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बिना सरकारी मदद के खड़ी कर दी स्कूल बिल्डिंग
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 12 Sep 2016 01:15 AM IST
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- फोटो : concept photo
सेहत व शिक्षा का कोई महत्व जानना चाहे तो नाथुवास गांव वालों से जाने। सौ साल से भी अधिक वक्त बीत चुका, गांव का कोई भी बाशिंदा दूध की बिक्री नहीं करता। इसलिए कि, बच्चे और युवा सेहतमंद बनें। 30 साल पहले लगा कि गांव को स्कूल की जरूरत है, तो पूरे गांव ने एकजुट होकर 2.10 लाख रुपये जुटाए और अपने बूते पर स्कूल की बिल्डिंग खड़ी कर दी। करीब दस साल पहले स्कूल में कमरों की कमी दिखी तो फिर ग्रामीणों ने सरकार की मदद का इंतजार नहीं किया।
शहर से तीन किलोमीटर के फासले पर स्थित इस गांव को शासन-प्रशासन से न के बराबर मिला। जो करना है खुद करना है, इस बात में गांव वालों का कुछ ज्यादा ही यकीन है। 1985 में पड़ोसी गांव कालूवास से मामूली बात के बाद पूरे गांव ने तय किया कि नाथुवास के बच्चे कहीं नहीं जाएंगे, गांव में ही पढ़ेंगे। गांव के बुजुर्ग प्रमुख लोगों की 21 सदस्यीय 'स्कूल निर्माण कमेटीÓ बनी। इस कमेटी के महासचिव रहे डा. रामफल बताते हैं कि गांव के संपन्न व निर्धन सभी ने स्कूल के लिए दिल खोलकर दान दिया। 2.10 लाख रुपये एकत्र हो गए और दो लोगों ने दो कमरे बनवाकर देने का वादा किया। छह कमरे, हॉल का निर्माण कराया। रामफल के मुताबिक, स्कूल बनाने के लिए गांव वालों के सिर्फ पैसा नहीं दिया, बल्कि श्रमदान भी किया। प्राइमरी से मिडिल, फिर हाई और अब सीनियर सेकेंडरी तक स्कूल बना। लगभग 10 साल पहले ग्रामीणों ने अपने बूते छह कमरे बनवाए। बाद में सर्व शिक्षा अभियान के तहत सरकार ने सात कमरे बनवाए। गांव के युवा प्रीतम दलाल बताते हैं कि गांव के बुजुर्गों ने बरसों पहले अच्छा खाने व अच्छी पढ़ाई की सीख दी थी। आज भी गांव के लोग बाहरी दिखावे के बजाय अपना पैसा सेहत व शिक्षा पर खर्च करना पसंद करते हैं।
...यहां दूध की बिक्री वर्जित है
करीब पांच सौ साल पुराने नाथुवास गांव में बरसों से दूध बेचने पर पाबंदी है। पूरा गांव इस परंपरा पर आज भी कायम है। गांव के रिटायर्ड बैंक मैनेजर रामशरण बताते हैं कि दो सौ-ढाई सौ साल पहले पशुओं में बीमारी फैल गई थी। तब एक संत ने दूध न बेचने की सलाह दी थी। इसके बाद से यह सलाह परंपरा में बदल गई। इस परंपरा की वजह से गांव में दूध-घी की कभी कोई कमी नहीं रही। बच्चे-युवा सेहतमंद हैं। बुजुर्ग दयानंद ने बताया कि आज भी गांव को कोई व्यक्ति दूध नहीं बेचता। यह बात आसपास के गांवों व शहर के लोगों को पता है। इसलिए, बड़ी तादाद में लोग गांव में लस्सी लेने आते हैं।
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और भी हैं खासियत
- ग्रामीण अपने विवाद भी खुद निपटाते हैं। जमीनी विवादों को छोड़ दें तो मुद्दत से कोई क्रिमिनल केस सामने नहीं आया।
- लगभग सौ युवा विभिन्न खेलों से जुड़े हैं। इनमें ज्यादातर कबड्डी व बॉक्सिंग खेलते हैं। पूर्व रणजी खिलाड़ी संजय दलाल इसी गांव के हैं।
- छह हजार की आबादी वाला यह गांव पढ़े-लिखों का गांव है। दो कर्नल समेत डेढ़ सौ के लगभग लोग सेना में हैं। करीब 40 अध्यापक हैं। साक्षरता दर 90 प्रतिशत के आसपास है।
अब तक केवल वॉटर वर्क्स मिला
शासन की ओर से गांव को बहुत कम मिला है। सरकार ने गांव में 2012 में वॉटर वर्क्स बनवाया था। गांव के सरपंच आजाद सिंह ने बताया कि गांव की 40 गलियों में से करीब 20 गली कच्ची हैं। फिरनी खत्म हो चुकी है। स्टेडियम व पार्क की जरूरत है। गांव के दोनों सरकारी स्कूलों की बिल्डिंग गांव ने खुद बनवाई है। सरपंच ने गांव की समस्याओं के हल के लिए शासन-प्रशासन से गुजारिश की है।
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शहर से तीन किलोमीटर के फासले पर स्थित इस गांव को शासन-प्रशासन से न के बराबर मिला। जो करना है खुद करना है, इस बात में गांव वालों का कुछ ज्यादा ही यकीन है। 1985 में पड़ोसी गांव कालूवास से मामूली बात के बाद पूरे गांव ने तय किया कि नाथुवास के बच्चे कहीं नहीं जाएंगे, गांव में ही पढ़ेंगे। गांव के बुजुर्ग प्रमुख लोगों की 21 सदस्यीय 'स्कूल निर्माण कमेटीÓ बनी। इस कमेटी के महासचिव रहे डा. रामफल बताते हैं कि गांव के संपन्न व निर्धन सभी ने स्कूल के लिए दिल खोलकर दान दिया। 2.10 लाख रुपये एकत्र हो गए और दो लोगों ने दो कमरे बनवाकर देने का वादा किया। छह कमरे, हॉल का निर्माण कराया। रामफल के मुताबिक, स्कूल बनाने के लिए गांव वालों के सिर्फ पैसा नहीं दिया, बल्कि श्रमदान भी किया। प्राइमरी से मिडिल, फिर हाई और अब सीनियर सेकेंडरी तक स्कूल बना। लगभग 10 साल पहले ग्रामीणों ने अपने बूते छह कमरे बनवाए। बाद में सर्व शिक्षा अभियान के तहत सरकार ने सात कमरे बनवाए। गांव के युवा प्रीतम दलाल बताते हैं कि गांव के बुजुर्गों ने बरसों पहले अच्छा खाने व अच्छी पढ़ाई की सीख दी थी। आज भी गांव के लोग बाहरी दिखावे के बजाय अपना पैसा सेहत व शिक्षा पर खर्च करना पसंद करते हैं।
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...यहां दूध की बिक्री वर्जित है
करीब पांच सौ साल पुराने नाथुवास गांव में बरसों से दूध बेचने पर पाबंदी है। पूरा गांव इस परंपरा पर आज भी कायम है। गांव के रिटायर्ड बैंक मैनेजर रामशरण बताते हैं कि दो सौ-ढाई सौ साल पहले पशुओं में बीमारी फैल गई थी। तब एक संत ने दूध न बेचने की सलाह दी थी। इसके बाद से यह सलाह परंपरा में बदल गई। इस परंपरा की वजह से गांव में दूध-घी की कभी कोई कमी नहीं रही। बच्चे-युवा सेहतमंद हैं। बुजुर्ग दयानंद ने बताया कि आज भी गांव को कोई व्यक्ति दूध नहीं बेचता। यह बात आसपास के गांवों व शहर के लोगों को पता है। इसलिए, बड़ी तादाद में लोग गांव में लस्सी लेने आते हैं।
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और भी हैं खासियत
- ग्रामीण अपने विवाद भी खुद निपटाते हैं। जमीनी विवादों को छोड़ दें तो मुद्दत से कोई क्रिमिनल केस सामने नहीं आया।
- लगभग सौ युवा विभिन्न खेलों से जुड़े हैं। इनमें ज्यादातर कबड्डी व बॉक्सिंग खेलते हैं। पूर्व रणजी खिलाड़ी संजय दलाल इसी गांव के हैं।
- छह हजार की आबादी वाला यह गांव पढ़े-लिखों का गांव है। दो कर्नल समेत डेढ़ सौ के लगभग लोग सेना में हैं। करीब 40 अध्यापक हैं। साक्षरता दर 90 प्रतिशत के आसपास है।
अब तक केवल वॉटर वर्क्स मिला
शासन की ओर से गांव को बहुत कम मिला है। सरकार ने गांव में 2012 में वॉटर वर्क्स बनवाया था। गांव के सरपंच आजाद सिंह ने बताया कि गांव की 40 गलियों में से करीब 20 गली कच्ची हैं। फिरनी खत्म हो चुकी है। स्टेडियम व पार्क की जरूरत है। गांव के दोनों सरकारी स्कूलों की बिल्डिंग गांव ने खुद बनवाई है। सरपंच ने गांव की समस्याओं के हल के लिए शासन-प्रशासन से गुजारिश की है।