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देश की आजादी में म्हारे योगदान को दर्शाएगा 'दास्तान ए रोहनात'

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 26 Mar 2022 01:30 AM IST
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'Dastaan-e-Rohnaat' will show my contribution in the country's independence
दास्तान-ए-रोहनात नाटक की रिहर्सल करते कलाकार। विज्ञप्ति - फोटो : Bhiwani
भिवानी। देश की आजादी में म्हारे गांव रोहनात के बुजुर्गों के योगदान को अब सभी जान पाएंगे। रोहनात गांव के बुजुर्गों के योगदान पर 'दास्तान ए रोहनात' नाटक बना है। मनीष जोशी द्वारा निर्देशित और लेखक यशराज शर्मा के इस नाटक का शनिवार को चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में मंचन किया जाएगा।
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नाटक देखने के लिए विशेष तौर पर कार्यक्रम में बतौर मुख्यातिथि मनोहर लाल शिरकत करेंगे। नाटक में 1857 की क्रांति में गांव रोहनात के बलिदान को दिखाया जाएगा, जिसे देखने के लिए गांव के लोगों में विशेष उत्साह है। नाटक का मंचन शाम साढ़े पांच बजे किया जाएगा।
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देश के अनेक सपूत ऐसे थे, जिनके नाम इतिहास में दर्ज नहीं हो पाए। जाने-अनजाने उन्हें भुला दिया गया। ऐसे ही दो योद्धा है नौंदाराम और बिरड़ा दास। उनके नाम इतिहास में दर्ज नहीं हो पाए, लेकिन ये योद्धा देश के लिए अपना फर्ज निभा गए। रोहनात गांव के ये वीर अंग्रेजों के जुल्म का शिकार हुए। नौंदाराम को अंग्रेजों ने तोप के गोले से उड़ा दिया। वहीं बिरड़ा दास को मेख ठोक-ठोक कर मार दिया। कहा जाता है कि मंगल पांडे भी इनसे मिलने आते थे और वहां के लोगों को संगठित करने में इनका बड़ा योगदान रहा। इन्हीं के योगदान पर नाटक दास्तान ए रोहनात आधारित है।
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आजादी के 71 साल भी नहीं फहरा तिरंगा, सीएम मनोहर लाल ने बुजुर्ग संग फहराया
रोहनात गांव में 23 मार्च 2018 से पहले कभी भी आजादी का जश्न नहीं मनाया गया था और न ही गांव में राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया था, क्योंकि यहां के ग्रामीणों की मांग को पूरा करने के लिए किसी भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। इसी रोष स्वरूप यहां के लोगों ने आजादी का जश्न नहीं मनाया था। लोगों को यह मलाल रहा कि देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ खो देने के बावजूद उन्हें वह जमीन तक नहीं मिली, जिसके लिए वे लड़ाई लड़ते रहे। इसी बात से खफा होकर ग्रामीणों ने यहां कभी झंडा नहीं फहराया था। कुछ समय पहले तक भी कुछ जमीन पर विवाद रहा। वर्तमान सरकार ने इस विवाद को निपटवाया। इसके बाद 23 मार्च 2018 को पहली बार मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने गांव के बुजुर्ग के हाथों राष्ट्रीय ध्वज फहराकर यहां के लोगों को गुलामी के अहसास से आजाद करवाया।
रोहनात के रणबांकुरों के बलिदान के प्रतीक हैं यहां के कुएं और हांसी की लाल सड़क
गांव रोहनात आजादी के रणबांकुरों के नाम से जाना जाता है। यहां के लोगों ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों से लोहा लेते हुए देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। गांव के वीर जांबाजों ने बहादुरशाह जफर के आदेश पर 29 मई 1857 के दिन अंग्रेजी हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी। इस दिन ग्रामीणों ने जेलें तोड़कर कैदियों को आजाद करवाया। 12 अंग्रेजी अफसरों को हिसार और 11 को हांसी में मार गिराया। इससे बौखलाकर अंग्रेजी सेना ने गांव पुट्ठी के पास तोप लगाकर गांव के लोगों को बुरी तरह भून दिया। सैंकड़ों लोग जलकर मर गए, फिर भी ग्रामीण लड़ते रहे। अंग्रेजों के जुल्म के आगे यहां के ग्रामीण निडर होकर डटे रहे और उन्होंने अंग्रेजों के जुल्म को भी सहा। अंग्रेजों ने यहां के गांव को तोप से तबाह कर दिया। अंग्रेजों ने इसके बाद भी जुल्मों को जारी रखा। औरतों और बच्चों को कुएं में फेंक दिया। दर्जनों लोगों को सरे आम जोहड़ के पास पेड़ों पर फांसी के फंदे पर लटका दिया। ये कुएं और पेड़ आज भी अंग्रेजी हुकूमत के जुल्मों के जीते जागते सुबूत हैं। इस गांव के लोगों पर अंग्रेजों के अत्याचार की सबसे बड़ी गवाह हांसी की एक सड़क है। इस सड़क पर बुल्डोजर चलाकर इस गांव के अनेक क्रांतिकारियों को कुचला गया था, जिससे यह रक्त रंजित हो गई थी और इसका नाम लाल सड़क रखा गया था। महिलाओं ने भी अंग्रेजों से आबरू बचाने के लिए गांव स्थित ऐतिहासिक कुएं में कूदकर जान दे दी थी।
नीलाम की जमीन, गांव के लोगों के खरीदने पर रोक
14 सितंबर 1857 को अंग्रेजों ने इस गांव को बागी घोषित कर दिया। 13 नवंबर को पूरे गांव की नीलामी के आदेश दे दिए गए। 20 जुलाई 1858 को गांव की जमीन व मकानों तक को नीलाम कर दिया गया। इस जमीन को पास के पांच गांवों के 61 लोगों ने महज 8 हजार रुपये की बोली में खरीदा था। अंग्रेज सरकार ने फिर फरमान भी जारी कर दिया कि भविष्य में इस जमीन को रोहनात के लोगों को न बेचा जाए। धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हो गई और यहां के लोगों ने अपने रिश्तेदारों के नाम कुछ एकड़ जमीन खरीदकर दोबारा गांव बसाया।
रोहनात गांव की कहानी जन-जन तक पहुंचे
रोहनात गांव में वर्ष 2018 में पहुंचे सीएम मनोहर ने निर्देश दिए थे कि रोहनात गांव की कहानी जन-जन तक पहुंचे। आठवीं की इतिहास की पुस्तक में शामिल अध्याय शीर्षक '1857 की क्रांति में रोहनात गांव का योगदान' को ग्राम सभाओं में बच्चों द्वारा व्यापक रूप से बताया जाना चाहिए। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में रोहनात गांव की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि गांव के इतिहास पर बनी प्रेरणादायक फिल्म को रोहनात गांव के साथ-साथ आसपास के गांवों और खंड में प्रदर्शित किया जाए।

10 बसों से नाटक देखने जाएंगे 600 से अधिक ग्रामीण
हिसार में होने वाले नाटक का मंचन देखने के लिए ग्रामीणों में भी विशेष उत्साह है। इसके लिए सरकार की ओर से भी विशेष व्यवस्था की गई है। 10 बसें ग्रामीणों को हिसार कार्यक्रम स्थल तक ले जाने और लाने के लिए लगाई गई हैं। निवर्तमान सरपंच रवींद्र ने बताया कि शनिवार दोपहर बाद करीब साढ़े तीन बजे बसें हिसार के लिए रवाना होंगी। 600 से अधिक ग्रामीण नाटक देखने जाएंगे। उनके लिए सभी व्यवस्थाएं की गई हैं।
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