 2016 को वह भी खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने उन्हें शिक्षा ट्रिब्यूनल में अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए। वरिष्ठ अधिवक्ता चेतन आनंद और अधिवक्ता निशांत आर्य के माध्यम से उन्होंने जिला एवं सत्र न्यायाधीश डीआर चालिया की अध्यक्षता वाले ट्रिब्यूनल में गुहार लगाई।
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करीब सात साल तक चली लंबी सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट कर दिया कि अलका शर्मा पर लगाए गए सभी आरोप निराधार थे। फैसले में कहा गया कि प्राचार्य की भूमिका केवल सूचना देने तक सीमित रहती है, ऐसे में उन पर पक्षपात का आरोप तर्कसंगत नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता चेतन आनंद ने कहा कि ट्रिब्यूनल में मामले के हर पहलू पर गंभीरता से सुनवाई हुई और यह फैसला भविष्य में कर्मचारियों के अधिकारों को मजबूत करने वाला साबित होगा।
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12 मार्च 2014 को उच्चतर शिक्षा विभाग के महानिदेशक ने भिवानी के एक कॉलेज की प्रिंसिपल अलका शर्मा की सेवाएं समाप्त करने का आदेश जारी किया था। उन पर प्रशासक के आदेशों का पालन न करने, शिक्षकों की नियुक्ति में पक्षपात करने और कर्तव्य में लापरवाही बरतने जैसे आरोप लगाए गए थे। ये आरोप प्रायः चेतावनी तक सीमित रहते हैं लेकिन इस मामले में गंभीर मानते हुए 25 मार्च 2014 को उनकी सेवा समाप्त कर दी गई। उस समय उनकी सेवानिवृत्ति में करीब साढ़े पांच साल का समय शेष था।
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इसके बाद अलका शर्मा ने उच्चतर शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के पास अपील दायर की लेकिन 30 दिसंबर 2016 को वह भी खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने उन्हें शिक्षा ट्रिब्यूनल में अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए। वरिष्ठ अधिवक्ता चेतन आनंद और अधिवक्ता निशांत आर्य के माध्यम से उन्होंने जिला एवं सत्र न्यायाधीश डीआर चालिया की अध्यक्षता वाले ट्रिब्यूनल में गुहार लगाई।
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करीब सात साल तक चली लंबी सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट कर दिया कि अलका शर्मा पर लगाए गए सभी आरोप निराधार थे। फैसले में कहा गया कि प्राचार्य की भूमिका केवल सूचना देने तक सीमित रहती है, ऐसे में उन पर पक्षपात का आरोप तर्कसंगत नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता चेतन आनंद ने कहा कि ट्रिब्यूनल में मामले के हर पहलू पर गंभीरता से सुनवाई हुई और यह फैसला भविष्य में कर्मचारियों के अधिकारों को मजबूत करने वाला साबित होगा।