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संवाद: महिला दिवस : महिलाएं सशक्त हुई, पूरी तरह नहीं
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अमर उजाला ब्यूरो
भिवानी। समय के साथ महिलाओं के प्रति लोगों की सोच में बदलाव आया है। महिलाएं पहले की तुलना में सशक्त हुई हैं मगर पूरी तरह नहीं। अब भी महिलाएं खुद सभी फैसले नहीं ले पा रहीं। उनके अधिकतर फैसले पति, भाई या पिता ही करते हैं। महिलाओं को अनेक अधिकार हमारे संविधान में दिए गए हैं। लेकिन उनका सही प्रयोग नहीं हो रहा है। ये विचार अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में महिला शिक्षिकाओं, गृहणियों ने कही। अधिकतर ने माना कि अब भी बेटों की चाह होती है और महिलाओं के अधिकारों का हनन हुआ है। बस शिक्षा और उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करके ही महिलाओं का सशक्तीकरण हो सकता है।
महिलाएं सशक्त हुई हैं मगर पूरी तरह महिला सशक्तीकरण के लिए महिलाओं को खुद आगे आना होगा। अपनी शक्ति की पहचान कर उसका प्रयोग करना होगा। किसी अन्य के भरोसे सशक्तीकरण नहीं हो सकता है। समान शिक्षा, समान अधिकार का अधिकार महिलाओं को मिला है। महिलाओं का शिक्षा का स्तर बढ़ा है। यह भी एक विडंबना है कि दहेज का सिस्टम भी बढ़ा है।
सुरेश कुमार, प्रिंसिपल
एमएनपी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय
नहीं हुआ पुरुषों की मानसिकता में ज्यादा सुधार
पुरुषों की मानसिकता में ज्यादा सुधार नहीं हुआ है। वर्तमान में महिलाएं खेल, शिक्षा, व्यापार, नौकरी वे सभी कार्य कर रही हैं, जो एक पुरुष करता है। जिससे उनके अधिकार छिनने का डर है। आज महिलाएं ड्राइविंग करती हैं तो पुरुषों की मानसिकता रहती है कि हादसा करेगी। अगर किसी की भी गलती से महिला चालक से हादसा हो भी जाए तो कहा जाता है कि महिला चला रही थी।
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डॉ. कविता, असिस्टेंट प्रोफेसर
आज बेटियों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करने के साथ-साथ उनकी जिम्मेदारियों का भी आभास कराना जरूरी है ताकि वे सशक्त महिला बन सके। अगर हम सिर्फ अधिकारों के प्रति ही जागरूक करेंगे तो अधिकारों का मिस यूज भी बढ़ेगा। आज महिला सशक्तीकरण के लिए बेटियों को सुरक्षा, अच्छी शिक्षा देने की जरूरत है।
डॉ. रीना पंघाल
बेटा-बेटी का अंतर खत्म करना होगा
आज बच्चों में बेटा-बेटी का अंतर खत्म करने की जरूरत है। उसके दो बेटियां हैं मगर उसने या उसके पति ने कभी बेटियों में फर्क नहीं किया। मगर आज भी समाज में महिलाओं पर बेटा पैदा करने का दबाव बनाया जाता है। बेटी पैदा होने पर उन्हें कोसा जाता है। इस संकीर्ण मानसिकता को बदलने की जरूरत है।
डॉ. नीति
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भिवानी। समय के साथ महिलाओं के प्रति लोगों की सोच में बदलाव आया है। महिलाएं पहले की तुलना में सशक्त हुई हैं मगर पूरी तरह नहीं। अब भी महिलाएं खुद सभी फैसले नहीं ले पा रहीं। उनके अधिकतर फैसले पति, भाई या पिता ही करते हैं। महिलाओं को अनेक अधिकार हमारे संविधान में दिए गए हैं। लेकिन उनका सही प्रयोग नहीं हो रहा है। ये विचार अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम में महिला शिक्षिकाओं, गृहणियों ने कही। अधिकतर ने माना कि अब भी बेटों की चाह होती है और महिलाओं के अधिकारों का हनन हुआ है। बस शिक्षा और उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करके ही महिलाओं का सशक्तीकरण हो सकता है।
महिलाएं सशक्त हुई हैं मगर पूरी तरह महिला सशक्तीकरण के लिए महिलाओं को खुद आगे आना होगा। अपनी शक्ति की पहचान कर उसका प्रयोग करना होगा। किसी अन्य के भरोसे सशक्तीकरण नहीं हो सकता है। समान शिक्षा, समान अधिकार का अधिकार महिलाओं को मिला है। महिलाओं का शिक्षा का स्तर बढ़ा है। यह भी एक विडंबना है कि दहेज का सिस्टम भी बढ़ा है।
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सुरेश कुमार, प्रिंसिपल
एमएनपी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय
नहीं हुआ पुरुषों की मानसिकता में ज्यादा सुधार
पुरुषों की मानसिकता में ज्यादा सुधार नहीं हुआ है। वर्तमान में महिलाएं खेल, शिक्षा, व्यापार, नौकरी वे सभी कार्य कर रही हैं, जो एक पुरुष करता है। जिससे उनके अधिकार छिनने का डर है। आज महिलाएं ड्राइविंग करती हैं तो पुरुषों की मानसिकता रहती है कि हादसा करेगी। अगर किसी की भी गलती से महिला चालक से हादसा हो भी जाए तो कहा जाता है कि महिला चला रही थी।
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डॉ. कविता, असिस्टेंट प्रोफेसर
आज बेटियों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करने के साथ-साथ उनकी जिम्मेदारियों का भी आभास कराना जरूरी है ताकि वे सशक्त महिला बन सके। अगर हम सिर्फ अधिकारों के प्रति ही जागरूक करेंगे तो अधिकारों का मिस यूज भी बढ़ेगा। आज महिला सशक्तीकरण के लिए बेटियों को सुरक्षा, अच्छी शिक्षा देने की जरूरत है।
डॉ. रीना पंघाल
बेटा-बेटी का अंतर खत्म करना होगा
आज बच्चों में बेटा-बेटी का अंतर खत्म करने की जरूरत है। उसके दो बेटियां हैं मगर उसने या उसके पति ने कभी बेटियों में फर्क नहीं किया। मगर आज भी समाज में महिलाओं पर बेटा पैदा करने का दबाव बनाया जाता है। बेटी पैदा होने पर उन्हें कोसा जाता है। इस संकीर्ण मानसिकता को बदलने की जरूरत है।
डॉ. नीति