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कड़वी दवा से नहीं, दुलार से कर रहे ऑटिज्म दूर
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डॉ. मनजीत कुमार।
- फोटो : Bhiwani
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नवनीत शर्मा
भिवानी। ऑटिज्म (स्वालीनता) को मेडिकल भाषा में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर कहते हैं। यह एक विकास संबंधी गड़बड़ी है, जिससे पीड़ित व्यक्ति को बातचीत करने में, पढ़ने-लिखने में और समाज में मेलजोल बनाने में परेशानियां आती हैं। इसलिए ऑटिज्म से पीड़ित का इलाज कड़वी दवा के बजाय दुलार से हो सकता है।
ऑटिज्म एक ऐसी स्थिति है, जिसमें मरीज अपनी बात किसी को कह नहीं पाते और न ही दूसरे की बात को समझ पाते है। ये मरीज किसी ने भी संवाद स्थापित नहीं करवा पाते, जिसकी वजह से उन्हें अलग श्रेणी में शामिल किया जाता है। आज विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस है।
एक साल में ऑटिज्म से ग्रस्त करीब 30 बच्चे सामने आ चुके हैं, जिनमें हर माह एक से दो नए मरीज नागरिक अस्पताल की ओपीडी में मिल रहे हैं। जिले के ग्रामीण से अधिक शहरी क्षेत्र में ऑटिज्म के अधिक मरीज हैं। वहीं अधिकतर मरीज सामाजिक न हो पाने की समस्या से जूझ रहे हैं।
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80 फीसदी मरीज हो रहे स्वस्थ, माता-पिता को भी देते हैं विशेष प्रशिक्षण
ऑटिज्म से ग्रस्त मरीज का डेढ़ से दो साल तक उपचार चलता है, जिसके बाद करीब 80 फीसदी बच्चे रिकवर हो जाते हैं। इन मरीजों को दिव्यांग (मंदबुद्धि) की श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऑटिज्म और दिव्यांग में काफी अंतर है, जो ऑटिज्म से उबरते नहीं हैं। उन्हें दिव्यांग की श्रेणी में शामिल किया जता है। जो बच्चे जन्म के समय रोते नहीं हैं, वे ऐसी बीमारी से ग्रस्त हो सकते हैं, जिनकी परिजनों व चिकित्सक द्वारा विशेष निगरानी रखी जाती है। करीब तीन साल के बच्चे में ऑटिज्म की पहचान के बाद उसका उपचार शुरू किया जाता है। इसके लिए मनोचिकित्सक पहले बच्चे की जांच करता है, जिसके बाद ऑटिज्म वेरिफिकेशन करने बाद रोग की पहचान की जाती है। इसके बाद बच्चे को थैरेपी और काउंसिलिंग के माध्यम से मोडिफिकेशन की जाती है। ज्यादा गंभीर बच्चे को ही दवाई की दी जाती है। चिकित्सक अक्सर बच्चे के माता-पिता को इसके लिए ट्रेनिंग देते हैं, फिर परिवार की सहायता से बच्चे का घर पर भी उपचार जारी रहता है। करीब 80 फीसदी बच्चे डेढ़ से दो साल के उपचार के बाद स्वस्थ हो होते है और जो स्वस्थ नहीं हो पाते उन्हें दिव्यांग (मंदबुद्धि) की श्रेणी में शामिल किया जाता है।
ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के लक्षण
दूसरे बच्चों से घुलने-मिलने से बचना, अकेले रहना, खेलकूद में हिस्सा न लेना या रुचि न दिखाना, किसी एक जगह पर घंटों अकेले या चुपचाप बैठना, किसी एक ही वस्तु पर ध्यान देना या कोई एक ही काम को बार-बार करना, दूसरों से संपर्क न करना, बातचीत के दौरान दूसरे व्यक्ति के हर शब्द को दोहराना, सनकी व्यवहार करना, किसी भी एक काम या सामान के साथ पूरी तरह व्यस्त रहना, खुद को चोट लगाना या नुकसान पहुंचाने के प्रयास करना, गुस्सैल, बदहवास, बेचैन, अशांत और तोड़फोड़ मचाने जैसा व्यवहार करना, किसी काम को लगातार करते रहना जैसे: झूमना या ताली बजाना, एक ही वाक्य लगातार दोहराते रहना, दूसरे व्यक्तियों की भावनाओं को न समझ पाना आदि को ऑटिज्म की श्रेणी में शामिल किया है।
ऑटिज्म के मुख्य कारण
अब तक ऑटिज्म के सही कारणों का पता नहीं चल सका है। हालांकि, विभिन्न अध्ययनों में कहा गया है कि यह कुछ आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारणों से होता है। जोकि गर्भ में पल रहे बच्चे के दिमाग के विकास को बाधित करते हैं। जैसे - दिमाग के विकास को नियंत्रित करने वाले जीन में कोई गड़बड़ी होना, सेल्स और दिमाग के बीच संपर्क बनाने वाले जीन में गड़बड़ी होना, गर्भावस्था में वायरल इन्फेक्शन या हवा में फैले प्रदूषण कणों के संपर्क में आना भी ऑटिज्म का कारण बन सकता है।
ऑटिज्म से बचाव
फिलहाल ऑटिल्ज्म की पहचान या निदान के लिए कोई विशिष्ट टेस्ट नहीं है। आमतौर पर, अभिभावकों को बच्चे के व्यवहार और उनके विकास पर ध्यान देने के लिए कहा जाता है। ताकि, डिसऑर्डर का पता लगाने में मदद हो। विशेषज्ञों द्वारा मरीज की देखने, सुनने, बोलने और मोटर कोऑर्डिनेशन की क्षमता का आंकलन किया जाता है।
विशेष ट्रेनिंग दी जाती है
ऑटिज्म से ग्रस्त बच्चे सोशल नहीं हो पाते है, जिन्हें दिव्यांग नहीं कहा जा कता है। ऐसे बच्चों की पहचान कर उनका उपचार किया जाता है। अब तक ऑटिज्म के मुख्य कारण स्पष्ट नहीं हो पाए हैं, मगर गर्भावस्था में ऑटिज्म होना बताया जा रहा है। ऑटिज्म से ग्रस्त बच्चे का करीब डेढ़ से दो साल तक उपचार चलता है, जिन्हें थैरेपी और काउंसिलिंग के माध्यम से ठीक किया जाता है। अधिक गंभीर बच्चे को दवा भी दी जाती है। ऐसे बच्चों के माता-पिता को भी विशेष ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि बच्चा परिवार के साथ मिलकर जल्द स्वस्थ हो सकें।
- डॉ. मंजीत कुमार, क्लिनिकल सायकोलॉजिस्ट, नागरिक अस्पताल।
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भिवानी। ऑटिज्म (स्वालीनता) को मेडिकल भाषा में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर कहते हैं। यह एक विकास संबंधी गड़बड़ी है, जिससे पीड़ित व्यक्ति को बातचीत करने में, पढ़ने-लिखने में और समाज में मेलजोल बनाने में परेशानियां आती हैं। इसलिए ऑटिज्म से पीड़ित का इलाज कड़वी दवा के बजाय दुलार से हो सकता है।
ऑटिज्म एक ऐसी स्थिति है, जिसमें मरीज अपनी बात किसी को कह नहीं पाते और न ही दूसरे की बात को समझ पाते है। ये मरीज किसी ने भी संवाद स्थापित नहीं करवा पाते, जिसकी वजह से उन्हें अलग श्रेणी में शामिल किया जाता है। आज विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस है।
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एक साल में ऑटिज्म से ग्रस्त करीब 30 बच्चे सामने आ चुके हैं, जिनमें हर माह एक से दो नए मरीज नागरिक अस्पताल की ओपीडी में मिल रहे हैं। जिले के ग्रामीण से अधिक शहरी क्षेत्र में ऑटिज्म के अधिक मरीज हैं। वहीं अधिकतर मरीज सामाजिक न हो पाने की समस्या से जूझ रहे हैं।
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80 फीसदी मरीज हो रहे स्वस्थ, माता-पिता को भी देते हैं विशेष प्रशिक्षण
ऑटिज्म से ग्रस्त मरीज का डेढ़ से दो साल तक उपचार चलता है, जिसके बाद करीब 80 फीसदी बच्चे रिकवर हो जाते हैं। इन मरीजों को दिव्यांग (मंदबुद्धि) की श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऑटिज्म और दिव्यांग में काफी अंतर है, जो ऑटिज्म से उबरते नहीं हैं। उन्हें दिव्यांग की श्रेणी में शामिल किया जता है। जो बच्चे जन्म के समय रोते नहीं हैं, वे ऐसी बीमारी से ग्रस्त हो सकते हैं, जिनकी परिजनों व चिकित्सक द्वारा विशेष निगरानी रखी जाती है। करीब तीन साल के बच्चे में ऑटिज्म की पहचान के बाद उसका उपचार शुरू किया जाता है। इसके लिए मनोचिकित्सक पहले बच्चे की जांच करता है, जिसके बाद ऑटिज्म वेरिफिकेशन करने बाद रोग की पहचान की जाती है। इसके बाद बच्चे को थैरेपी और काउंसिलिंग के माध्यम से मोडिफिकेशन की जाती है। ज्यादा गंभीर बच्चे को ही दवाई की दी जाती है। चिकित्सक अक्सर बच्चे के माता-पिता को इसके लिए ट्रेनिंग देते हैं, फिर परिवार की सहायता से बच्चे का घर पर भी उपचार जारी रहता है। करीब 80 फीसदी बच्चे डेढ़ से दो साल के उपचार के बाद स्वस्थ हो होते है और जो स्वस्थ नहीं हो पाते उन्हें दिव्यांग (मंदबुद्धि) की श्रेणी में शामिल किया जाता है।
ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के लक्षण
दूसरे बच्चों से घुलने-मिलने से बचना, अकेले रहना, खेलकूद में हिस्सा न लेना या रुचि न दिखाना, किसी एक जगह पर घंटों अकेले या चुपचाप बैठना, किसी एक ही वस्तु पर ध्यान देना या कोई एक ही काम को बार-बार करना, दूसरों से संपर्क न करना, बातचीत के दौरान दूसरे व्यक्ति के हर शब्द को दोहराना, सनकी व्यवहार करना, किसी भी एक काम या सामान के साथ पूरी तरह व्यस्त रहना, खुद को चोट लगाना या नुकसान पहुंचाने के प्रयास करना, गुस्सैल, बदहवास, बेचैन, अशांत और तोड़फोड़ मचाने जैसा व्यवहार करना, किसी काम को लगातार करते रहना जैसे: झूमना या ताली बजाना, एक ही वाक्य लगातार दोहराते रहना, दूसरे व्यक्तियों की भावनाओं को न समझ पाना आदि को ऑटिज्म की श्रेणी में शामिल किया है।
ऑटिज्म के मुख्य कारण
अब तक ऑटिज्म के सही कारणों का पता नहीं चल सका है। हालांकि, विभिन्न अध्ययनों में कहा गया है कि यह कुछ आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारणों से होता है। जोकि गर्भ में पल रहे बच्चे के दिमाग के विकास को बाधित करते हैं। जैसे - दिमाग के विकास को नियंत्रित करने वाले जीन में कोई गड़बड़ी होना, सेल्स और दिमाग के बीच संपर्क बनाने वाले जीन में गड़बड़ी होना, गर्भावस्था में वायरल इन्फेक्शन या हवा में फैले प्रदूषण कणों के संपर्क में आना भी ऑटिज्म का कारण बन सकता है।
ऑटिज्म से बचाव
फिलहाल ऑटिल्ज्म की पहचान या निदान के लिए कोई विशिष्ट टेस्ट नहीं है। आमतौर पर, अभिभावकों को बच्चे के व्यवहार और उनके विकास पर ध्यान देने के लिए कहा जाता है। ताकि, डिसऑर्डर का पता लगाने में मदद हो। विशेषज्ञों द्वारा मरीज की देखने, सुनने, बोलने और मोटर कोऑर्डिनेशन की क्षमता का आंकलन किया जाता है।
विशेष ट्रेनिंग दी जाती है
ऑटिज्म से ग्रस्त बच्चे सोशल नहीं हो पाते है, जिन्हें दिव्यांग नहीं कहा जा कता है। ऐसे बच्चों की पहचान कर उनका उपचार किया जाता है। अब तक ऑटिज्म के मुख्य कारण स्पष्ट नहीं हो पाए हैं, मगर गर्भावस्था में ऑटिज्म होना बताया जा रहा है। ऑटिज्म से ग्रस्त बच्चे का करीब डेढ़ से दो साल तक उपचार चलता है, जिन्हें थैरेपी और काउंसिलिंग के माध्यम से ठीक किया जाता है। अधिक गंभीर बच्चे को दवा भी दी जाती है। ऐसे बच्चों के माता-पिता को भी विशेष ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि बच्चा परिवार के साथ मिलकर जल्द स्वस्थ हो सकें।
- डॉ. मंजीत कुमार, क्लिनिकल सायकोलॉजिस्ट, नागरिक अस्पताल।