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नाज है इन बेटे-बेटियों पर
ब्यूरो अमर उजाला
Updated Wed, 11 May 2016 12:47 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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देश के मानचित्र पर अक्सर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाले भिवानी के नौजवानों ने भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा में भी कामयाबी का शानदार अध्याय लिखा। एक जिले छह युवाओं का भावी आईएएस अफसर के लिए चयन बड़ी उपलब्धि है। प्रदेश में संभवतया भिवानी इकलौता जिला होगा, जहां छह ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में इतना शानदार प्रदर्शन किया। इनमें दो बेटियां भी हैं। इनकी उपलब्धि को इसलिए भी चार चांद लग जाते हैं कि विपरित परिस्थतियों के बावजूद मुकाम हासिल किया। गागड़वास गांव की अनुपम किसान की बेटी हैं तो बहल के शीशराम वर्मा चायवाले के बेटे हैं। 12 वीं रैंकिंग पाने वाले आशीष ने न कभी ट्यूशन पढ़ी और न कोचिंग ली। बादल गांव के नितिन सांगवान, चरखी दादरी के प्रमोद सांगवान व पालड़ी गांव की अंशू यादव की उपलब्धि और मेहनत प्रेरणास्पद है।
हमेशा बेस्ट की जिद ने आशीष को बुलंदी पर पहुंचाया
सेक्टर 23 निवासी शिक्षक दंपति के बेटे आशीष सांगवान ने भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा में 12वां रैंक हासिल कर अपनी योग्यता के झंडे गाड़े। दरअसल, आशीष को आईएएस अफसर से कम मंजूर नहीं था। इस जिद के लिए उसे बेशक तीन कोशिश करनी पड़ी, लेकिन इस बार सफलता शानदार इतनी रही कि पूरे हरियाणा में संभवतया सबसे श्रेष्ठ प्रदर्शन किया।
हमेशा बेस्ट की जिद ने आशीष को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाया। हलवासिया विद्या विहार से बारहवीं करने वाले आशीष ने आईआईटी में 17 वां रैंक हासिल किया। बारहवीं में 93 प्रतिशत अंक लिये। आशीष के पिता रिटायर्ड प्रिंसिपल केपी सांगवान बताते हैं कि उसने न तो कभी ट्यूशन पढ़ी है और न ही कभी कोचिंग ली है। प्रशासनिक सेवा की परीक्षा के लिए भी आशीष ने कोचिंग नहीं ली। इंटरव्यू से पहले मॉक ड्रिल बेशक ली हो। उसका फोकस केवल सेल्फ स्टडी पर ही रहा है। 12-12, 14-14 घंटे पढ़ाई की। सेल्फ स्टडी ही उसका मूलमंत्र रहा है।
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रिटायर्ड प्रिंसिपल ने बताया कि अमेरिका की जार्जिया टेक यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर ऑफ साइंस की पढ़ाई पूरी करने के बाद आईएएस बनने के सपने को पूरा करने का प्रयास किया। पिछली परीक्षा में वे थोड़ा चूक गए थे, लेकिन आईआरटीएस में 607 वीं रैंक हासिल की और आईआरटीएस ज्वाइन की।
परिवार के बारे में
आषीश का परिवार मूल रूप से जिले के चंदेनी गांव का रहने वाला है। आषीश के पिता केपी सांगवान अंग्रेजी विषय के लेक्चरर और रिटायर्ड प्रिंसिपल हैं। उनकी माता सतकौर रिटायर्ड स्कूल लेक्चरर हैं। आशीष के बड़े भाई अमित होंडा कंपनी मानेसर में इंजीनियर हैं। बहन डा. प्रियंका एमडी हैं और गुडग़ांव के सरकारी अस्पताल में कार्यरत हैं।
किसान की बेटी बनी आईएएस अफसर, पाया 221 वां रैंक
गांव गागड़वास में एक साधारण से किसान की 24 वर्षीय बेटी अनुपम श्योराण ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में 221वां रैंक हासिल किया।
अनुपम की इस सफलता पर गांव गागड़वास में खुशी का माहौल है। अनुपम ने बताया कि शुरू से ही उसका सपना था कि वह एक दिन आईएएस अधिकारी बने तथा अपने माता- पिता तथा परिवार के सपनों कों पूरा करे। सपने को साकार करने के लिए अनुपम ने दिन रात मेहनत की। उसने इंटरनेट के माध्यम से आईएएस की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षाओं की तैयारी की। वर्ष 2012 में कंप्यूटर विज्ञान में बी.टैक की डिग्री प्राप्त करने के बाद दिल्ली जाकर आईएएस की कोचिंग ली।
अनुपम के भाई जोगेंद्र ने बताया कि उसकी बहन की इस कामयाबी पर पूरे गांव एवं परिवार में जश्न का माहौल है तथा उन्हे जगह-जगह से बधाइयां मिल रही है। जोगेंद्र ने बताया कि चार भाई-बहनों में अनुपम सबसे बड़ी है। एक बहन अंजू सरकारी सेवा में है और उसके बाद मेरा छोटा भार्ई दीपक है जो अभी 12वीं में पढ़ रहा है।
इलाके की पहली महिला प्रशासनिक अधिकारी
माता सरोज देवी पांचवीं तक पढ़ी। पिता (स्वर्गीय सतपाल सिंह) का साया बचपन से ही उठ गया। इन दो बातों से समझा जा सकता है कि अनुपम व उसके परिवार कितनी मेहनत की होगी।
अनुपम ने दसवीं कक्षा सोहांसड़ा गांव के एमएलएम वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय से उत्तीर्ण की और बाद में यूनिवर्सिटी टाप करते हुए आरपीएस कालेज महेन्द्रगढ से कंप्यूटर साइंस में बीटेक की डिग्री हासिल की। अनुपम की छोटी बहन अंजु होटल प्रबंधन में मास्टर डिग्री हासिल कर रही हैं तो भाई जोगेन्द्र सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे हैं। सबसे छोटे भाई दीपक ने अभी 12वीं कक्षा पास की है।
हौसले की बदौलत चायवाले के दिव्यांग बेटा बना आईएएस
बहल (भिवानी)। कभी बहल बस स्टैंड पर चाय की दुकान चलाने वाले नारायण राम ने सोचा भी नहीं होगा कि चाय बनाने में मदद करने वाला उनका लड़का शीशराम वर्मा एक दिन प्रशासनिक सेवा में चयनित होकर आईएएस बन जाएगा। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद शीशराम का जज्बा ही था कि उन्होंने अपने लक्ष्य को छूटने नहीं दिया और माता-पिता के सपनों को पूरा किया। सबसे बड़ी बात यह रही कि शीशराम ने केवल प्लस टू तक की पढ़ाई रेगुलर की है तथा इस मुकाम तक पहुंचने के लिए आगे की पूरी पढ़ाई पत्राचार से की है।
मंगलवार को घोषित नतीजों में 1078 रैंक हासिल कर आईएएस बने शीशराम की कामयाबी उन युवाओं के लिए प्रेरणादायक है जो परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देते है। पारिवारिक परिस्थिति के चलते शीशराम बहल के सरकारी स्कूल से प्लस टू तक पढ़े। रेगुलर पढाई छुटी तो दर्द हुआ पर लक्ष्य विचलित नहीं हुआ। पिता के साथ चाय की दुकान में हाथ बंटाने लगे तो मां भगवती की डांट से फिर पढ़ाई की राह पर चले और ओढ़ा से जेबीटी की। इसके बाद बीए, एमए (हिन्दी, राजनीतिक शास्त्र), बीएड, एमफिल, नेट सब पत्राचार से पास करते गए। वर्ष 1997 में जेबीटी की नौकरी मिली तथा वर्ष 2010 में पदोन्नति के बाद राजकीय मिडिल विद्यालय सुरपुरा कलां में एसएस अध्यापक बने। पिछले साल एचसीएस के मैन एक्जाम तक पहुंचे, लेकिन शीशराम का एकमात्र लक्ष्य था आईएएस बनना और इसके लिए अवैतनिक होकर विभाग से एक साल की छुट्टी लेकर दिल्ली मुखर्जी नगर में लाइब्रेरी ज्वाइन की। शीशराम के इस प्रयास में उनकी पत्नी निर्मला देवी का भरपूर साथ मिला तथा गृहस्थी की बागडोर खुद संभाले रही। बकौल शीशराम, उनकी कामयाबी में मां भगवती देवी का आशीर्वाद ही रहा, जिन्होंने अनपढ होते हुए मुझे पढ़ने के लिए निरंतर प्रेरित किया। इसके अलावा हिसार से सुरेश कुमार, अध्यापक बाबूलाल लांबा, सुनील पातवान का विशेष सहयोग रहा। पिता की कामयाबी पर पुत्र गौरव तथा पुत्री जया भी बाग-बाग है।
महत्व समझकर जुनूनी बनेंगे, तो युवा बनेंगे आईएएस
शीशराम का कहना है कि युवाओं को पहले इसके महत्व को समझना होगा। जीवन का लक्ष्य बनाना होगा और जूझना होगा। अपनी कामयाबी की चर्चा में उन्होंने बताया कि रात को पौने नौ बजे रेडियो समाचार सुनना, दो से तीन अखबार पढ़ना, मासिक और वार्षिक पत्रिका पढ़ने के अलावा जनरल स्टडी के लिए एनसीआरटी पुस्तकों का अध्ययन करना उनकी सफलता का राज रहा है। वे जब छुट्टी पर थे तब 15 घंटे और उसके बाद अध्यापन ड्यूटी पूरी होने के बाद दस घंटे नियमित पढाई करते थे।
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हमेशा बेस्ट की जिद ने आशीष को बुलंदी पर पहुंचाया
सेक्टर 23 निवासी शिक्षक दंपति के बेटे आशीष सांगवान ने भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा में 12वां रैंक हासिल कर अपनी योग्यता के झंडे गाड़े। दरअसल, आशीष को आईएएस अफसर से कम मंजूर नहीं था। इस जिद के लिए उसे बेशक तीन कोशिश करनी पड़ी, लेकिन इस बार सफलता शानदार इतनी रही कि पूरे हरियाणा में संभवतया सबसे श्रेष्ठ प्रदर्शन किया।
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हमेशा बेस्ट की जिद ने आशीष को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाया। हलवासिया विद्या विहार से बारहवीं करने वाले आशीष ने आईआईटी में 17 वां रैंक हासिल किया। बारहवीं में 93 प्रतिशत अंक लिये। आशीष के पिता रिटायर्ड प्रिंसिपल केपी सांगवान बताते हैं कि उसने न तो कभी ट्यूशन पढ़ी है और न ही कभी कोचिंग ली है। प्रशासनिक सेवा की परीक्षा के लिए भी आशीष ने कोचिंग नहीं ली। इंटरव्यू से पहले मॉक ड्रिल बेशक ली हो। उसका फोकस केवल सेल्फ स्टडी पर ही रहा है। 12-12, 14-14 घंटे पढ़ाई की। सेल्फ स्टडी ही उसका मूलमंत्र रहा है।
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रिटायर्ड प्रिंसिपल ने बताया कि अमेरिका की जार्जिया टेक यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर ऑफ साइंस की पढ़ाई पूरी करने के बाद आईएएस बनने के सपने को पूरा करने का प्रयास किया। पिछली परीक्षा में वे थोड़ा चूक गए थे, लेकिन आईआरटीएस में 607 वीं रैंक हासिल की और आईआरटीएस ज्वाइन की।
परिवार के बारे में
आषीश का परिवार मूल रूप से जिले के चंदेनी गांव का रहने वाला है। आषीश के पिता केपी सांगवान अंग्रेजी विषय के लेक्चरर और रिटायर्ड प्रिंसिपल हैं। उनकी माता सतकौर रिटायर्ड स्कूल लेक्चरर हैं। आशीष के बड़े भाई अमित होंडा कंपनी मानेसर में इंजीनियर हैं। बहन डा. प्रियंका एमडी हैं और गुडग़ांव के सरकारी अस्पताल में कार्यरत हैं।
किसान की बेटी बनी आईएएस अफसर, पाया 221 वां रैंक
गांव गागड़वास में एक साधारण से किसान की 24 वर्षीय बेटी अनुपम श्योराण ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में 221वां रैंक हासिल किया।
अनुपम की इस सफलता पर गांव गागड़वास में खुशी का माहौल है। अनुपम ने बताया कि शुरू से ही उसका सपना था कि वह एक दिन आईएएस अधिकारी बने तथा अपने माता- पिता तथा परिवार के सपनों कों पूरा करे। सपने को साकार करने के लिए अनुपम ने दिन रात मेहनत की। उसने इंटरनेट के माध्यम से आईएएस की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षाओं की तैयारी की। वर्ष 2012 में कंप्यूटर विज्ञान में बी.टैक की डिग्री प्राप्त करने के बाद दिल्ली जाकर आईएएस की कोचिंग ली।
अनुपम के भाई जोगेंद्र ने बताया कि उसकी बहन की इस कामयाबी पर पूरे गांव एवं परिवार में जश्न का माहौल है तथा उन्हे जगह-जगह से बधाइयां मिल रही है। जोगेंद्र ने बताया कि चार भाई-बहनों में अनुपम सबसे बड़ी है। एक बहन अंजू सरकारी सेवा में है और उसके बाद मेरा छोटा भार्ई दीपक है जो अभी 12वीं में पढ़ रहा है।
इलाके की पहली महिला प्रशासनिक अधिकारी
माता सरोज देवी पांचवीं तक पढ़ी। पिता (स्वर्गीय सतपाल सिंह) का साया बचपन से ही उठ गया। इन दो बातों से समझा जा सकता है कि अनुपम व उसके परिवार कितनी मेहनत की होगी।
अनुपम ने दसवीं कक्षा सोहांसड़ा गांव के एमएलएम वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय से उत्तीर्ण की और बाद में यूनिवर्सिटी टाप करते हुए आरपीएस कालेज महेन्द्रगढ से कंप्यूटर साइंस में बीटेक की डिग्री हासिल की। अनुपम की छोटी बहन अंजु होटल प्रबंधन में मास्टर डिग्री हासिल कर रही हैं तो भाई जोगेन्द्र सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे हैं। सबसे छोटे भाई दीपक ने अभी 12वीं कक्षा पास की है।
हौसले की बदौलत चायवाले के दिव्यांग बेटा बना आईएएस
बहल (भिवानी)। कभी बहल बस स्टैंड पर चाय की दुकान चलाने वाले नारायण राम ने सोचा भी नहीं होगा कि चाय बनाने में मदद करने वाला उनका लड़का शीशराम वर्मा एक दिन प्रशासनिक सेवा में चयनित होकर आईएएस बन जाएगा। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद शीशराम का जज्बा ही था कि उन्होंने अपने लक्ष्य को छूटने नहीं दिया और माता-पिता के सपनों को पूरा किया। सबसे बड़ी बात यह रही कि शीशराम ने केवल प्लस टू तक की पढ़ाई रेगुलर की है तथा इस मुकाम तक पहुंचने के लिए आगे की पूरी पढ़ाई पत्राचार से की है।
मंगलवार को घोषित नतीजों में 1078 रैंक हासिल कर आईएएस बने शीशराम की कामयाबी उन युवाओं के लिए प्रेरणादायक है जो परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देते है। पारिवारिक परिस्थिति के चलते शीशराम बहल के सरकारी स्कूल से प्लस टू तक पढ़े। रेगुलर पढाई छुटी तो दर्द हुआ पर लक्ष्य विचलित नहीं हुआ। पिता के साथ चाय की दुकान में हाथ बंटाने लगे तो मां भगवती की डांट से फिर पढ़ाई की राह पर चले और ओढ़ा से जेबीटी की। इसके बाद बीए, एमए (हिन्दी, राजनीतिक शास्त्र), बीएड, एमफिल, नेट सब पत्राचार से पास करते गए। वर्ष 1997 में जेबीटी की नौकरी मिली तथा वर्ष 2010 में पदोन्नति के बाद राजकीय मिडिल विद्यालय सुरपुरा कलां में एसएस अध्यापक बने। पिछले साल एचसीएस के मैन एक्जाम तक पहुंचे, लेकिन शीशराम का एकमात्र लक्ष्य था आईएएस बनना और इसके लिए अवैतनिक होकर विभाग से एक साल की छुट्टी लेकर दिल्ली मुखर्जी नगर में लाइब्रेरी ज्वाइन की। शीशराम के इस प्रयास में उनकी पत्नी निर्मला देवी का भरपूर साथ मिला तथा गृहस्थी की बागडोर खुद संभाले रही। बकौल शीशराम, उनकी कामयाबी में मां भगवती देवी का आशीर्वाद ही रहा, जिन्होंने अनपढ होते हुए मुझे पढ़ने के लिए निरंतर प्रेरित किया। इसके अलावा हिसार से सुरेश कुमार, अध्यापक बाबूलाल लांबा, सुनील पातवान का विशेष सहयोग रहा। पिता की कामयाबी पर पुत्र गौरव तथा पुत्री जया भी बाग-बाग है।
महत्व समझकर जुनूनी बनेंगे, तो युवा बनेंगे आईएएस
शीशराम का कहना है कि युवाओं को पहले इसके महत्व को समझना होगा। जीवन का लक्ष्य बनाना होगा और जूझना होगा। अपनी कामयाबी की चर्चा में उन्होंने बताया कि रात को पौने नौ बजे रेडियो समाचार सुनना, दो से तीन अखबार पढ़ना, मासिक और वार्षिक पत्रिका पढ़ने के अलावा जनरल स्टडी के लिए एनसीआरटी पुस्तकों का अध्ययन करना उनकी सफलता का राज रहा है। वे जब छुट्टी पर थे तब 15 घंटे और उसके बाद अध्यापन ड्यूटी पूरी होने के बाद दस घंटे नियमित पढाई करते थे।