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वैदिक ग्रंथों में भी अरणी मंथन का उल्लेख : महंत डॉ. अशोक गिरि महाराज
Sat, 12 Oct 2024 10:43 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
संवाद न्यूज एजेंसी, भिवानी
Updated Sat, 12 Oct 2024 10:43 PM IST
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सिद्धपीठ बाबा जहरगिरि आश्रम में आयोजित यज्ञ में आहुति डालते महंत डॉ. अशोक गिरि महाराज
भिवानी। नवरात्र के पावन पर्व पर हालुवास गेट स्थित सिद्धपीठ बाबा जहरगिरि आश्रम में विशेष धार्मिक आयोजन संपन्न हुआ। आश्रम के पीठाधीश्वर अंतरराष्ट्रीय महंत डॉ. अशोक गिरि महाराज के सानिध्य में शारदीय नवरात्र के तहत अखंड चंडी यज्ञ का आयोजन किया गया। जो अरणी मंथन विधि और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संपन्न हुआ।
महंत ने बताया कि अरणी मंथन एक अत्यंत प्राचीन और विशेष विधि है जिसका उल्लेख वैदिक ग्रंथों में किया गया है। यह विधि यज्ञ के लिए अग्नि उत्पन्न करने के एक पवित्र और विशिष्ट तरीके के रूप में जानी जाती है। इसमें दो लकड़ी के टुकड़ों का उपयोग किया जाता है, एक आधार लकड़ी (अरणी) और दूसरी मंथन की लकड़ी। घर्षण के माध्यम से अग्नि उत्पन्न की जाती है, जो पूरी तरह प्राकृतिक और शुद्ध होती है।
अरणी मंथन द्वारा अग्नि प्रज्वलित करना धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत शुभ माना जाता है और इसका गहरा आध्यात्मिक महत्व है। पूर्णाहुति यज्ञ का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है, जो संपूर्ण यज्ञ की समृद्धि और सफलता का प्रतीक है। यह वह समय होता है जब यज्ञकर्ता, संत और श्रद्धालु मिलकर यज्ञ की अंतिम आहुति देते हैं। इसे देवी-देवताओं को समर्पित किया जाता है और यह आहुति समाज के कल्याण, शांति और समृद्धि के लिए समर्पित होती है। संत और महात्मा पूर्णाहुति के दौरान विशेष रूप से आशीर्वाद देते हैं ताकि यज्ञ का सकारात्मक प्रभाव सभी पर पड़े। इस धार्मिक आयोजन में साधु संत मौजूद रहे।
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महंत ने बताया कि अरणी मंथन एक अत्यंत प्राचीन और विशेष विधि है जिसका उल्लेख वैदिक ग्रंथों में किया गया है। यह विधि यज्ञ के लिए अग्नि उत्पन्न करने के एक पवित्र और विशिष्ट तरीके के रूप में जानी जाती है। इसमें दो लकड़ी के टुकड़ों का उपयोग किया जाता है, एक आधार लकड़ी (अरणी) और दूसरी मंथन की लकड़ी। घर्षण के माध्यम से अग्नि उत्पन्न की जाती है, जो पूरी तरह प्राकृतिक और शुद्ध होती है।
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अरणी मंथन द्वारा अग्नि प्रज्वलित करना धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत शुभ माना जाता है और इसका गहरा आध्यात्मिक महत्व है। पूर्णाहुति यज्ञ का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है, जो संपूर्ण यज्ञ की समृद्धि और सफलता का प्रतीक है। यह वह समय होता है जब यज्ञकर्ता, संत और श्रद्धालु मिलकर यज्ञ की अंतिम आहुति देते हैं। इसे देवी-देवताओं को समर्पित किया जाता है और यह आहुति समाज के कल्याण, शांति और समृद्धि के लिए समर्पित होती है। संत और महात्मा पूर्णाहुति के दौरान विशेष रूप से आशीर्वाद देते हैं ताकि यज्ञ का सकारात्मक प्रभाव सभी पर पड़े। इस धार्मिक आयोजन में साधु संत मौजूद रहे।
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